आशु भटनागर। जब देश के थर्मल पावर प्लांटों में कोयले का स्टॉक खतरनाक स्तर तक नीचे गिर रहा हो और आने वाले दिनों में ब्लैकआउट का खतरा मंडरा रहा हो, तब देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) की प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए? जवाब साफ है—खदानों में उत्पादन बढ़ाना और रेलवे रेक के जरिए त्वरित आपूर्ति सुनिश्चित करना। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जब देश को कोयले की सख्त जरूरत है, तब कोल इंडिया का शीर्ष प्रबंधन कोलकाता स्थित मुख्यालय में कविताओं की पंक्तियों और सांस्कृतिक उत्सवों में तालियां बजवा रहा है।
सरकारी कोयला कंपनी CIL के आधिकारिक डैशबोर्ड के आंकड़े एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। 17 सितंबर 2026 तक कंपनी का YTD (वर्ष-दर-तारीख) उत्पादन केवल 297.07 मिलियन टन (MT) रहा, जबकि इसी अवधि का लक्ष्य 325.84 मिलियन टन निर्धारित किया गया था। यानी कंपनी अपने निर्धारित लक्ष्य से करीब 28.77 मिलियन टन पीछे चल रही है और लक्ष्य हासिल करने की दर महज 91.17 प्रतिशत ही रह गई है।
समस्या एक दिन की नहीं, लगातार लापरवाही का नतीजा
यह गिरावट कोई अचानक आई आपदा नहीं है, बल्कि पिछले कई हफ्तों से बनते दबाव का नतीजा है। इससे पहले जुलाई 2026 में भी कोल इंडिया निर्धारित मासिक उत्पादन लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रही थी। जुलाई में 53.70 मिलियन टन के लक्ष्य के मुकाबले महज 50.36 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ था (लक्ष्य का 93.78%)।
जुलाई के दौरान अनुषंगी (subsidiaries) कंपनियों का प्रदर्शन भी निराशाजनक रहा:
भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (BCCL): 2.69 MT लक्ष्य के मुकाबले 2.45 MT उत्पादन (91.08%)।
महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड (MCL): सबसे खराब प्रदर्शन करते हुए 15.57 MT के लक्ष्य के मुकाबले केवल 13.14 MT उत्पादन (84.40%)।
साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL): 94.55% लक्ष्य ही हासिल कर सकी।
सेंट्रल कोलफील्ड्स (CCL) और नार्दर्न कोलफील्ड्स (NCL): क्रमशः 97.20% और 96.97% पर अटकी रहीं।
इस क्रम में केवल वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) और ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ECL) ही लक्ष्य से अधिक उत्पादन कर सकीं। कोयला मंत्रालय ने उत्पादन और प्रेषण (dispatch) में पिछड़ने वाली कंपनियों के रवैये को बेहद गंभीरता से लिया था, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका कोई असर देखने को नहीं मिल रहा है।
सवाल कार्यक्रम पर नहीं, प्राथमिकताओं और जवाबदेही पर है
एक तरफ कोयला मंत्रालय दबाव बना रहा है और आम जनता बिजली कटौती के डर में जी रही है, वहीं दूसरी तरफ कोल इंडिया का शीर्ष प्रबंधन अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े बैठा है। जानकारी के अनुसार, अध्यक्ष बी. साईराम के निर्देशन में कोल इंडिया मुख्यालय (कोलकाता) में ‘हिंदी माह’, निवारक सतर्कता अभियान और सतर्कता जागरूकता सप्ताह 2026 की पूर्व तैयारी के नाम पर “सत्यनिष्ठा के स्वर” शीर्षक से कवि सम्मेलन आयोजित करने में समय और संसाधन खपाए जा रहे हैं।
साहित्य, भाषा प्रेम और नैतिक मूल्यों का संवर्धन अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह समय कविता पाठ का है? जब देश के पावर प्लांटों के पास कुछ ही दिनों का कोयला बचा हो, तब शीर्ष प्रबंधन की इस “सांस्कृतिक व्यस्तता” पर सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं, बल्कि बेहद जरूरी है।
आम जनता पर मंडराता बिजली संकट का खतरा!
कोल इंडिया के इस लचर रवैये का सीधा खामियाजा स्थानीय निवासियों और आम उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ सकता है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़े बताते हैं कि स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। 19 सितंबर 2026 तक की रिपोर्ट की माने तो देश के 190 निगरानी वाले थर्मल पावर प्लांटों में से 74 प्लांट ‘क्रिटिकल स्टॉक’ (गंभीर रूप से कम कोयला) की स्थिति में थे। 23 सितंबर की रिपोर्ट में स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई पावर प्लांटों के पास 5 दिन से भी कम का कोयला बचा है।
अतिरिक्त रेलवे रेक्स (railway rakes) की व्यवस्था करने और सप्लाई बढ़ाने के दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन जब खदानों से कोयला निकला ही नहीं है, तो रेक में क्या लादा जाएगा?
कोल इंडिया के सामने आज केवल कोयला निकालने की चुनौती नहीं है, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने की भारी जिम्मेदारी है। अगर समय रहते उत्पादन में आई इस 2.87 करोड़ टन की कमी की भरपाई नहीं की गई, तो देश के कई राज्यों में भीषण बिजली कटौती का सामना करना पड़ सकता है, जिसका सीधा असर आम नागरिक के जीवन और स्थानीय व्यापार पर पड़ेगा।
कोल इंडिया प्रबंधन को यह समझना होगा कि देश को इस वक्त ‘सत्यनिष्ठा के स्वर’ की कविताओं से ज्यादा खदानों में चल रही मशीनों की आवाज की जरूरत है। अध्यक्ष बी. साईराम और उनकी टीम को अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्गठित करना होगा। उत्सव बाद में भी मनाए जा सकते हैं, लेकिन यदि देश अंधेरे में डूब गया, तो इसकी जिम्मेदारी से कोल इंडिया का प्रबंधन बच नहीं पाएगा।




