बेलाग लपेट : ये तेरा, ये मेरा के खांचे में पत्रकार ओर पत्रकारिता का दोनों का हो रहा अपमान, इस अपमान में पार्टियों की दलाली कर रहे पत्रकार भी है दोषी!

आशु भटनागर
7 Min Read

आशु भटनागर। शनिवार को लखनऊ में वह हुआ जिसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रश्न पूछने की चेष्टा करने वाली एक पत्रकार दिव्या ने कल्पना भी नहीं की । दरअसल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी के कार्यक्रमों को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के उठाते उठाते लखनऊ की एक पत्रकार दिव्या ने प्रश्न पूछने की कोशिश की मुख्यमंत्री भी उसे प्रश्न पर मुस्कुराते हुए हाथ हिलाकर चले गए। यह कोई बड़ी घटना नहीं है आमतौर पर नेताओं और पत्रकारों के बीच ऐसे ही संवाद होता है। पत्रकार प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रश्न पूछना चाहते हैं नेता उससे बचाना चाहते हैं इसमें पक्ष विपक्ष सत्ता और उसके विरोधी सब नेता एक जैसे ही है ।

- Support Us for Independent Journalism-
Ad image

किंतु रील पत्रकारिता के दौर में यह वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर विपक्ष के हाथ लगा तो स्वयं विपक्ष के बड़े नेता इस मौका मानते हुए मुख्यमंत्री पर हमलावर हो गए ।
इसके बचाव में भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल में पत्रकार को समाजवादी पार्टी का पालतू पत्रकार घोषित करने की मुहिम शुरू कर दी। पत्रकार दिव्या के हंसते हुए फोटो और वीडियो सर्कुलेट किए जाने लगे यह कहा जाने लगा कि इसका संबंध समाजवादी पार्टी या कांग्रेस से है।

- Advertisement -
Ad image

बस यही मेरा विरोध है

क्या एक पत्रकार का संबंध किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं से होना पाप है? या क्या एक पत्रकार के संबंध राजनेताओं से नहीं हो सकते है ? क्या पत्रकार किसी ऐसी अछूत बस्ती के लोग हैं जो सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस और किसी आंदोलन, उत्पीड़न के समय अचानक प्रकट होकर खबरें छापकर कहीं दूसरी दुनिया वापस चले जाते हैं ?

- Advertisement -
Ad image

तो जब आईटी सेल और सोशल मीडिया की चमकती दुनिया में चर्चा इस पर होनी चाहिए थी कि क्या राजनेताओं और पत्रकारों के बीच के संबंध अब प्रश्न और उत्तर लायक नहीं रहे हैं, तब चर्चाएं इस बात पर हो रही थी कि हमारी पार्टी के नेता से इस पत्रकार ने प्रश्न कैसे कर लिए, बकौल दिव्या उसके घर LIU के फोन आने लगे उसको भाजपा के लोग यह कहकर डरने लगे कि उसके घर बुलडोजर चलेगा ।

भाजपा के लोगों से भी अधिक बड़ा काम बीजेपी के नेताओं द्वारा चलाए जा रहे कथित मीडिया चैनल और न्यूज़ पोर्टल के मालिकों ने किया उन्होंने बाकायदा दिव्या को सपाई एजेंट घोषित कर दिया तो कइयों ने पत्रकार होते हुए उसको लेकर तमाम अभद्र बातें तक कहीं ।

यहीं पर पत्रकारों और उनके संस्थाओं के कथित संपादकों या मालिकों की नीयत पर भी प्रश्न खड़े होते हैं ।

दुखद ये है कि भक्तिकाल के इस दौर में एक प्रश्न पूछने की कीमत एक पत्रकार को इतनी चुकानी पड़ेगी यह उसने सोचा नहीं होगा वह अलग बात है कि इस देश में सदियों से पत्रकारों को प्रश्न पूछने की कीमत अपनी जान देकर भी चुकानी पड़ी है ।
पर यह सिर्फ भाजपा के साथ हो ऐसा नहीं है समाजवादी पार्टी में भी ऐसा ही होता रहा है और कांग्रेस में भी असल में सत्ता सिर्फ सरकार चलाने का नाम नहीं है। सत्ता उस पावर या अथॉरिटी का नाम है जो किसी भी कारण से आपको निरंकुश होने का मौका देती है और राजनीति कर रहे हर दल के नेताओं में वह निरंकुशता ऐसे ही पाई जाती है ।

पत्रकारों पर लेनदेन के आरोप लगाने वाले ये पत्रकार को देते क्या है? हर रोज अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे नेताओं ने कभी यह सोचा है कि हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में जाने के लिए हर पत्रकार का काम से कम 200 से ₹500 का तेल खर्च होता है, वह पैसे कहां से आते हैं पत्रकार क्या सिर्फ नौकरी के ₹20000 से आपकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आ जा सकता है । जी हां एक अनस्किल्ड लेबर के बराबर औसतन सैलरी पाता है पत्रकार। उसको चाय पकौड़े और एक पानी की बोतल देकर आप उसे अपनी पार्टी के प्रचार की अपेक्षा करने लगते हैं । वह सवाल पूछ लेता है तो आपको वह विरोधी पार्टी का पत्रकार लगने लगता है । पत्रकार आपकी चाय पीने नहीं आता है पत्रकार आपके यहां से खबर लेने आता है वह खबर आपके मन के अनुसार नहीं हो सकती है ।

पिछले सप्ताह समाजवादी पार्टी के एक नेता ने उनके विरुद्ध जा रहे भक्तिकाल के एक समाचार पर ऐसे ही मुझे भी भाजपा का एजेंट और पैकेज लेकर जैसे तमाम आरोप लगाकर अपना आक्रोश व्यक्त किया। भाजपा वाले तो वैसे ही मुझे उनके विरोध में लिखी जारी खबरों को लेकर कुढ़ते रहते ही हैं।

फिर भी 27 के विधान सभा चुनाव में टिकट की दौड़ में शामिल उस नेता पर मुझे तरस भी आया और मेरे मन में आया कि क्यों ना इस नेता के बयान को लेकर भाजपा नेताओं से कहूं कि तुम्हारे नाम पर बदनाम हो रहा हूं, कम से कम उसे नेता के आरोप के अनुसार पैकेज तो पहुंचा दो। फिर मुझे हंसी आई कि भाजपा नेता उनसे भी बड़े वाले वैचारिक दिवालियापन के शिकार हैं।

खैर वापस मुद्दे पर आते हैं पत्रकारिता में अपनी हताशा के लिए पत्रकारों के चरित्र हनन की कोशिश करने वाले नेता सामाजिक सभी या फिर कोई भी हो वह दरअसल अपना नुकसान कर रहे हैं क्योंकि पत्रकार हमेशा पीड़ित के साथ खड़ा होता है। सत्ताएं बदलती रहती है ऐसे में अपने राजनीतिक समर्थकों की आड़ में अगर आप उसे पीड़ित करने की कोशिश करेंगे तो कल को जब आप पीड़ित होंगे तो आपके साथ कोई पत्रकार नहीं खड़ा होगा बस यही ध्यान देने की बात है।

Share This Article
आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे