Yamuna Authority’s Silver Jubilee Year Special: Authority of False Promises, Industrial City of Broken Dreams
आशु भटनागर। 24 अप्रैल 2026 को, उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी के तीसरे स्तंभ, यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) को अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे हो जाएंगे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों की सफलता से प्रेरणा लेते हुए, 24 अप्रैल 2001 को यमुना नदी के किनारे स्थित इस प्राधिकरण की स्थापना ताज एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के रूप में औद्योगिक विकास को गति देने के उद्देश्य से की गई थी। बाद में इसे यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) नाम दिया गया। इन बीते ढाई दशकों में,इस प्राधिकरण के बंद होने की चर्चाओं से लेकर 11,000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट प्रस्तुत करने तक, यमुना प्राधिकरण के “वैश्विक उत्थान” की बड़ी-बड़ी गाथाएं सुनाई जा रही हैं। लेकिन क्या ये दावे वास्तव में धरातल पर हैं, या फिर ये केवल एक सरकार का कागजी बुलबुला भर हैं?
24 अप्रैल 2001 को 6 जिलों (गौतम बुद्ध नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, आगरा, मथुरा, हाथरस ) में इस प्राधिकरण को बसाने का सपना देखा गया जिसमें फेस वन में गौतम बुद्ध नगर और बुलंदशहर के गांव की जमीन अधिकरण का मास्टर प्लान तैयार किया गया किंतु वर्षों से इस मास्टर प्लान की चर्चा के बाबजूद लोगों के रहने लायक उद्योगों के चलने लायक तक नहीं बनाया जा सका है। आज प्राधिकरण के अधिकारी 11 बड़े औद्योगिक क्लस्टरों, हाल ही में उद्घाटन हुए जेवर हवाई अड्डे, एक प्रस्तावित फिल्म सिटी, और लगभग 25,000 आवासीय भूखंडों की बात करते हैं। विडंबना यह है कि फिल्म सिटी का अभी तक शिलान्यास नहीं हुआ है, इसको बनाने वाली कम्पनी के दावों और वादों में भी प्राधिकरण की परछाई दिखाई देती है तो हजारों आवासीय भूखंडों तक कैसे पहुंचे वो लोगों को आज तक अता-पता नहीं है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि यीडा के पूर्व सीईओ के नेतृत्व में अधिकारियों ने इस क्षेत्र की सफल मार्केटिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी पर अब चर्चा है कि पर अब इसको डिलीवर करने के समय वर्तमान सीईओ और अधिकारी टालमटोल में लगे हैं। बीते 10 वर्षों में, विशेषकर भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद, इस प्राधिकरण में “स्वप्निल विकास की नई-नई गाथाएं” लिखी गईं। 11 नए क्लस्टरों के लिए एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर हुए, किंतु जिस “अपेरल पार्क” को यमुना प्राधिकरण के दिन पलटने वाला बताया गया था, जिसके नाम पर इसको ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में मर्ज करने से रोकने वाला बताया गया वह भी आज तक तैयार नहीं है। उधोगपतियो का कहना है कि “अपेरल पार्क” का सपना उनके लिए “अप्रैल फूल पार्क” बन कर रह गया है। आरोप है कि इसके लिए भी आज तक किसानो से ज़मीनों को मुक्त नहीं कराया जा सका है तो ऐसा ही हश्र मेडिकल डिवाइस पार्क का भी है I इनके अलावा अन्य दर्जन भर पार्को के लिए कम्पनियों से MOU/LOI तक दिए गए हैं कितु धरातल पर सब शून्य है।
उद्योगपतियों का आरोप है कि प्राधिकरण आज तक उन्हें उपयुक्त और विकसित जमीन उपलब्ध नहीं करा सका है, वहीं प्राधिकरण के अधिकारी इसका ठीकरा व्यापारियों पर फोड़ते हुए कहते हैं कि वे यहां कुछ विकसित ही नहीं करना चाहते। इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच एक कड़वा सच यह भी है कि यीडा ने औद्योगिक क्लस्टरों के निर्माण और आवंटन तो खूब किए, किंतु इन सेक्टरों में पानी की कमी से लेकर सड़क तक जैसी बुनियादी सुविधाएं यहां के निवासियों को रहने और उद्योग चलाने के लिए मुहैया नहीं कराई गईं। उद्योगपतियों का कहना है कि बीते एक वर्ष में नए सीईओ के आने के बाद प्राधिकरण ने दनादन कंप्लीशन (पूरा होने) के लिए नोटिस और चेकलिस्ट तो थमाईं, किंतु वे यहां किसानों द्वारा जमीन खाली न करने की समस्या का कोई ठोस समाधान नहीं दे सके। नए MOU के समाचार आये, उधोगपतियो से मिलने के फोटो आये पर पुराने कई उधोगपति लगातार सीईओ से मिलने का समय ही मांग रहे हैं तो कई अपना रोष पत्रकारों से प्रकट कर अच्छे दिनों की प्रतीक्षा कर रहे है।
इसे प्राधिकरण की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न ही कहेंगे कि क्षेत्र के सबसे बड़े आकर्षण, जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन बीते 28 मार्च को बस जैसे-तैसे किया गया, जबकि एक वर्ष तक “बार बार उद्घाटन” की खबरें सुर्खियों में रहीं। और अब उद्घाटन को जब लगभग एक महीना बीतने को है, अभी तक यहां से हवाई यात्रा संचालन की कोई सूचना नहीं है। प्राधिकरण के अधिकारी “तकनीकी समस्याओं” को इसका कारण बताकर हाथ खड़े कर लेते हैं, जो इस पूरे क्षेत्र में विकास की गति पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
ठीक इसी तरह, जिन लोगों ने यहां प्राधिकरण के झांसे में आकर भूखंड या फ्लैट ले भी लिए हैं, उन्हें सुरक्षा से लेकर व्यवस्था तक कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है। हालत यह हैं कि जिस प्राधिकरण ने उद्योगों के लिए शहर के प्रथम चरण को पूरा करने का दावा किया, उसमें आने के लिए भी एक्सप्रेसवे की टोल कंपनी ने टोल लगा दिया है, जिसके चलते सेक्टर 28, 29 जैसे सेक्टरों में आने-जाने के लिए प्रतिदिन प्रत्येक गाड़ी को 80 रुपये देने पड़ते हैं।
ऐसा नहीं हैं कि यहाँ बस उधोगपति और घर का सपना देखने वाले लोग ही दुखी हैं बल्कि यहाँ के अपनी मान सामान भूमि का दान करने वाले किसानों की अपनी अलग समस्याएं हैं। किसान दावा करते हैं कि प्राधिकरण ने भूखंड तो काट दिए, किंतु उनके गांव के हिस्से की जमीन पर आने-जाने के रास्ते तक नहीं बनाये हैं। ऐसे में कहीं किसी औद्योगिक भूखंड के बीच में से रास्ता जा रहा है, तो कहीं किसी ग्रुप हाउसिंग के बीच से किसानों के गांव तक का रास्ता निकल रहा है। किसानों को आज तक उनके 7% के भूखंड नहीं मिले हैं, जिसके लिए वे विधायक से लेकर प्राधिकरण के अधिकारियों तक के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। किसानों का आरोप है कि जमीन अधिगृहीत कर चुके गांवों में उन्हें मॉडल विलेज का सपना दिखाया गया, सड़क, सीवर, स्ट्रीट लाइट और पानी की लाइनें बिछाई गईं, लेकिन आज तक न तो लाइन में पानी पहुंचा और न ही सीवर का कनेक्शन मिला। करोड़ों की लागत से विकसित ढांचा तहस-नहस होता जा रहा है।
इससे भी बड़ी बात यह है कि 25 वर्ष में बीते कई वर्षो से भी यमुना प्राधिकरण को अपना पूर्णकालिक सीईओ नहीं मिला है, जो इसकी अस्थिर प्रकृति और दीर्घकालिक नेतृत्व की कमी को दर्शाता है। यहां तक कि यमुना प्राधिकरण के इस क्षेत्र को नोएडा या ग्रेटर नोएडा की तरह कोई शहर का अपना विशिष्ट नाम नहीं दिया गया है; आज भी लोग इसे ग्रेटर नोएडा के नाम से ही जानते हैं।
ऐसे में, प्रश्न यह है कि 25 वर्ष बाद यमुना प्राधिकरण भले ही विकास के तमाम दावे कर रहा हो और उत्तर प्रदेश सरकार यहां आने वाले निवेश की गाथाएं गा रही हो, पर धरातल पर यह शहर वास्तविक विकास से अभी कोसों दूर है। यहां आए उद्योगपतियों और निवासियों के लिए यह महज झूठे वादों का प्राधिकरण बनके रह गया है, या फिर टूटे सपनों का एक औद्योगिक शहर!


