गौतम बुद्ध नगर की राजनीति इन दिनों बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर है। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान अब दबी जुबान से बाहर निकलकर सार्वजनिक होती जा रही है। पार्टी के भीतर की यह उठापटक न केवल कार्यकर्ताओं के लिए चर्चा का विषय है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों के समीकरणों को भी प्रभावित करती दिख रही है।
प्रतिनिधिमंडल की सूची ने खोली गुटबाजी की पोल
ताज़ा विवाद सोमवार को समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यालय से जारी एक पत्र से शुरू हुआ। सोशल मीडिया पर वायरल हुए इस पत्र के अनुसार सेक्टर-150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज की मृत्यु के समय जान बचाने की कोशिश करने वाले जिग वर्कर्स (महेंद्र और नरेंद्र) को पुलिस द्वारा कथित प्रताड़ना के विरोध में एक प्रतिनिधिमंडल उनके परिवार से मिलने जा रहा है।
इस प्रतिनिधिमंडल में सांसद हरेंद्र मलिक, पूर्व मंत्री शाहिद मंजूर, जिला अध्यक्ष सुधीर भाटी और नोएडा महानगर अध्यक्ष डॉ. आश्रय गुप्ता समेत कई बड़े नाम शामिल हैं। लेकिन, इस सूची में सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी के साथ साथ ‘पूर्व लोकसभा प्रत्याशी’ के रूप में राहुल अवाना का नाम आना और डॉक्टर महेंद्र नागर का गायब होना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
राहुल अवाना बनाम महेंद्र नागर, क्या बदल रहे हैं समीकरण?
साल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान घटी घटनाओं ने इस गुटबाजी की नींव रखी थी। पहले राहुल अवाना को टिकट दिया गया, फिर जिला अध्यक्ष सुधीर भाटी और प्रवक्ता राजकुमार भाटी के कथित दबाव में उसे बदलकर डॉ. महेंद्र नागर को दे दिया गया। अब बदलती राजनीतिक हवा के साथ वही राहुल अवाना वापस मुख्यधारा में लौटते दिख रहे हैं, जबकि डॉ. महेंद्र नागर और राजकुमार भाटी का नाम किसी भी बड़ी सूची में न होना संकेत देता है कि पार्टी के भीतर शक्ति का केंद्र बदल रहा है।

क्या राजकुमार भाटी का ‘कद’ घटा है?
हाल ही में ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ कथित टिप्पणी को लेकर हुए विवाद के बाद से ही राजकुमार भाटी सवालों के घेरे में थे। रविवार को पूर्व जिला अध्यक्ष इंद्र प्रधान द्वारा दादरी विधानसभा के लिए अपनी दावेदारी पेश करने के कार्यक्रम में शहर के तमाम बड़े सपा नेता मौजूद थे, लेकिन राजकुमार भाटी और डॉ. महेंद्र नागर की अनुपस्थिति ने उन कयासों को बल दे दिया है कि पार्टी नेतृत्व ने अब इनसे दूरी बनानी शुरू कर दी है। क्या इन्दर प्रधान ने दादरी सीट पर शीर्ष नेतृत्व से अनुमति के बाद ही अपनी तयारी शुरू की है ?
पुरे प्रकरण पर जिलाध्यक्ष सुधीर भाटी से एनसीआर खबर ने संपर्क करने की कोशिश की किन्तु उनसे संपर्क नहीं हो सका। जानकारों का मानना है कि राजकुमार भाटी के घटते प्रभाव का सीधा असर डॉ. महेंद्र नागर की राजनीतिक साख पर पड़ रहा है। डॉ. नागर के समर्थक जो अब तक उनका दादरी से टिकट पक्का मानकर चल रहे थे, अब असमंजस में हैं। पार्टी पत्र में राजकुमार भाटी और डॉ. नागर का नाम न होना और राहुल अवाना का ‘पूर्व लोकसभा प्रत्याशी’ के तौर पर उल्लेख किया जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी के भीतर कुछ बड़ा बदलाव पक रहा है।
आगामी चुनाव पर क्या होगा असर?
गौतम बुद्ध नगर की राजनीति में यह गुटबाजी समाजवादी पार्टी के लिए एक बड़ी बाधा बन सकती है। क्या यह गुटबाजी केवल स्थानीय वर्चस्व की लड़ाई है या फिर प्रदेश स्तर से इन नेताओं को किनारे करने की कोई बड़ी रणनीति? यह आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन एक बात साफ है—डॉ. महेंद्र नागर और राजकुमार भाटी की इस ‘चुप्पी’ और पार्टी से बढ़ती दूरी ने गौतम बुद्ध नगर में समाजवादी पार्टी के भविष्य पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आगामी विधानसभा चुनावों में सपा की यह गुटबाजी उसे कितना मजबूत या कमजोर बनाएगी, यह देखना अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।


