आशु भटनागर। अप्रैल के दूसरे सप्ताह में हुए हिंसक श्रमिक आंदोलन के बाद भले ही आज सड़कों पर सन्नाटा और शांति दिखाई दे रही हो, लेकिन इस आंदोलन की अंदरूनी आंच ने प्रशासन और सरकार के बड़े-बड़े मंसूबों को झुलसा कर रख दिया है। हिंसा के कारणों और साजिशों की जांच में जुटी पुलिस अब तक भले ही किसी निष्कर्ष पर न पहुंची हो, लेकिन इसका सीधा असर शहर के गरिमामयी आयोजनों पर पड़ा है।
नोएडा प्राधिकरण: स्वर्ण जयंती की चमक हुई फीकी
17 अप्रैल का दिन नोएडा के इतिहास के लिए ऐतिहासिक होने वाला था। नोएडा प्राधिकरण अपने 50वें स्थापना दिवस पर नए प्रशासनिक भवन के उद्घाटन और उसमें स्थानांतरित होने के सपने संजोए बैठा था। पूरी संभावना थी कि मुख्यमंत्री स्वयं इस भव्य आयोजन का हिस्सा बनेंगे। लेकिन हिंसा की इस अप्रत्याशित घटना ने प्राधिकरण को बैकफुट पर धकेल दिया। करोड़ों के खर्च और भव्यता की तैयारी को अब केवल ‘सादगी’ की औपचारिकताओं में समेटने पर मजबूर होना पड़ा।
ग्रेटर नोएडा: शिक्षा एक्सपो पर भी लगा ग्रहण
आंदोलन का असर केवल नोएडा तक सीमित नहीं रहा। ग्रेटर नोएडा के एक्सपो मार्ट में आयोजित होने वाले ‘शिक्षा एक्सपो’ को भी अगली घोषणा तक टाल दिया गया है। बताया जा रहा है कि शिक्षण संस्थाओं ने सुरक्षा कारणों और अनिश्चितता के माहौल को देखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए हैं। सरकारी ही नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यावसायिक आयोजनों के इस तरह रद्द होने से शहर की छवि और प्रशासनिक चुस्ती पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।
यमुना प्राधिकरण: सिल्वर जुबली और फिल्म सिटी के सपनों को झटका
सबसे बड़ा झटका यमुना प्राधिकरण (YEIDA) को लगा है, जिसका 25वां स्थापना दिवस (सिल्वर जुबली) आगामी 24 अप्रैल को प्रस्तावित था। अधिकारियों ने महीनों पहले से दावे किए थे कि इसे भव्य स्तर पर मनाया जाएगा और मुख्यमंत्री के हाथों 5 साल से लंबित ‘फिल्म सिटी’ का शिलान्यास कराया जाएगा। फिल्म निर्माता बोनी कपूर की कंपनी ने भी इसके संकेत दिए थे।
लेकिन आज स्थिति यह है कि न तो फिल्म सिटी के शिलान्यास का कोई अता-पता है और न ही स्थापना दिवस के भव्य कार्यक्रम का। प्राधिकरण के आला अधिकारी फिलहाल भविष्य की योजना बनाने के बजाय ‘लखनऊ दरबार’ की हाजिरी लगाने में व्यस्त हैं। चर्चा है कि यह महत्वपूर्ण कार्यक्रम अब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
विकास का ‘यमुना मॉडल’ बनाम नोएडा का अतीत शहर के उद्योगपतियों और समाजसेवियों में इस स्थिति को लेकर गहरा रोष है। लोगों का कहना है कि जब नोएडा, ग्रेटर नोएडा ने अपने 25 साल पूरे किए थे, तो उसके पास दिखाने के लिए बुनियादी ढांचा और सफल औद्योगिक मॉडल था। इसके विपरीत, यमुना प्राधिकरण अपने 25 वर्षों में नोएडा के विकास का 3 प्रतिशत भी धरातल पर नहीं उतार सका है।
हालत की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 18 साल पहले जिन लोगों को आवासीय प्लॉट आवंटित किए गए थे, उन्हें आज तक उनका कब्जा नहीं मिल सका है। वहीं, हाल ही मै नई आयी आवासीय योजना के ब्रोशर में साफ लिखा है कि प्लॉट 5 साल बाद मिलेंगे, जो यह दर्शाता है कि प्राधिकरण के पास जमीन का कोई वास्तविक और विस्तृत प्लान मौजूद ही नहीं है।
25वे वर्ष में भी नेतृत्व का संकट: यमुना प्राधिकरण (YEIDA) को है ‘पूर्णकालिक CEO’ का इंतजार!
क्षेत्र के विकास में सबसे बड़ी बाधा प्रशासनिक स्थिरता की कमी को माना जा रहा है। विडंबना देखिए कि उत्तर प्रदेश सरकार इतने महत्वपूर्ण क्षेत्र यमुना प्राधिकरण (YEIDA) के लिए एक पूर्णकालिक CEO तक नियुक्त नहीं कर पा रही है। वर्तमान CEO सेवानिवृत्ति के बाद एक वर्ष के सेवा विस्तार पर हैं, वो विस्तार भी इसी सितंबर में समाप्त हो रहा है। इसके बाद चुनावी सरगर्मी बढ़ने से प्रशासनिक कामकाज फिर से अधर में लटकने की आशंका है।
स्थानीय जानकारों का मानना है कि नोएडा की सफलता के पीछे वहां समय-समय पर नियुक्त बेहतरीन अधिकारी थे, लेकिन यमुना प्राधिकरण के मामले में सरकार सारा नियंत्रण लखनऊ से ही रखना चाहती है। इसी ‘रिमोट कंट्रोल’ नीति का परिणाम है कि आज दो दिन बाद होने वाले सिल्वर जुबली कार्यक्रम पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं और विकास केवल विज्ञापनों तक सीमित रह गया है। उधोगपतियो को भूमि पर कब्ज़ा तक नहीं दिया जा रहा है, किसानो को 7 प्रतिशत अलोटमेंट का इंतज़ार अंतहीन हो चूका है।
ऐसा लगता है श्रमिक आंदोलन ने शायद केवल कानून-व्यवस्था की ही पोल नहीं खोली, बल्कि विकास के उन खोखले दावों को भी बेनकाब कर दिया है जो यमुना प्राधिकरणों के फाइलों में दशकों से दबे पड़े हैं।


