नई दिल्ली: वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करने वाले दो प्रमुख प्राकृतिक जलवायु पैटर्न—अल नीनो (El Niño) और ला नीना (La Niña)—को लेकर वैज्ञानिक समुदाय लगातार नजर बनाए हुए है। अमेरिकी एजेंसी ‘नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन’ (NOAA) के अनुसार, ये दोनों विपरीत मौसमी घटनाएं हर 3 से 7 साल के अंतराल पर सामने आती हैं और इन्हें संयुक्त रूप से ENSO (अल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन) चक्र कहा जाता है।
मूल स्पेनिश भाषा में ‘अल नीनो’ का शाब्दिक अर्थ ‘छोटा लड़का’ होता है, जबकि ‘ला नीना’ का अर्थ ‘छोटी लड़की’ है। हालांकि इन दोनों की उत्पत्ति प्रशांत महासागर में होती है, लेकिन इनका प्रभाव पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। प्रशांत महासागर के तापमान में होने वाले इन बदलावों के कारण भारत में मानसूनी बारिश, अफ्रीका में सूखे की स्थिति और दुनिया के अन्य हिस्सों में तूफानों की तीव्रता पर सीधा असर पड़ता है।
मौसम पैटर्न पर अल नीनो और ला नीना का प्रभाव
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, अल नीनो को इस चक्र का ‘गर्म चरण’ माना जाता है। इस दौरान सामान्य पूर्वी व्यापारिक हवाएं (trade winds) कमजोर पड़ जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती हैं। परिणामस्वरूप, समुद्र की सतह का गर्म पानी मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र की ओर बढ़ने लगता है।
इसके विपरीत, ला नीना के दौरान व्यापारिक हवाएं सामान्य से अधिक तेज हो जाती हैं। ये हवाएं गर्म पानी को धकेलकर एशिया और ऑस्ट्रेलिया के निकट पश्चिमी प्रशांत महासागर की तरफ ले जाती हैं, जिससे दक्षिण अमेरिका के तट पर ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी गहराई से ऊपर की ओर आ जाता है।
क्या ये बारी-बारी से आते हैं?
ENSO चक्र के तहत ये घटनाएं घटित होती हैं, परंतु इनका कोई निश्चित या पूरी तरह अनुमानित समय-क्रम नहीं होता। हालांकि ये आमतौर पर एक-दूसरे के बाद आते हैं, लेकिन जलवायु प्रणाली की जटिलता के कारण कभी-कभार एक ही चरण लगातार भी सक्रिय रह सकता है। आंकड़ों के अनुसार, ला नीना की तुलना में अल नीनो की घटनाएं अधिक बार दर्ज की जाती हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) के पूर्वानुमानों के मुताबिक, पिछले कुछ समय में इन पैटर्नों में उल्लेखनीय उतार-चढ़ाव देखा गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वैश्विक जलवायु पर इन बदलावों के दूरगामी प्रभाव होते हैं, जिसके चलते विभिन्न देश अपनी मौसम और कृषि नीतियों की समीक्षा करते हैं।



