गौतमबुद्ध नगर की राजनीति में बड़ा फेरबदल: दादरी बनी जिले की सबसे बड़ी विधानसभा, बदलेगा सियासी समीकरण! क्या दादरी अब चुनेगी अपना विकासपुरुष?

NCR Khabar Internet Desk
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आशु भटनागर। गौतमबुद्ध नगर जिले में शुक्रवार को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची ने जिले के सियासी नक्शे को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। एक समय जो दादरी कभी अपनी परंपरागत ग्रामीण जाति आधारित राजनीति के लिए जानी जाती थी, आज वह 6,05,204 मतदाताओं के साथ जिले की सबसे बड़ी विधानसभा बनकर उभरी है। इस बदलाव ने नोएडा और जेवर की राजनीतिक चमक को पीछे छोड़ दिया है और आने वाले चुनावों में नए समीकरणों की नींव रख दी है।

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अंकगणित में दादरी का दबदबा नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, दादरी में मतदाताओं की संख्या 6,05,204 हो गई है, जबकि नोएडा 5,87,195 मतदाताओं के साथ दूसरे और जेवर 3,12,683 मतदाताओं के साथ तीसरे स्थान पर है। दिलचस्प बात यह है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान दादरी से 1,21,624 नाम हटने के बावजूद, 42,533 नए मतदाताओं के जुड़ने से इसने नोएडा को 18,009 वोटों के अंतर से पछाड़ दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे ग्रेटर नोएडा वेस्ट में फ्लैटों की रजिस्ट्री और पजेशन बढ़ेगा, आगामी चुनाव तक यहाँ 1 लाख और नए मतदाता जुड़ सकते हैं।

बदलती डेमोग्राफी: क्या दादरी की राजनीति में आएगा ‘नोएडा मॉडल’?

दादरी का यह चुनावी विस्तार केवल संख्यात्मक नहीं है, यह गुणात्मक बदलाव का संकेत है। वर्ष 2012 में दादरी में कुल 3,43,677 मतदाता थे, जहाँ स्थानीय गुर्जर समुदाय का दबदबा निर्विवाद था। उस समय जातिगत समीकरणों में गुर्जर समाज की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत (स्थानीय वोटों का 40%) थी।

मगर अब स्थिति बिल्कुल उलट है। ग्रेटर नोएडा वेस्ट में आकर बसे 2.61 लाख से अधिक नए शहरी मतदाता पूरी राजनीति को ‘अर्बन-सेंट्रिक’ बना रहे हैं। यहाँ अब ब्राह्मण, कायस्थ, ठाकुर, पंजाबी और अन्य ओबीसी जातियों (यादव, कुर्मी) के साथ-साथ पूर्वांचल और पहाड़ी मूल के मतदाताओं की निर्णायक भूमिका हो गई है। यह मिश्रण दादरी की परंपरागत राजनीति को एक नई दिशा दे रहा है।

क्या दादरी अब चुनेगी अपना विकासपुरुष?

राजनीतिक गलियारों में अब यह चर्चा जोरों पर है कि क्या दादरी भी नोएडा की राह पर चल पड़ी है? जिस तरह नोएडा की शहरी आबादी ने अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई और डॉ. महेश शर्मा जैसे सर्वसमाज को स्वीकार्य चेहरे को राजनीतिक ऊंचाई दी, क्या वैसी ही स्थिति दादरी में भी पैदा हो रही है?

दरअसल इस प्रश्न को समझने के लिए हमें पीछे बीते दिनों दादरी विधान सभा में समाजवादी पार्टी की गुर्जर समुदाय की रैली के नाम पर टिकट साधने की राजनीती को समझना होगा I इस रैली को गुर्जर समुदाय के राजनैतिक दलों में अपनी भागीदारी की लड़ाई के तोर पर देखा गया था। विपक्ष में दावेदार अभी जाति के आधार पर ही टिकट मांग रहे है, जबकि भाजपा से वर्तमान में गुर्जर जाति से आने के बाबजूद विधायक तेजपाल नागर ने अपना राजनैतिक चरित्र सर्वसमाज के लिए परिवर्तित कर लिया है वो लगातार लोगो के बीच अपनी जाति की जगह एक स्वीकार्य विकास पुरुष की छवि गढ़ रहे हैI माना जा रहा है कि तीसरी बार के लिए उनका टिकट लगभग तय हैI

SIR के बाद आई मतदाता सूची के आंकड़ो के आधार पर भी देखे तो अब दादरी का भविष्य अब ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के बीच के संतुलन पर टिका है। यदि आने वाले समय में बीते दो चुनावो की ताः शहरी मतदाता राजनीतिक रूप से जागरूक होकर एकजुट रहते हैं, तो दादरी में पारंपरिक जाति आधारित राजनीति का किला ढहना तय है। यह कहना गलत नहीं होगा कि गौतमबुद्ध नगर की राजनीति अब एक ‘संक्रमण काल’ से गुजर रही है, जहाँ विकास और शहरीकरण ही जीत का प्रमुख आधार बनेंगे। आने वाला 2027 का चुनाव यह तय करेगा कि दादरी अपनी पुरानी जाति आधारित राजनीति के साथ आगे बढ़ेगी या नोएडा की तरह एक नए शहरी उत्तरदायी नेतृत्व को स्वीकार करेगी।

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