आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यमुना प्राधिकरण (YEIDA) हमेशा से सत्ता और संघर्ष का केंद्र रहा है। लेकिन वर्तमान में जेवर विधानसभा क्षेत्र से जो खबरें आ रही हैं, वे केवल किसानों की समस्याओं तक सीमित नहीं हैं। जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह और यमुना प्राधिकरण के सीईओ राकेश कुमार सिंह के बीच बढ़ता सार्वजनिक मनमुटाव अब इस शोध का विषय बन गया है कि क्या यह वास्तव में किसान हित की लड़ाई है, या फिर इसके पीछे सत्ता के गलियारों में छिपी कुछ अनकही हताशाएं हैं?
जब प्राधिकरण एक स्वायत्तशासी संस्था है तथा अपने बोर्ड एवं नीतिगत निर्णयों के माध्यम से वाणिज्य और उद्योग को बढ़ावा देने का कार्य करता है, तो किसानों के लंबित मामलों को अनावश्यक रूप से शासन के समक्ष संज्ञान हेतु भेजा जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। इसलिए नोएडा, ग्रेटर नोएडा एवं यमुना प्राधिकरण की भूमि मूल्यों में भारी वृद्धि के बावजूद किसानों के मुआवज़े, सर्किल रेट एवं पुनर्वास लाभों में समुचित वृद्धि न होना उचित नहीं है।
धीरेंद्र सिंह का सोशल मीडिया पोस्ट
‘मिनी मुख्यमंत्री’ की छवि और सोशल मीडिया का विरोधाभास
धीरेंद्र सिंह के समर्थकों के बीच उनकी छवि एक ऐसे कद्दावर नेता की है, जिनके संबंध सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ तक कहा जाता है। और इसी से यहाँ एक बड़ा विरोधाभास पैदा होता है: यदि कोई विधायक वाकई इतना प्रभावशाली है, तो उसे अपनी ही सरकार की एक संस्था (प्राधिकरण) की कार्यशैली के विरुद्ध सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से हताशा क्यों व्यक्त करनी पड़ रही है?
कुछ जानकारों का तर्क है कि हालिया उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार में जगह न मिलना इस नाराजगी की एक बड़ी वजह हो सकता है। जब सत्ता के भीतर बात नहीं सुनी जाती, तो नेता अक्सर जनता के बीच जाकर ‘विक्टिम कार्ड’ या ‘जन-आंदोलन’ का सहारा लेते हैं।
7 प्रतिशत आबादी का पेच: सार्वजनिक हित या निजी कशमकश?
यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में किसानों को मिलने वाले 7 प्रतिशत प्लॉट का मामला दशकों पुराना है। इसी विवाद के कारण किसान सड़कों पर हैं उद्योगपतियों को जमीन नहीं मिल पा रही है, अपेरल पार्क, मेडिकल डिवाइस पार्क, पतंजलि फ़ूड पार्क समेत सभी क्लस्टर भूमि के पूर्ण अधिग्रहण न होने से रुके हुए हैं । लेकिन इस मामले में एक नया मोड़ तब आया जब यह चर्चा तेज हुई कि स्वयं विधायक धीरेंद्र सिंह से जुड़े लोगो की भूमि भी इसी 7 फीसदी के फेर में फंसी हुई है। इसको लेकर मामला कोर्ट तक भी पहुंचा है यधपि इसको लेकर सच सामने आना बाकी है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्राधिकरण के सीईओ राकेश कुमार सिंह के खिलाफ विधायक का मोर्चा खोलना केवल किसानों के लिए है, या फिर अपनी अटकी हुई संपत्तियों को गति देने का एक दबाव तंत्र? राजनैतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) का एक क्लासिक मामला प्रतीत होता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भट्टा पारसोल से भाजपा तक
धीरेंद्र सिंह की राजनीतिक यात्रा किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। मायावती के शासनकाल में भट्टा पारसोल आंदोलन के दौरान राहुल गांधी को मोटरसाइकिल पर बिठाकर लाने वाले धीरेंद्र सिंह रातों-रात राष्ट्रीय सुर्खियों में आए थे। 2017 में भाजपा में उनकी एंट्री भी बेहद ‘धमाकेदार’ रही, जहाँ पार्टी में आने से पहले ही उनका टिकट पक्का माना गया था।
आज जब वह किसानो के बहाने सीईओ राकेश कुमार सिंह की नीतियों का विरोध कर रहे हैं, तो परोक्ष रूप से वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रशासनिक निर्णयों पर भी सवाल उठा रहे हैं। क्योंकि राकेश कुमार सिंह की नियुक्ति शासन की उच्च स्तरीय सहमति के बिना संभव नहीं थी। कहाँ जाता है कि मुख्यमंत्री के वरदहस्त के चलते ही उनको सेवानिवृत होने ने बाबजूद एक वर्ष का एक्सटेंशन मिला और फिर से मिलने के दावे भी किये जा रहे है।
प्राधिकरण की प्रशासनिक विफलता और भविष्य की चुनौती
यमुना प्राधिकरण में अधिकारियों की कमी और लंबे समय से जमे ‘प्रमोटेड आईएएस’ (Promoted IAS) अधिकारियों की कार्यशैली हमेशा से सवालों के घेरे में रही है। वर्तमान सीईओ राकेश कुमार सिंह भी सितंबर 2025 में सेवानिवृत्त हो चुके हैं और वर्तमान में एक वर्ष की पुनर्नियुक्ति पर कार्य कर रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के एक वर्ग का ये भी मानना है कि धीरेंद्र सिंह को आने वाले विधानसभा चुनाव में 7 प्रतिशत आबादी के प्लाट पर किसानों के आक्रोश का डर सता रहा है। यदि किसानों के लंबित मामले हल नहीं हुए, तो विपक्ष ‘7 प्रतिशत आबादी’ के मुद्दे को संजीवनी बना सकता है। इसी डर से बचने के लिए विधायक ने अपनी विफलता का ठीकरा सीईओ की ओर मोड़ने की रणनीति अपनाई है।
आगे क्या होगा ?
जेवर की यह राजनीतिक खींचतान केवल एक विधायक और एक अधिकारी की लड़ाई नहीं है। यह उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे, राजनीतिक महत्वाकांक्षा और चुनावी डर का उत्कृष्ट उदहारण भी है। क्या शासन के झोल से अलग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कथित तोर पर प्रिय विधायक धीरेंद्र सिंह की मनोदशा को समझते हुए यहाँ किसी ‘सक्षम’ और ‘पूर्णकालिक’ आईएएस को तैनात करेंगे? या फिर अपने प्रिय अधिकारी के लिए मिनी मुख्यमंत्री धीरेन्द्र सिंह की राजनीति को मझदार में छोड़ देंगे I


