आशु भटनागर। सोमवार को उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से इंडिगो की नियमित उड़ानों का आरम्भ हुआ। उद्घाटन के बाद लंबे समय से प्रतीक्षित इस दिन का बेसब्री से इंतज़ार था। यह एक महत्वपूर्ण नागरिक उड्डयन उपलब्धि है, लेकिन इसके साथ ही इसने स्थानीय राजनीति और मीडिया के प्रति नेताओं के बदलते दृष्टिकोण की एक परत भी उधेड़ दी है।
परंपरागत रूप से, ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में स्थानीय जनप्रतिनिधि अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और श्रेय लेने का कोई मौका नहीं चूकते। जेवर के विधायक ने भी ऐसा ही किया, लेकिन उनके तरीके ने कई सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने न सिर्फ नोएडा से लखनऊ तक की पहली उड़ान में “स्थानीय किसानों” के नाम पर अपने वोट बैंक के कुछ सदस्यों को मुफ्त यात्रा करवाई, बल्कि मुख्यमंत्री से उन्हें सम्मानित भी करवाया। ऊपरी तौर पर इसमें कोई बुराई नहीं दिखती; यह चुनावी लाभ के लिए जनसंपर्क का एक सामान्य तरीका हो सकता है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा, और शायद अधिक महत्वपूर्ण पहलू, अनदेखा रह गया। यदि सम्मान देने और लेने की ही बात थी, तो इस क्षेत्र में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट के शिलान्यास से लेकर लोकार्पण तक हर पल की खबर को पूरी निष्ठा से जनता तक पहुँचाने वाले पत्रकारों पर विधायक, लोकसभा सांसद या यमुना प्राधिकरण के किसी भी अधिकारी की नज़र क्यूँ नहीं थी। और होनी भी क्यों चाहिए? पत्रकार इन राजनीतिक दलों के वोट बैंक तो हैं नहीं। पत्रकारों के वोट से न विधायक बनते हैं, न गिरते हैं, और अधिकारियों की तो बात ही क्या!
यमुना प्राधिकरण, जो इस परियोजना से सीधे जुड़ा है, आजकल सेवानिवृत्त अधिकारियों की शरण स्थली बन गया है। मानो आपके सरकार में बड़ी पहुँच या किसी योगगुरु या संघ के वरिष्ठ प्रचारक से संपर्क सही होने चाहिए, आपको सेवानिवृत्ति के बाद भी पुनर्नियुक्ति मिल जाएगी, चाहे आप सीईओ हों या अन्य अधिकारी। ऐसे माहौल में पत्रकारों को किसी प्रकार का सम्मान देना भला क्यों ज़रूरी समझा जाए?

ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ जेवर विधायक या यमुना प्राधिकरण के अधिकारियों की ही आदत है कि वे अपने वोट बैंक के अलावा स्थानीय पत्रकारों को कोई सम्मान न दें। भाजपा के किसी भी नेता के व्यवहार में यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। दूर न जाएँ तो महज दो दिन पूर्व गौतम बुद्ध नगर के जिला प्रभारी और उत्तर प्रदेश सरकार में लोक निर्माण विभाग के राज्य मंत्री कुंवर बृजेश सिंह ने मोदी सरकार के 12 वर्ष पूर्ण होने पर हुई प्रेस कांफ्रेस में पत्रकारों के साथ संवाद के नाम पर अपना “एकल संवाद” करके अपनी बात कही और उठ गए। 15 मिनट तक चली “मन की बात” के बाद उन्होंने पत्रकारों से कोई बात करने तक को उचित नहीं समझा और पत्रकारों द्वारा सवाल उठाए जाने पर “मैं फिर आऊँगा” जैसा दिलासा देकर चलते बने।
यह भी संयोग ही है कि इन्हीं तीन दिनों में भाजपा और संघ से जुड़े लोग लखनऊ में एक तीन दिवसीय “इन्फ्लुएंसर मीट” आयोजित कर रहे थे, जहाँ स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “इन्फ्लुएंसर” के साथ संवाद करने की पहल की और वहां वक्ताओं द्वारा उनसे सरकार के पक्ष में सकारात्मक रिपोर्टिंग के लिए भी कहा गया।
ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी और योगी के नाम पर जीत रहे राजनेताओं को अब पत्रकारों की भूमिका और उनके सम्मान की चिंता नहीं है, क्योंकि वे कोई ‘वोट’ नहीं हैं। और जो वोट नहीं हैं, उन्हें नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट में हो रही किसी विशेष गतिविधि के लिए क्यों आमंत्रित किया जाए? क्यूँ उन्हें भी इस उड़ान का साक्षी बनाया जाए, उन्हें तो बस सीमित क्षेत्र में घुमाकर वापस भेज दिया जाए कि कहेने वो कुछ ऐसी परते ना खोल दें जिससे कोई ऐसा सच न बाहर आ जाए जिसे बताना कोई नहीं चाहता ।
यह प्रवृत्ति भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के लिए चिंता का विषय है। जब सरकारें और जनप्रतिनिधि केवल उन लोगों से संवाद करना पसंद करते हैं जो उनके एजेंडे को आगे बढ़ाएं, या जो सीधे उनके वोट बैंक का हिस्सा हों, तो स्वतंत्र पत्रकारिता की आवाज़ को दबाने का खतरा बढ़ जाता है। नोएडा एयरपोर्ट की पहली उड़ान ने एक भव्य सपने को साकार किया है, लेकिन इसके साथ ही इसने मीडिया के प्रति बदलती राजनीतिक मानसिकता की एक कड़वी सच्चाई को भी उजागर किया है।



