आशु भटनागर : नोएडा प्राधिकरण में भूखंडों के आवंटन को लेकर चल रहा खेल एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब एक महीने पहले किसानों के भूखंडों के आवंटन में हुई धांधली का मामला सामने आया था, जिसमें समितियों की सिफारिशों की आड़ में बड़ा घोटाला किए जाने का आरोप है। हैरानी की बात यह है कि इस मामले की जांच कहीं गायब हो गई हैं, जिससे एक बार फिर नोएडा प्राधिकरण के नियोजन विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
स्थानीय जानकारों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पूरा मामला सेक्टर-71 से जुड़ा है। आरोप है कि विभाग ने नियमों को ताक पर रखते हुए सेक्टर-71 में ग्रीन बेल्ट की जमीन को शामिल कर किसान कोटे के प्लॉट नियोजित कर दिए। नियमतः सेक्टर के नक्शे में 30 मीटर चौड़ी सड़क और आवासीय चिह्नित जमीन के बीच 20 मीटर की ग्रीन बेल्ट मौजूद है, जिसके चलते वहां इस प्रकार प्लॉट देना तकनीकी रूप से संभव नहीं है। इसके बावजूद, न केवल प्लॉट आवंटित किए गए बल्कि भू-उपयोग (Land Use) बदलने की प्रक्रिया को भी दरकिनार कर दिया गया। एक प्लॉट का आवंटन पत्र भी प्राधिकरण द्वारा जारी किए जाने की सूचना है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि सेक्टर-159 के झट्टा गांव के किसानों को उनके कोटे के प्लॉट उनके मूल क्षेत्र से करीब 20 किलोमीटर दूर दिए जा रहे हैं, जबकि प्राधिकरण सभी 81 गांवों के किसानों की देनदारी समाप्त करने के लिए झट्टा गांव के पास ही सेक्टर-146 में प्लॉट दे रहा है। ऐसे में सेक्टर-71 और सेक्टर-117 जैसी प्राइम लोकेशन पर नियमों को ताक पर रखकर चहेतों को प्लॉट देना बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है।
दुखद तथ्य ये भी है कि आम किसान अपनी ही अधिग्रहित जमीन के मुआवजे और प्लॉट के लिए वर्षों से प्राधिकरण के चक्कर काटने को मजबूर हैं। इसके विपरीत, एक ही किसान को सेक्टर-71 और सेक्टर-117 में 30 मीटर चौड़ी सड़क पर कॉर्नर के दो-दो प्लॉट आवंटित कर दिए गए हैं। बाजार में इन सेक्टरों की मांग और कीमतें एक्सप्रेस-वे के किनारे या सेक्टर-146 के मुकाबले काफी अधिक हैं। कॉर्नर के प्लॉट होने के कारण इनकी वाणिज्यिक और वित्तीय कीमत और भी ज्यादा है, जिससे इस आवंटन के पीछे के असली मंसूबो पर शक गहराता है।
सिंडिकेट और अधिकारियों की मिलीभगत की चर्चा
प्राधिकरण के गलियारों में चर्चा है कि इस पूरे खेल के पीछे एक बड़ा सिंडिकेट सक्रिय है। आरोप है कि यह सिंडिकेट लखनऊ की विभिन्न समितियों के अध्यक्षों के नाम पर सिफारिशी पत्र लाता है, जिसके आधार पर मूल और जरूरतमंद किसानों को दरकिनार कर इन फर्जी या अनुचित प्रस्तावों को मनचाहे सेक्टरों की मुख्य सड़कों पर फिट कर दिया जाता है। इस पूरे सिंडिकेट को नियोजन विभाग के कुछ अधिकारियों का सीधा संरक्षण प्राप्त होने की बात कही जा रही है।
प्राधिकरण में चर्चा है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच नहीं कराई गई, तो प्राधिकरण में भ्रष्टाचार के दीमक संस्था की बची-खुची साख को भी समाप्त कर देंगे। प्रशासन और शासन को चाहिए कि इस तथाकथित सिंडिकेट और संलिप्त अधिकारियों की संलिप्तता की गहराई से जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करें, ताकि वर्षों से भटक रहे असली किसानों को उनका हक मिल सके।



