दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन में शामिल गौतमबुद्ध यूनिवर्सिटी (GBU) के छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किए जाने का मामला अब पूरी तरह तूल पकड़ चुका है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद छात्र के खिलाफ कार्रवाई करने पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में नोएडा के मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाने के बाद, उत्तर प्रदेश सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए ग्रेटर नोएडा के एसीपी/कार्यपालक मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में तीखी टिप्पणी और निलंबन की जानकारी
बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ के सामने यह मामला बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया। वरिष्ठ वकील ने मौखिक रूप से पीठ को बताया कि किस तरह देश की सर्वोच्च अदालत के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना करते हुए एक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस भेजकर 5 लाख रुपये का पर्सनल बॉन्ड भरने का जवाब तलब किया था।
इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की। सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को अवगत कराया कि शासन ने इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लिया है और त्वरित कार्रवाई करते हुए ग्रेटर नोएडा के संबंधित एसीपी/कार्यपालक मजिस्ट्रेट को निलंबित कर दिया है। इसके साथ ही, उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) ने भी इस पूरे घटनाक्रम की गहन जांच के आदेश दिए हैं।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश?
इस पूरे विवाद की जड़ में सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला है, जो 1 सितंबर को सुनाया गया था। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया था कि 20 से 25 जुलाई के बीच दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़ी सभी एफआईआर (FIR) को रद्द किया जाता है। अदालत ने प्रशासन को सख्त हिदायत दी थी कि प्रदर्शन में शामिल किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक या दमनकारी कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसके बावजूद जीबीयू के छात्र को नोटिस जारी करना सीधे तौर पर अदालत की अवहेलना के दायरे में आ गया।

प्रशासनिक सफाई और कमिश्नरेट व्यवस्था का तर्क
मामला बढ़ने के बाद स्थानीय जिला प्रशासन ने इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। प्रशासन का कहना है कि जिले में पुलिस कमिश्नरेट व्यवस्था लागू होने के बाद, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं के तहत निरोधात्मक या दंडात्मक कार्रवाई करने का अधिकार पुलिस कमिश्नर और उनके अधीनस्थ अधिकारियों के पास होता है। ऐसे मामलों में जिलाधिकारी (DM) कार्यालय की कोई भूमिका नहीं होती है।
वहीं, संबंधित एसीपी रवि शंकर मिश्रा ने अपने बचाव में तर्क दिया था कि जांच के दौरान छात्र का नाम सामने आने पर प्रक्रिया के तहत वॉट्सऐप के जरिए नोटिस भेजा गया था, जिसे बाद में निरस्त (रद्द) भी कर दिया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी इस तरह का नोटिस जारी होना प्रशासन के लिए बड़ी गले की हड्डी बन गया।





