नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई सस्पेंस से भरपूर फिल्म ‘गजब रात’, दिल्ली की पृष्ठभूमि पर आधारित है एक भ्रष्ट दरोगा की अनोखी कहानी, पत्रकार और पत्रकारिता के भी दिखाए दो पहलु

आशु भटनागर
6 Min Read

ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘गजब रात’ (2026) इन दिनों दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। यह फिल्म एक ऐसी कहानी बयां करती है जो यह दिखाती है कि किस तरह एक भ्रष्ट अधिकारी के भीतर भी सत्यनिष्ठा जाग सकती है और वह चाहे तो बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश कर सकता है। फिल्म की पूरी कहानी दिल्ली की पृष्ठभूमि और यहाँ की एक ही रात की घटना के इर्द-गिर्द बुनी गई है। फिल्म आपको सभ्य समाज के पीछे छिपे ऐसे जंगल का दर्शन कराती है जिसमे पुलिस. ब्यूरोक्रेट्स, राजनेता और समाजसेवी खासतोर पर महिला अधिकारियो की लड़ाई लड़ने वाले चेहरो का सच खुलकर सामने आता है

- Support Us for Independent Journalism-
Ad image

क्या है फिल्म की कहानी?

फिल्म की कहानी अजय निर्वित (मनोज बाजपेयी) के आस-पास घूमती है, जो दिल्ली पुलिस का एक भ्रष्ट दरोगा (SI) है। उसकी सामान्य और घूसखोरी से भरी जिंदगी उस समय एक खतरनाक मोड़ लेती है, जब उसे कनॉट प्लेस की सड़कों पर एक गंभीर रूप से घायल महिला मिलती है और उसे इस मामले की जांच का जिम्मा सौंपा जाता है।

घायल महिला की पहचान आर्य साहनी नाम की एक पत्रकार के रूप में होती है, जो राजनीतिक भ्रष्टाचार, गुप्त सौदों और एक बड़े षड्यंत्र के खुलासे से जुड़ी है। प्रभावशाली लोग उसे चुप कराना चाहते हैं। अजय जब उसे अस्पताल ले जा रहा होता है, तब संदिग्ध इरादों वाले सीबीआई और एनआईए के अधिकारी वहां पहुंच जाते हैं। दिलचस्प मोड़ तब आता है जब कुछ देर पहले तक उस महिला को मरने देने के लिए 5 करोड़ रुपये लेने वाला सिपाही अजय, अचानक अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनकर सबके सामने खड़ा हो जाता है।

जिसने भी इस सिस्टम के कामकाज को बहुत करीब से देखा है, उसे SI अजय और SHO राणा के बीच की बातचीत एकदम सच लगती है। हल्के-फुल्के अंदाज़ में होने के बावजूद यह बातचीत बेहद वास्तविक है। इन दो अनुभवी पुलिस वालों को देखकर ऐसा लगता है मानो आप दो पुलिस वालों के बीच हो रही असली बातचीत को छुपकर सुन रहे हों।

- Advertisement -
Ad image

फिल्म ये भी बताती है कि किस तरह पत्रकारिता आज भी अपराधियों के साथ साथ सिस्टम यानी पुलिस, ब्यूरोक्रेट्स, राजनेता और समाजसेवियो के भी निशाने पर रहती है I फिल्म मे पत्रकार और पत्रकारिता के भी दो पहलु हैं एक स्थानीय पत्रकारिता कर रहे वो पत्रकार जो क्राइम की खबरों के लिए पुलिस चौकी, थानों में चक्कर लगाते रहते है और तमाम अपमान के बीच भी खबरों को निकाल लाते हैं, दूसरी ओर वो पत्रकार जो खोजी पत्रकारिता के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देते है I दोनों के बीच खुद को अपने समाचारों में अधिकारियो, भ्रष्टाचारियों के खुलासे करने का दावा करने स्थानीय अखबारो, न्यूज़ पोर्टल के वो कथित बड़े दबंग संपादक भी हैं जो खोजी पत्रकारों को हीरा बता कर नौकरी पर रखते है और किसी बड़े घोटालो की जानकारी आते ही पत्रकार की जान सिस्टम को बेच देते हैं I

कलाकारों का अभिनय

फिल्म में सिस्टम के कामकाज और पुलिस विभाग की वास्तविक कार्यशैली को बहुत करीब से दिखाया गया है। खासकर, सब-इंस्पेक्टर अजय और एसएचओ राणा के बीच की बातचीत बेहद स्वाभाविक और उत्तर भारत के पुलिस महकमे की असलियत के करीब लगती है।

फिल्म की स्टार कास्ट ने इसे और भी विश्वसनीय बनाया है:

  • मनोज बाजपेयी ने एक घूसखोर लेकिन अंततः जागे हुए अधिकारी के किरदार में जान फूंक दी है।
  • राजीव गुप्ता ने हरियाणवी लहजे में दिल्ली के उस पुलिसकर्मी का किरदार निभाया है, जो सिस्टम से थक चुका है लेकिन चतुर है।
  • अक्षय ओबेरॉय मीठी बातें करने वाले रहस्यमयी सीबीआई अधिकारी के रूप में जंचे हैं।
  • साकिब सलीम ने भी अपने किरदार में अच्छा काम किया है।
  • दिव्या दत्ता और नुसरत भरूचा (कम स्क्रीनटाइम के बावजूद दमदार कैमियो) और श्रद्धा ने सामाजिक कार्यकर्ता के स्टीरियोटाइप को बखूबी निभाया है। इसके अलावा, सुनीत टंडन लुटियंस दिल्ली के भ्रष्ट और पुरानी सोच वाले व्यक्ति के रूप में सटीक बैठते हैं।

निर्देशन और कसावट

‘पिंक’, ‘एयरलिफ्ट’ और ‘रेड’ जैसी फिल्मों से जुड़ी टीम और निर्देशक रितेश शाह ने ‘गजब रात’ का निर्देशन किया है। 2 घंटे 3 मिनट की यह फिल्म सिर्फ एक रात की घटना पर आधारित है, जिसमें भरपूर सस्पेंस देखने को मिलता है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह किसी भी पॉइंट पर प्रीडिक्टेबल (अनुमान लगाने योग्य) नहीं लगती।

फिल्म की खूबियां ‘गजब रात’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी कसी हुई पटकथा (स्कूप) और कलाकारों के दमदार अभिनय हैं। मनोज बाजपेयी के साथ-साथ अन्य सहायक कलाकारों ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। लगभग दो घंटे की यह फिल्म कहीं भी धीमी या बोरिंग नहीं होती और अंत तक दर्शकों में सस्पेंस बनाए रखती है। स्थानीय दर्शकों और सस्पेंस-थ्रिलर फिल्मों के प्रेमियों के लिए यह नेटफ्लिक्स पर एक नया विकल्प बनकर उभरी है।

Share This Article
आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे