नोएडा जैसे आधुनिक और योजनाबद्ध शहर में जब भी प्रशासन कोई कड़ा कदम उठाता है, तो वह चर्चा का विषय बन जाता है। शुक्रवार को सीईओ कृष्णा करुणेश के आदेश पर नोएडा प्राधिकरण ने कुछ ऐसा ही किया, जिसकी अपेक्षाए नोएडा के लोगो ने छोड़ दीं थी। प्राधिकरण की टीम ने हाजीपुर क्षेत्र में ‘डब्लू मॉल’ के नाम से बन रही एक पांच मंजिला अवैध इमारत को ढहाने की कार्रवाई शुरू की। यह कार्रवाई कोई जल्दबाजी में लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि प्राधिकरण ने बकायदा इसके खिलाफ कोर्ट में केस जीता और उसके बाद कानूनी प्रक्रिया के तहत इसे ध्वस्त करने का काम शुरू किया।
लेकिन इस साहसिक और कानूनी कार्रवाई के बाद शहर में एक अजीब सा माहौल देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां इस कार्रवाई से भू-माफियाओं में हड़कंप मच गया है, वहीं दूसरी तरफ मीडिया और सोशल मीडिया के एक हिस्से में इस कार्रवाई को लेकर तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जैसे ही अवैध ‘डब्लू मॉल’ पर बुलडोजर चला, वैसे ही प्राधिकरण के पूर्व अधिकारियों और भू-माफियाओं के बीच कथित लेन-देन और पुराने घोटालों की खबरें तैरने लगीं। यहां सवाल यह उठता है कि आखिर इस समय खुला खेल फर्रुखाबादी जैसी इन खबरों को हवा देने का उद्देश्य क्या है? क्या यह वर्तमान अधिकारियों पर दबाव बनाने की कोशिश है ताकि वे आगे ऐसी कार्रवाई करने से पीछे हट जाएं? या फिर इसके बहाने फिर से अपने खोये हुए अतीत को पाने की आखरी कोशिश।
कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि “इस क्षेत्र में और भी कई अवैध इमारतें हैं, उन्हें क्यों नहीं तोड़ा गया?” इस बहाने पूरी कार्रवाई को छोटा दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। निश्चित तौर पर नोएडा के निवासियों को यह सोचना होगा कि क्या किसी एक अवैध निर्माण पर हुई सही कार्रवाई का विरोध इसलिए होना चाहिए कि बाकी अवैध निर्माण अभी भी खड़े हैं? क्या यह तर्क सही है?
एक निष्पक्ष दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह सच है कि नोएडा प्राधिकरण के भीतर भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। नोएडा को उत्तर प्रदेश का ‘शो विंडो’ कहा जाता है, लेकिन यह भी हकीकत है कि संविदा पर काम कर रहे सुपरवाइजरों और प्रबंधकों (मैनेजर्स) की मिलीभगत के बिना ऐसे बड़े अवैध निर्माण खड़े नहीं हो सकते। यह भी जगजाहिर है कि ‘धारा 10’ के नाम पर अवैध निर्माणों को ढहाने से ज्यादा कई बार ब्लैकमेलिंग का खेल खेला जाता है।

सच तो ये है कि अवैध निर्माणों के पीछे केवल नोएडा प्राधिकरण की प्रशासनिक विफलता ही नहीं, बल्कि भारी राजनीतिक दबाव भी होता है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, नेताओं का संरक्षण इन भू-माफियाओं को मिलता रहा है। हाल ही में इसी क्षेत्र में करीब ढाई हजार मीटर के खसरे पर कमर्शियल प्लॉट काटने में जुटे विपक्ष के एक बड़े नेता का मामला सामने आया था, जिन्होंने प्राधिकरण के एक एसीईओ अधिकारी पर दबाव बनाने का प्रयास किया था। वो अलग बात है कि मैं झुकेगा नहीं **छवि वाले एसीईओ के निर्देश पर प्राधिकरण ने कोई राहत नहीं दी है और उसके बाद भी उन खसरो पर आम जनता को किसी भी प्रकार की खरीदारी से बचने का आग्रह किया है।
नोएडा के आम नागरिकों और स्थानीय निवासियों के तौर पर हमें यह समझना होगा कि इस शहर का विकास और सुरक्षा कानून के दायरे में ही संभव है। यदि प्राधिकरण का कोई अधिकारी सालों के राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव को दरकिनार कर, न्यायालय का आदेश लेकर किसी बड़े अवैध निर्माण को ढहाने का साहस दिखाता है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।यदि हम सोशल मीडिया पर हर सही कार्रवाई के पीछे भी ‘भ्रष्टाचार’ का रोना रोएंगे और अधिकारियों को हतोत्साहित करेंगे, तो परोक्ष रूप से हम उन भू-माफियाओं का ही भला कर रहे होंगे जो हमारे शहर को कंक्रीट के अवैध जंगल में तब्दील करना चाहते हैं।
प्राधिकरण में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई जारी रहनी चाहिए, लेकिन जब कोई सही कदम उठाया जाए, तो उसकी सराहना भी होनी चाहिए। ‘डब्लू मॉल’ पर हुई कार्रवाई नोएडा को अवैध अतिक्रमण से मुक्त कराने की दिशा में एक सही कदम है। हंगामा बरपाने के बजाय, हमें इस बात की निगरानी करनी चाहिए कि यह बुलडोजर बिना किसी भेदभाव के हर उस अवैध निर्माण पर चले जो नोएडा की कानून-व्यवस्था और नोएडा की सुंदरता को चुनौती दे रहा है।





