ग्रेटर नोएडा: ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण के समक्ष अपनी जायज मांगों को लेकर डटे किसानों के आंदोलन ने अब एक बेहद गंभीर और निर्णायक मोड़ ले लिया है। धरने के छठे दिन आयोजित विशाल महापंचायत में उमड़ी हजारों किसानों की भीड़ ने यह साफ कर दिया है कि यह आंदोलन अब केवल एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन और शासन की नीतियों के खिलाफ एक बड़ा जन-आक्रोश बन चुका है। बाबा बाली की अध्यक्षता और नंबरदार उम्मीद त्यागी व सुशांत भाटी के कुशल संचालन में हुई इस महापंचायत ने सीधे तौर पर व्यवस्था को चुनौती दी है।
संवेदनहीनता की सीमा लांघता प्रशासन
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सुखबीर खलीफा ने महापंचायत को संबोधित करते हुए जो चिंताएं व्यक्त कीं, वे बेहद विचारणीय हैं। किसान बीते 17 जुलाई से लगातार अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं, लेकिन प्राधिकरण, जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार का इस कदर मौन रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनभावनाओं की घोर उपेक्षा को दर्शाता है। अभी तक प्रशासन की ओर से वार्ता का कोई ठोस प्रस्ताव न आना न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह किसानों के धैर्य की परीक्षा लेने जैसा है। जैसा कि खलीफा ने चेतावनी दी, इस उपेक्षा का खामियाजा अंततः सरकार और प्राधिकरण को ही भुगतना पड़ेगा।
10% आबादी भूखंड: अधिकारों की लड़ाई
किसान एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोरन प्रधान ने स्पष्ट किया कि ‘किसान संघर्ष मोर्चा’ इस बार किसी भी समझौते के मूड में नहीं है। भूमि अधिग्रहण की विसंगतियों के बीच, 10 प्रतिशत आबादी के भूखंड का अधिकार किसानों के अस्तित्व और आजीविका से जुड़ा मुद्दा है। इसे नजरअंदाज कर प्राधिकरण एक बड़ी ऐतिहासिक भूल कर रहा है।
21 सितंबर: आर-पार की जंग का ऐलान
महापंचायत में जिस रणनीति पर मुहर लगी है, उसने प्रशासन के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी होंगी। किसान सभा के जिला अध्यक्ष डॉ. रुपेश वर्मा के नेतृत्व में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि प्राधिकरण को समस्याओं के समाधान के लिए 20 सितंबर तक का अंतिम समय (अल्टीमेटम) दिया जा रहा है।
यदि इस निर्धारित अवधि में किसानों की बुनियादी समस्याओं का न्यायसंगत समाधान नहीं निकाला गया, तो 21 सितंबर को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में पूर्ण तालाबंदी कर दी जाएगी। इसके बाद हजारों की संख्या में किसान प्राधिकरण परिसर के भीतर ही अपना डेरा जमा लेंगे, जिससे प्रशासनिक कामकाज पूरी तरह ठप होना तय है।





