गौतमबुद्धनगर में दो किसान आन्दोलनों का एक दिन में सफाया, एक को डंडे के जोर पर तो दूसरे को प्यार से उठाया

NCRKhabar Mobile Desk
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राजेश बैरागी । क्या कानून व्यवस्था, यातायात और आम नागरिकों के जनजीवन के लिए  चुनौती बने किसानों से पुलिस प्रशासन और प्राधिकरणों ने आज पार पा लिया है?कल देर रात से संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं की गिरफ्तारी में जुटी पुलिस ने लगभग डेढ़ सौ लोगों को जेल भेजकर किसानों के दिल्ली कूच और जीरो प्वाइंट से नोएडा तक धरना प्रदर्शन की सारी योजनाएं ध्वस्त कर दीं वहीं डेढ़ सौ दिनों से ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पर धरना दे रहे भाकियू अराजनैतिक के कार्यकर्ताओं को उनकी मांगों पर नियमित विचार करने का आश्वासन देकर धरना समाप्त करा दिया गया।

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जीरो पॉइंट पर धरने को हटाने के बाद बैठे पुलिस कर्मी

कल से ग्रेटर नोएडा के परी चौक के निकट जीरो प्वाइंट को धरनास्थल बनाने में जुटे संयुक्त किसान मोर्चा के कई बड़े नेताओं सहित लगभग डेढ़ सौ किसानों को आज गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इनमें कुछ महिलाएं भी शामिल बताई गई हैं।कल धरने को महिलाओं ने ही संचालित किया था। इसके साथ ही कमिश्नरेट पुलिस के आला अधिकारियों ने आज सुबह से ही भारी पुलिस बल, पीएसी और आर आर एफ के जवानों के साथ जीरो प्वाइंट को छावनी बनाकर धरना देने वाले किसानों को वहां फटकने भी नहीं दिया।

शाम होते होते ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पर पिछले डेढ़ सौ दिनों से अधिक समय से भाकियू अराजनैतिक के जिलाध्यक्ष महेंद्र मुखिया के नेतृत्व में धरना दे रहे किसानों को धरना समाप्त करने के लिए मना लिया। हालांकि पहले ही घिसट घिसट कर चल रहे इस धरने को संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा पिछले 25 नवंबर से चलाए जा रहे आक्रामक आंदोलन से कड़ी चुनौती मिल रही थी।

जिलाधिकारी मनीष कुमार वर्मा के नेतृत्व में प्राधिकरण में हुई बैठक में जिला प्रशासन व पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में प्राधिकरण के एसीईओ सौम्य श्रीवास्तव और किसानों के बीच उनकी मांगों पर नियमित कार्रवाई करने की सहमति बन गई।

एक ही दिन में किसानों के एक मोर्चे को सख्ती से और दूसरे मोर्चे को सहमति से आंदोलन समाप्त कराने से क्या किसानों की चुनौती को पुलिस प्रशासन और प्राधिकरणों ने समाप्त कर दिया है?

जीरो प्वाइंट पर उपस्थित एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि शासन ने किसानों की समस्याओं पर विचार करने के लिए एक समिति का गठन तो कर दिया है। हालांकि इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कोई तैयार नहीं है कि आखिर एक दशक से अधिक समय से किसानों की समस्याओं का समाधान क्यों नहीं किया जा रहा है। यह समाधान नहीं करने का परिणाम है कि समस्याओं का विस्तार सुरसा के मुंह की तरह फैलता ही जा रहा है और नयी तथा अव्यवहारिक मांगे भी मूल मांगों के साथ जुड़ गयी हैं।

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