नई दिल्ली: शहरी नियोजन (Urban Planning) और बुनियादी ढांचे के विकास पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा के दीर्घकालिक विजन की सराहना की है। इसके साथ ही अदालत ने गुरुग्राम के नागरिक बुनियादी ढांचे की कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि गुरुग्राम की जल निकासी (Drainage) और सीवेज जैसी बुनियादी व्यवस्थाएं बारिश के दौरान पूरी तरह “धराशाई” हो जाती हैं, क्योंकि जिम्मेदार अधिकारी समय रहते बुनियादी सुविधाओं में निवेश करने में विफल रहे हैं।
यह टिप्पणियां न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं, जिसमें राज्य सरकार की ‘प्रीमियम फ्लोर एरिया रेशियो’ (FAR) योजना को बरकरार रखा गया था। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी पीठ का हिस्सा थे।
गुरुग्राम बनाम ग्रेटर नोएडा: योजना का अंतर
सुनवाई के दौरान पीठ ने अनियोजित शहरीकरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने कहा, “हमने गुरुग्राम में देखा है कि प्राकृतिक आपदा या भारी बारिश आने पर वहां की व्यवस्था कैसे ध्वस्त हो जाती है। इसका कारण यह है कि बुनियादी ढांचे को मजबूत किए बिना, केवल भूखंड के आकार पर कई मंजिलें बनाने की अनुमति देकर सिस्टम पर अत्यधिक बोझ डाल दिया गया है।”
इसके विपरीत, कोर्ट ने ग्रेटर नोएडा की योजना की सराहना करते हुए कहा कि वहां ऐसी ढांचागत समस्याएं नहीं देखी जातीं, क्योंकि उसकी योजना अगले 30-40 वर्षों के भविष्योन्मुखी परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।
क्या है ‘प्रीमियम FAR’ का पूरा मामला?
फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) किसी भी इमारत के कुल निर्मित क्षेत्र (फ्लोर एरिया) और उस भूमि के कुल आकार का अनुपात होता है जिस पर वह इमारत बनी है। प्रीमियम FAR योजना के तहत डेवलपर्स को अतिरिक्त शुल्क का भुगतान करके निर्धारित सीमा से अधिक निर्माण करने की अनुमति मिलती है।
जून में, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इस प्रीमियम FAR योजना की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था। उच्च न्यायालय ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था जिनमें दावा किया गया था कि यह योजना संपत्ति के अधिकारों का उल्लंघन करती है और हस्तांतरणीय विकास अधिकारों (TDR) के मूल्य को कम करती है। इसके बाद गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘सिटीजन्स एक्शन फोरम’ ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता (NGO) का पक्ष: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी ने तर्क दिया कि प्रीमियम FAR देने के लिए केवल “सड़क की चौड़ाई” को एकमात्र पैमाना बना दिया गया है। उन्होंने चिंता जताई कि इसके कारण बेंगलुरु में पहले से ही अत्यधिक दबाव झेल रहे पानी, बिजली, पार्किंग और यातायात जैसे बुनियादी ढांचों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि नई योजना का उपयोग पिछली ‘अक्रमा-सक्रमा’ योजना की तरह मौजूदा अवैध निर्माणों को नियमित करने के लिए किया जा सकता है।
विभिन्न राज्य प्राधिकरणों का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने इन तर्कों का खंडन किया। मेहता ने स्पष्ट किया कि अतिरिक्त FAR की सीमा केवल 0.6 तक ही सीमित है और डेवलपर्स के लिए मौजूदा सेटबैक और पार्किंग नियमों का अनुपालन करना अनिवार्य होगा।
एसजी मेहता ने अदालत को आश्वस्त किया कि इस योजना के तहत एकत्र की जाने वाली राशि विशेष रूप से नागरिक बुनियादी ढांचे के सुधार के लिए समर्पित कोष में जाएगी। उन्होंने तर्क दिया कि सीमित शहरी भूमि के कारण ‘ऊर्ध्वाधर विकास’ (Vertical Development) ही एकमात्र उपाय है।
सॉलिसीटर जनरल का आश्वासन और कोर्ट का रुख
अवैध निर्माणों को वैध बनाने की आशंका पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि इस नई योजना के तहत किसी भी अनधिकृत निर्माण को नियमित नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा, “अक्रमा-सक्रमा योजना के तहत आने वाले किसी भी अवैध निर्माण का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मेरा यह बयान रिकॉर्ड पर लिया जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ किया कि किसी भी स्थिति में अतिरिक्त FAR का उपयोग अवैध निर्माणों को नियमित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने बेंगलुरु के नागरिक अधिकारियों को याचिका पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। पेशेवर और शहरी योजनाकारों के लिए यह मामला इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह भविष्य में टिकाऊ शहरी विकास (Sustainable Urban Development) की दिशा तय कर सकता है।




