राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में यमुना नदी की बदहाल स्थिति पर एक बड़ा कानूनी और पर्यावरणीय घटनाक्रम सामने आया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी विस्तृत रिपोर्ट दाखिल की है, जिसमें दिल्ली और उत्तर प्रदेश की कुल 10 प्रमुख सरकारी संस्थाओं को नदी के बढ़ते प्रदूषण स्तर के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी माना है। इस मामले में आज (सोमवार) सुप्रीम कोर्ट की पीठ अहम सुनवाई करने वाली है।
यह पूरा मामला याचिकाकर्ता अभिष्ट कुसुम गुप्ता द्वारा दायर की गई अर्जी से संबंधित है, जिसमें यमुना की पारिस्थितिकी को हो रहे नुकसान और प्रदूषण नियंत्रण में सरकारी तंत्र की विफलता पर गंभीर चिंता जताई गई थी। CPCB की नवीनतम रिपोर्ट ने अब इस मुद्दे पर प्रशासनिक जवाबदेही को केंद्र में ला दिया है।
कोंडली-नोएडा नाला
प्रदूषण का मुख्य स्रोत CPCB की रिपोर्ट के अनुसार, यमुना प्रदूषण का सबसे गंभीर कारण ‘कोंडली-नोएडा नाला’ है। यह नाला दिल्ली से शुरू होकर नोएडा के विभिन्न क्षेत्रों से गुजरते हुए सीधे यमुना नदी में गिरता है। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि इस नाले के माध्यम से बिना ट्रीटमेंट या आंशिक रूप से ट्रीट किया गया सीवेज (गंदा पानी) सीधे नदी में प्रवाहित किया जा रहा है, जो लंबे समय से यमुना के जल की गुणवत्ता को नष्ट कर रहा है।
इन 10 एजेंसियों पर तय हुई जिम्मेदारी
बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि प्रदूषण रोकने की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित निकायों की है। रिपोर्ट में जिन प्रमुख संस्थाओं पर लापरवाही के आरोप लगाए गए हैं, उनमें शामिल हैं:
दिल्ली जल बोर्ड (DJB): दिल्ली क्षेत्र में उत्पादित सीवेज के उचित शोधन (Treatment) में विफलता।
नोएडा अथॉरिटी: नाले में गिरने वाले अवैध कचरे और अनट्रीटेड सीवेज को रोकने में असमर्थता।
खोड़ा नगर पालिका परिषद (गाजियाबाद): बिना शोधन के सीवेज नदी क्षेत्र में छोड़ने का आरोप।
उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग और यूपी जल निगम: निगरानी और बुनियादी ढांचे के क्रियान्वयन में कमी।
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (DPCC) और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB): नियामक निगरानी में ढिलाई।
CPCB की प्रमुख सिफारिशें अपनी रिपोर्ट में CPCB ने भविष्य के लिए एक व्यापक कार्ययोजना की सिफारिश की है, जिसमें निम्नलिखित बिंदु प्रमुख हैं:
- सीवर नेटवर्क को पूर्णतः सुदृढ़ करना ताकि कोई भी मलजल सीधे नालों में न गिरे।
- सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STP) की क्षमता में तत्काल वृद्धि करना।
- नालों की नियमित सफाई और गाद (Desilting) निकालने की प्रक्रिया को अनिवार्य बनाना।
- गंदे पानी को इंटरसेप्ट कर उसे ट्रीटमेंट प्लांट की ओर डायवर्ट करना।
सुप्रीम कोर्ट पर टिकी निगाहें
आज होने वाली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट CPCB की इन सिफारिशों पर विचार करेगा। न्यायालय यह तय कर सकता है कि दोषी एजेंसियों पर क्या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और नदी की सफाई के लिए एक समयबद्ध रोडमैप कैसे लागू किया जाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई अंतर-राज्यीय प्रदूषण विवादों और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व के मामले में एक मिसाल पेश कर सकती है।
यमुना की स्वच्छता केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा से जुड़ा विषय है, जिस पर आज न्यायालय का रुख निर्णायक साबित होगा।


