संस्मरण : 2002 में हुए विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा संगठन द्वारा किया गया वैश्य सम्मेलन बन गया बालेश्वर त्यागी की हार का कारण, जानिए स्वयं बालेश्वर त्यागी से

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बालेश्वर त्यागी। गाजियाबाद विधान सभा सीट में 1952 से लेकर अब तक परिसीमन में कई परिवर्तन हुए हैं। लेकिन गाजियाबाद का मुख्य बाजार उसका केंद्र रहा है. देश में आख़िरी बार जातीय गणना अंग्रेजों ने 1932 में कराई थी। इसलिए जो भी जातियों के आंकड़े अखबारों में छपते हैं या नेताओं के चुनावी गणित में बताए जाते हैं, वे सभी अनुमान हैं, वास्तविकता से उसका कोई संबंध नहीं है। लेकिन जातीय आधार पर गाजियाबाद को लेकर अक्सर वैश्य और ब्राह्मणों के जातीय संगठनों के बीच रस्साकसी होती रहती है। इस बार भी विधान सभा चुनाव निकट देखकर पहले वैश्य समाज और फिर ब्राह्मण समाज ने सम्मेलन कर अपनी दावेदारी को बल देने के प्रयास अधिक लगते हैं। इन सम्मेलनों से मतों पर तो कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन चुनाव का माहौल बिगाड़ने में जरूर भूमिका अदा कर देते हैं।

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गाजियाबाद सीट पर अब तक 19 बार विधान सभा चुनाव हुए हैं। दो बार सरदार तेजा सिंह, तीन बार प्यारेलाल शर्मा, तीन बार सुरेंद्र मुन्नी, तीन बार मैं ( बालेश्वर त्यागी), एक बार राजेंद्र चौधरी, एक बार के के शर्मा, एक बार सुरेंद्र गोयल, एक बार सुनील शर्मा, एक बार सुरेश बंसल, दो बार अतुल गर्ग और पहली बार संजीव शर्मा विधायक चुने गए हैं। भाजपा के वैश्य प्रत्याशी 1957 में पी चंद्रा, तीन बार दिनेशचंद गर्ग (1967, 1980और 1985), सुनीता दयाल जी ( 2004), अतुल गर्ग ( 2014 ,2019 ,2022 ) चुनाव लड़े हैं। इनमें भाजपा के अतुल गर्ग दो बार सफल हैं। गाजियाबाद से वैश्य समाज से पहली बार कांग्रेस के टिकट पर सुरेंद्र गोयल सफल हुए हैं और दूसरे बसपा से सुरेश बंसल सफ़ल हुए हैं।

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2014 के चुनाव से पहले फिर एक बार परिसीमन मे गाजियाबाद सीट में परिवर्तन हुआ है। इसमें से गाजियाबाद की कई पौश कॉलोनियां, नेहरूनगर, कविनगर, राजनगर, शास्त्रीनगर , कमला नेहरूनगर, संजय नगर, गोविंदपुरम गाजियाबाद से कट कर मुरादनगर विधान सभा क्षेत्र में जोड़ दी गई हैं। आज जो गाजियाबाद शहर में व्यापारिक संस्थान हैं उनके संचालक अधिकतम मुरादनगर क्षेत्र की कॉलोनियों में रहते हैं। एक तरह से अब की गाजियाबाद विधान सभा में से वैश्य समाज के मतदाताओं की बड़ी संख्या मुराद नगर में शिफ्ट हो जाने के कारण शहर में उनकी शक्ति और कम हुई है। पता नहीं टिकट निर्धारण में भाजपा नेतृत्व इसे किस नजरिए से देखता है। संजीव शर्मा ने अपने विधायक के अल्प काल में अपनी सक्रियता और सर्व सुलभता से अपना जनाधार बढ़ाया है। उनके विरोध में कुछ भी नकारात्मक नहीं दिखाई देता अब भाजपा का संसदीय बोर्ड क्या निर्णय करता है ,इस संबंध में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

2002 में हुए विधान सभा चुनाव से पहले भाजपा संगठन ने वैश्य सम्मेलन का आयोजन किया था.मुख्य मंत्री राजनाथ सिंह जी उसमें मुख्य अतिथि थे। उस समय कलराज मिश्रा जी प्रदेश अध्यक्ष थे। मैं प्रदेश सरकार में मंत्री था। मैं कलराज जी के पास गया और हाथ जोड़कर कहा था कि आप मुझे टिकट दोगे तो चुनाव लड़ूंगा और नहीं दोगे तो नहीं लड़ूंगा लेकिन गाजियाबाद में वैश्य सम्मेलन मत करो। कलराज जी ने पूछा क्यों ? मैने कहा कि अगर सम्मेलन के बाद मेरा टिकट कटेगा तो संदेश जाएगा कि वैश्य समाज ने एक भले आदमी का टिकट छीन लिया जिसका चुनाव में कुछ न कुछ नुकसान होगा और अगर मुझे टिकट मिला तो सम्मेलन की तैयारी में वैश्य समाज में इतनी तीव्रता आ जाएगी कि मुझे उन्हें मनाना मुश्किल हो जाएगा और मैं चुनाव हार जाऊंगा।

उन्होंने कहा कि मैं आपसे सहमत हूं, लेकिन मैं सम्मेलन नहीं रोक सकता हूं। संयोग से उस चुनाव में सुरेंद्र गोयल कांग्रेस से प्रत्याशी हो गए। भाजपा के वैश्य समाज के उन नेताओं ने जो प्रत्याशी बनने को इच्छुक थे, अपने लिए मेरे निगेटिव जो वातावरण बनाया था , उसका सीधा लाभ सुरेंद्र गोयल को मिल गया और मैं 4500 वोट से चुनाव हार गया।चुनाव हारने के बाद जब मैं लखनऊ गया तो पूर्व मुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्ता जी से मिला। उन्होंने कहा कि हमने तो बहुत प्रयास किया कि गाजियाबाद में वैश्य सम्मेलन न हो। सम्मेलन वहां करो जहां वैश्य प्रत्याशी बना रहे हो। आप गाजियाबाद में वैश्य सम्मेलन करोगे और टिकट बालेश्वर त्यागी को दोगे तो प्रत्याशी हार जाएगा, लेकिन हमारी बात नहीं सुनी गई। जब मेरी भेंट राजनाथ सिंह जी से हुई जो मुख्य मंत्री थे, उन्होंने कहा कि तुम कैसे हार गए ? मैने कहा कि वैश्य सम्मेलन के कारण तब राजनाथ सिंह जी कहा कि मुझे भी एलआइयू ने भी ये ही रिपोर्ट दी थी कि सम्मेलन से आपका प्रत्याशी हार जाएगा। मैने पूछा कि फिर सम्मेलन क्यों हुआ तब उन्होंने एक पदाधिकारी का नाम लेकर कहा कि वे नहीं माने।

मेरा आज भी मत है कि चुनाव एक जाति की वोट से नहीं जीता जाता है। चुनाव वही जीतता है जिसे सभी जातियों का वोट मिलता है। जातियों के सम्मेलन से वोट पर कितना प्रभाव पड़ता है ये तो पता नहीं लेकिन उससे फ्लोटिंग मतदाता जरूर भ्रमित हो जाता है और अगर जीत हार का अंतर कम होता है तो हवा से प्रभावित होकर वोट देने वाला जरूर खिसक जाता है। मेरे उस चुनाव में दिल्ली की एक एजेंसी ने सर्वे किया था। उसने दो रिपोर्ट तैयार की थी, एक चुनाव की घोषणा के साथ और दूसरी चुनाव से पांच दिन पहले। पहली रिपोर्ट में कहा था कि 50000,से जीत हो सकती है. दूसरी रिपोर्ट में कहा कि जीत का अंतर 5000 है। अभी हवा के साथ चलने वाले मतदाता ने निर्णय नहीं किया है, अगर वह आपके पक्ष में निर्णय करता है तो जीत का अंतर दुगना हो जाएगा और अगर वह आपके विरुद्ध निर्णय करता है तो इतने ही वोटों से परिणाम बदल सकता है। उस सर्वे की रिपोर्ट एकदम सटीक निकली .फ्लोटिंग वोट मेरे विरुद्ध गया। जातीय सम्मेलन हवा उखाड़ने में जरूर भूमिका निभाते हैं, जीत में कितनी भूमिका है, पता नहीं।


लेखक भाजपा से गाजियाबाद के विधायक रहे है लेख में दिए विचारो से एनसीआर खबर का सहमत होना आवश्यक नहीं है

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