बेलाग लपेट : उत्तरप्रदेश का ‘औद्योगिक इंजन’ नोएडा क्यों हुआ जाम? पार्ट 4- श्रमिकों को उनका हक देने को नहीं तैयार नोएडा के उद्योगपति! औद्योगिक क्रांति के अगले चरण में, श्रमिक कल्याण को ‘लागत’ के बजाय ‘निवेश’ के रूप में देखा जाना जरुरी

NCR Khabar Internet Desk
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आशु भटनागर। भारत में एक पुरानी कहावत, “चमड़ी जाए पर दमड़ी ना जाए”, आज भी औद्योगिक घरानों के एक बड़े वर्ग की मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती दिख रही है। यह सोच, नोएडा में हालिया हिंसक श्रमिक आंदोलन की आग में झुलसने के बावजूद, कमोबेश उसी तरह से कायम है, जिससे दीर्घकालिक चुनौतियाँ पैदा होने की संभावना है।

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लंबे समय से श्रमिकों के दमन और शोषण की अनसुनी कहानियों ने नोएडा के औद्योगिक परिदृश्य में असंतोष की आग को सुलगने का मौका दिया था। इसी असंतोष को भारतीय मजदूर संघ और अन्य स्थानीय मजदूर संगठनों की अकर्मयता का लाभ उठाते हुए, कुछ हिंसक सोच रखने वाले अर्बन नक्सलियों ने एक हिंसक आंदोलन का रूप दे दिया। इसके परिणामस्वरुप, 42,000 से अधिक श्रमिक सड़कों पर उतर आए और फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ की घटनाओं को अंजाम दिया।

सरकार ने इस स्थिति पर त्वरित कार्रवाई की। मात्र आठ घंटे के भीतर, श्रमिकों के वेतन में 21% की वृद्धि की घोषणा की गई, जिसके बाद श्रमिकों ने आंदोलन छोड़ काम पर वापसी शुरू कर दी। सरकार ने श्रमिकों के असंतोष के मूल कारणों पर ध्यान दिया और केवल वेतन वृद्धि ही नहीं, बल्कि अन्य मांगों को भी गंभीरता से लेते हुए नोएडा के फैक्ट्री मालिकों को उनके लिए तैयारी करने के निर्देश दिए।

मांगों पर मालिकों का ‘अड़ियल’ रवैया

सच यह है कि शांति स्थापित होते ही फैक्ट्री मालिकों का अड़ियल रवैया सामने आने लगा है। उन्हें पुलिस और प्रशसन द्वारा शर्मिको के हित के कार्य बिलकुल पसंद नहीं आ रहे है, वो इस दखलंदाजी को अपने व्यापारिक कार्यशैली में हस्तक्षेप मान रहे हैंi श्रमिको की कई मांगों में से एक प्रमुख मांग ओवरटाइम के लिए दोगुना श्रम मूल्य देने की है। यह लंबे समय से एक सामान्य मानक रहा है। हालांकि, बढ़ते औद्योगिकीकरण की आड़ में और ‘इंस्पेक्टर राज’ की समाप्ति के बाद ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर फैक्ट्री मालिकों ने धीरे-धीरे इस नियम का उल्लंघन करना शुरू कर दिया था। ओवरटाइम के लिए दोगुना भुगतान करने के बजाय, उन्हें सामान्य वेतन के अनुरूप प्रति घंटे के हिसाब से भुगतान किया जाने लगा।

अब, ओवरटाइम पर दोगुना वेतन देने के नाम पर फैक्ट्री मालिकों ने जहां एक ओर हाथ खड़े कर दिए हैं, वहीं दूसरी ओर कई फैक्ट्री मालिक लगातार इसके विरोध में प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर तमाम हथकंडे अपनाने में लगे हैं। इन हथकंडों में श्रमिकों को 8 घंटे की शिफ्ट में सीमित करने का दबाव बनाना या फिर उनका टारगेट देकर काम करवाना शामिल है। इन दोनों ही परिस्थितियों में, श्रमिकों को बढ़े हुए वेतन के बावजूद कम वेतन का डर दिखाया जा रहा है।

फैक्ट्री मालिक लगातार श्रमिकों को यह बता रहे हैं कि अब वे नए नियम रखेंगे और उनसे केवल 8 घंटे काम करवाएंगे, जिससे श्रमिकों पर दबाव बने और वे फिर से शोषण के एक नए खेल में फंस जाएं।

क्या यह शोषण वास्तव में श्रमिकों का होगा या मालिकों को ही उठाना पड़ेगा नुकसान?

वास्तविकता में देखा जाए तो फैक्ट्री मालिक तात्कालिक तौर पर भले ही श्रमिकों को शिफ्ट का डर दिखाकर डराने की कोशिशें में लगे हैं, किंतु दीर्घकालिक असर फैक्ट्री मालिकों पर ही पड़ने वाला है। फैक्ट्री मालिक मजदूरों को डराने या दबाने के लिए शिफ्ट का जो खेल खेलने की कोशिश कर रहे हैं, उसमें आगे जाकर श्रमिकों और सरकार दोनों का फायदा है।

8 घंटे की सीमित शिफ्ट और ओवरटाइम हटाने से श्रमिकों का कुल वेतन कुछ दिनों के लिए भले ही कम लगे, किंतु इससे आने वाले दिनों में श्रमिकों का मानसिक और सामाजिक स्तर सुधरना शुरू हो जाएगा। वहीं, फैक्ट्री मालिक जो डबल शिफ्ट या तीन शिफ्ट की योजनाएं बना रहे हैं, उनको नए श्रमिकों की आवश्यकता पड़ेगी। सरकार द्वारा लगातार श्रमिकों के रजिस्ट्रेशन से लेकर पीएफ और ईएसआई जैसी सुविधाओं पर सख्त होने के कारण, फैक्ट्री मालिकों को नए श्रमिकों की गिनती और व्यवस्था को भी समायोजित करना पड़ेगा। नई नौकरियां देने से पहले से खाली बैठे मजदूरों को जहां एक ओर रोजगार मिलेगा, वहीं नई शर्तों के कारण न्यूनतम वेतन मानकों से अधिक वेतन वृद्धि हो सकती है।

औद्योगिक क्रांति के अगले चरण में, श्रमिक कल्याण को ‘लागत’ के बजाय ‘निवेश’ के रूप में देखा जाना जरुरी

फैक्ट्री मालिकों को यह समझना होगा कि देर सवेर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों का पालन करने की आदत डालनी पड़ेगी। भारत जैसे देश में अब वह दौर नहीं चलेगा जब भारत सरकार के नियमों को दरकिनार करके बंधुआ मजदूरी जैसे कार्यों को सफलता से किया जा रहा था। नोएडा के आंदोलन को शासन ने अपनी सूझबूझ से भले ही शांत कराया हो, कितुं दो दिन पूर्व देशभर के सभी श्रमिक संगठनों ने जिस तरह से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया है, उससे लगता है कि फैक्ट्री मालिकों की कथित बुद्धिमत्ता उन्हें भारी भी पड़ सकती है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि अगर भारत के फैक्ट्री मालिकों को औद्योगिक क्रांति को गति देनी है तो उन्हें श्रमिकों को सम्मान के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं पर काम करना सीखना होगा। भारत में औद्योगिक क्रांति के अगले चरण में, श्रमिक कल्याण (Labour Welfare) को ‘लागत’ के बजाय ‘निवेश’ के रूप में देखा जाना चाहिए। जो उद्योगपति श्रमिकों के सम्मान और सुरक्षा पर काम करेंगे, वे ही दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर पाएंगे। 



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