आशु भटनागर। सत्ता की गलियारों से मैं पहला समाचार दादरी विधानसभा से है। जहाँ इन दिनों दो बार के विधायक तेजपाल नागर की एक हालिया गतिविधि चर्चा का केंद्र बनी हुई है। बीते दिनों विधायक जी अपनी विधानसभा क्षेत्र के सभी मंडल अध्यक्षों को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने लखनऊ पहुंचे। ऊपरी तौर पर यह एक शिष्टाचार मुलाकात और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने वाला कदम लगा, लेकिन पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो इसकी पटकथा कुछ और ही बयां कर रही है।दरअसल, दादरी में चर्चा है कि भाजपा जिलाध्यक्ष भी दादरी विधानसभा सीट से अपनी दावेदारी का मन बना रहे हैं। ऐसे में संगठन पर अपनी मजबूत पकड़ दिखाने और यह संदेश देने के लिए कि ‘संगठन विधायक के साथ है’, मंडल अध्यक्षों के कंधे पर बंदूक रखकर यह सियासी दांव खेला गया। मंडल अध्यक्ष, जो मुख्यमंत्री से मिलने की खुशी में लखनऊ गए थे, उन्हें बाद में अहसास हुआ कि उनकी भावनाओं का इस्तेमाल टिकट की दौड़ में बढ़त बनाने के लिए कर लिया गया है। अब सवाल यह उठता है कि क्या विधायक जी का यह ‘संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन’ पार्टी आलाकमान को प्रभावित कर पाएगा या जिलाध्यक्ष की खामोश रणनीति भारी पड़ेगी? इसका फैसला तो टिकट बंटवारे के वक्त ही होगा, लेकिन फिलहाल दादरी की राजनीति में दांव-पेच जारी हैं
सत्ता के गलियारों में दूसरी चर्चा नोएडा विधानसभा में पंकज सिंह के सामने टिकट की दावेदारी में लगे पूर्व नोएडा महानगर अध्यक्ष और एक राज्य मंत्री की है । दरअसल नोएडा विधानसभा में मौजूदा विधायक पंकज सिंह के खिलाफ उनकी ही पार्टी के कुछ महत्त्वाकांक्षी नेताओं ने मोर्चा खोल रखा है। चर्चा है कि पूर्व नोएडा महानगर अध्यक्ष और वर्ष 2017 में टिकट का दावा करके राज्य मंत्री का पद हासिल करने वाले कुछ वैश्य समाज के नेता इस बार पंकज सिंह को घेरने के लिए ‘साम-दाम-दंड-भेद’ का सहारा ले रहे हैं। इसी रणनीति के तहत बीते दिनों वैश्य समाज के नाम पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। यूँ तो वैश्य समाज की इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों को कंबल बांट कर उनका ही घी पीने को कहा जा रहा था और उनका ही प्रचार करने को कहा जा रहा था पर असली मकसद पीछे छिपे नेता की दावेदारी को मजबूत करना और स्थानीय विधायक की छवि को नुकसान पहुंचाना था। लेकिन, अति-उत्साह में खेल उल्टा पड़ गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक वक्ता ने बेहद सौम्य और विनम्र छवि वाले विधायक पंकज सिंह को ‘बाहुबली’ कह डाला। कम्बल हजम कर चुके पत्रकारों ने तुरंत इस विरोधाभास को पकड़ लिया। मामला बिगड़ता देख दूसरे नेताओं ने बात संभालने की कोशिश की, लेकिन तीर कमान से छूट चुका था। इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए समाजवादी पार्टी के एक स्थानीय वैश्य नेता ने सोशल मीडिया पर ‘बाहुबली’ शब्द को भुनाने की कोशिश की, जिससे सपा प्रमुख अखिलेश यादव को खुश किया जा सके। हालांकि, यह दांव दोनों तरफ से उलटा पड़ता दिख रहा है। एक तरफ जहां पंकज सिंह के समर्थकों में भारी आक्रोश है और मामले में FIR दर्ज कराने की तैयारी की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ सपा आलाकमान भी इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी से नाखुश बताया जा रहा है। पंकज सिंह को लपेटने के चक्कर में अब भाजपा और सपा, दोनों ही दलों के कुछ नेता कानूनी और राजनीतिक मुश्किलों में घिरते नजर आ रहे हैं। अब समस्या यह है कि पंकज सिंह को लपेटने के चक्कर में भाजपा ओर सपा के कितने वैश्य नेता लिपटने वाले हैं इसकी सूचना जल्द ही पता चलेगी।

सत्ता के गलियारों में तीसरी चर्चा ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की एक एसीईओ को लेकर हो रही है। प्राधिकरण में 3 साल का कार्यकाल पूरा कर चुकीं एक अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी (ACEO) अब किसी जिले की कमान यानी जिलाधिकारी (DM) बनने की कोशिशों में जुटी हुई हैं। इसके लिए लखनऊ के शासन स्तर पर उनकी सक्रियता और ‘नेटवर्किंग’ काफी बढ़ गई है। वो अलग बात है कि प्राधिकरण के कर्मचारियों और आम जनता के बीच उनकी कार्यशैली को लेकर काफी असंतोष रहा है। चर्चा है कि बीते 3 वर्षों में उन्होंने बात-बात पर कर्मचारियों के तबादले (ट्रांसफर) करके एक अनिश्चितता का माहौल बनाए रखा। प्राधिकरण से जुड़े जानकारों का कहना है कि प्रशासनिक दक्षता के बजाय केवल सिफारिश और ‘जुगाड़’ के दम पर यदि उन्हें किसी जिले की कमान मिलती है, तो वहां के प्रशासनिक तंत्र का क्या हाल होगा, यह सोचने का विषय है। अब देखना यह होगा कि क्या चुनावी सीजन में शासन उन्हें DM की जिम्मेदारी देकर किसी जिले में भेजता है या फिर वह ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में ही अपनी सेवाएं देती रहेंगी।


