सहारनपुर में मोनू कश्यप की मृत्यु पर उसकी परेशान मां को न्याय दिलाने के लिए विपक्ष से समाजवादी की सांसद इकरा हसन न सिर्फ थाने पर धरने पर बैठ गई बल्कि गिरफ्तार होने से भी नहीं पीछे हटी । यह अलग बात है कि उन्हें 10 मिनट बाद रिहा कर दिया । सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर पक्ष और विपक्ष दोनों ही लोगों द्वारा खूब गाल बजाये जा रहे है, किंतु इकरा हसन ने विपक्ष से महिला नेत्री होने के बावजूद वह कर दिखाया जो गौतम बुद्ध नगर जिले में विपक्ष के कथित बड़े-बड़े सुरमा पुरुष नेता नहीं कर पा रहे है । लोगों ने अखिलेश यादव से पश्चिम की कमान इकरा हसन को सौंपने की मांग तक कर डाली। उन्होंने अखिलेश को PDA जातियों के पुरुष नेताओं की जगह इस नेत्री को आगे बढ़ाने पर ध्यान देने को कहा है।
बीते 9 वर्षों में गौतम बुद्ध नगर में मैंने पक्ष और विपक्ष के किसी नेता को आम जनता के कार्य करवाने के लिए सड़क पर इस तरीके से उतरने नहीं देखा । लोगों में चर्चाएं यहां तक होती हैं कि यह नेता स्कूल, अस्पताल चला रहे है या तो ठेकेदार बन चुके हैं और प्राधिकरणों से ठेके लेना ही इनकी नेतागिरी का एकमात्र कारण है। इसी वर्ष जनवरी में अपनी विवादस्पद बयानों के लिए चर्चित विपक्ष के एक माफीवीर नेता ने अपने स्कूल के लिए सत्तारूढ़ भाजपा के एक एमएलसी से 12 लाख रुपए अनुदान तक ले लिया। इसके बाद उनकी नेतागिरी और निष्ठा दोनों ही संशय के दायरे में आ गई। तो एक अन्य घटना क्रम में भाजपा संगठन के एक ठेकेदार नेता प्राधिकरण के जल विभाग के कार्यालय पर पानी की समस्या के नाम पर हंगामा करते नजर आए। वो अलग बात थी कि समस्या पानी की नहीं समस्या अपने कुछ चहेतो को प्राधिकरण में निचले स्तर की नौकरियां पर लगवाने की थी।
सच यही है कि जिले में सत्ता और विपक्ष दोनों ही तरफ के नेता सिर्फ दिखावटी नेतागिरी करते हैं सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर नेतागिरी करना यहां के नेताओं का आम शक्ल है रोचक तथ्य यह है कि इनमें से कोई भी नेता आम जनता के मुद्दों को उठाने की कोशिश नहीं करता यह या तो पार्टी के कार्यक्रमों के लिए दिखावटी प्रदर्शन या प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं या फिर हिंदू मुस्लिम जातियों को लड़ाने जैसी बातों के लिए देशव्यापी चर्चा का केंद्र बन जाते हैं तो कुछ का अंतिम उद्देश्य टीवी प्रवक्ता बनना ही हो जाता है ।
दुखद तथ्य यह है कि ये नेता गौतम बुध नगर के 16 लाख मतदाताओं की समस्याओं में , उनके साथ होने वाली किसी घटना में साथ खड़े नहीं होते है ।इनकी नाकामी ने जिले में 58 से ज्यादा किसान संगठनों को खड़ा कर दिया है जिनका एकमात्र ध्येय किसानों के नाम पर हरी टोपी लगाकर दलाली करना है। वही शहर की हालत भी अच्छी नहीं है यहां सेक्टर की RWA/AOA के नाम पर या समाजसेवी संगठनों के नाम पर कमोबेश किसान संगठन वाली राजनीति काम करती है, जिनका मुख्य उद्देश्य प्राधिकरण में जाकर कुछ अवांछित लाभ लेना होता है। हालत यह है कि नोएडा में सेक्टर वासियों के नाम पर फोनरवा और डीडीआरडब्लूए के नाम से बनी संस्थाओं के अध्यक्ष स्वयं को विधायक से कम नहीं समझते है और नोएडा प्राधिकरण भी पता नहीं किस दवाब में इनको वैसे ही या कई बार विधायक से अधिक महत्व दे देता है ।

इन सबके बाद भी जिले में मुख्य राजनीतिक दलों के ढपोर शंखी नेताओं की नेतागिरी कितनी सक्षम है इसका अंदाजा आप इसलिए लगा सकते हैं कि बीते माह अप्रैल में 50000 मजदूर सड़कों पर था और उन मजदूरों का नेतृत्व बाहर से आए अर्बन नक्सली नेताओं की फौज कर रही थी। जिसमें जमकर हिंसा की गई पुलिस प्रशासन तक कुछ घंटे के लिए नाकाम दिखाई देने लगा ।
ऐसे में इकरा हसन की हिम्मत पर गौतम बुद्ध नगर में एक बार फिर से यहां के नेताओं की ढपोरशंखी नेतागिरी को लेकर नई चर्चा तो छेड़ दी है पर क्या यहाँ कोई बदलाव हो पायेगा?


