आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश की राजनीतिक बिसात पर इन दिनों बेहद दिलचस्प और आक्रामक चालें चली जा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी ने एक तरफ हिंदुत्व के एजेंडे को धार देते हुए विपक्षी दलों को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति अपनाई है, तो दूसरी तरफ उन वैचारिक प्रतीकों पर भी कब्ज़ा जमाने की कोशिश की है, जिन्हें कभी समाजवादी राजनीति का ‘गढ़’ माना जाता था।
हाथरस की एक जनसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी और विशेषकर अखिलेश यादव पर सीधा प्रहार किया। योगी ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मुद्दे को उठाकर सपा प्रमुख को ‘धार्मिक’ होने के दावों पर लपेटा है। मुख्यमंत्री ने चुनौती भरे लहजे में कहा कि यदि अखिलेश खुद को धार्मिक मानते हैं, तो उन्हें खुलकर समर्थन करना चाहिए कि जिस प्रकार राम जन्मभूमि मुक्ति अभियान चला था, उसी तर्ज पर अब श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति अभियान भी चलना चाहिए।
श्री कृष्ण जन्मभूमि पर योगी की दो-टूक चुनौती
भाजपा का आरोप है कि तुष्टिकरण की राजनीति के चलते अखिलेश यादव वर्षों तक अयोध्या से दूरी बनाए रहे। भाजपा ने याद दिलाया कि सत्ता में रहते हुए सपा सरकार ने राम मंदिर निर्माण में किस तरह की बाधाएं खड़ी की थीं—चाहे वह राजस्थान से आने वाले पत्थरों को रोकना हो, बाबरी मस्जिद के पक्षकार रहे जफरयाब जिलानी को एडवोकेट जनरल बनाना हो या कपिल सिब्बल जैसे वकीलों को राज्यसभा भेजकर मंदिर निर्माण में कानूनी अड़चनें पैदा करना हो।
लोहिया के आंगन में भाजपा की दस्तक
राजनीति में प्रतीकों (Symbols) का महत्व सर्वोपरि है और भाजपा इस विधा में अपनी महारत साबित करती रही है। रविवार को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी का लखनऊ के जानकीपुरम स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया के परिजनों के आवास पर पहुँचना इसी रणनीतिक गोट का हिस्सा माना जा रहा है।

पंकज चौधरी ने लोहिया परिवार के रमेशचंद्र लोहिया, शोभा रानी लोहिया, पृथ्वीराज लोहिया समेत अन्य सदस्यों से मुलाकात की। इस दौरान पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी भी मौजूद रहे। राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को महज एक शिष्टाचार भेंट नहीं, बल्कि एक बड़े सियासी संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा का यह कदम यह बताने के लिए काफी है कि वे उन वैचारिक आधारों पर सेंधमारी कर रहे हैं, जो दशकों से समाजवादी पार्टी की जागीर माने जाते थे।
समाजवाद बनाम हिंदुत्व: भाजपा की चौतरफा घेराबंदी
भाजपा बहुत करीने से समाजवादी पार्टी को चारों तरफ से घेर रही है। एक तरफ हिंदुत्व के मुद्दे पर अखिलेश यादव को ‘असहज’ किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ लोहिया के परिजनों को सम्मान देकर यह संदेश दिया जा रहा है कि सपा ने अपने वैचारिक पुरखों का भी सही सम्मान नहीं किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल एक शुरुआत है। अगर आने वाले दिनों में लोहिया परिवार का कोई सदस्य भाजपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ते हुए दिखाई दे, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भाजपा की यह ‘पॉलिटिकल इंजीनियरिंग’ साफ संकेत दे रही है कि आगामी चुनावों में सपा के लिए अपने ही गढ़ को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी।
कुल मिलाकर, यूपी की राजनीति में अब ‘वोट बैंक’ की लड़ाई महज जमीन पर नहीं, बल्कि विचारधारा और प्रतीकों के युद्ध में बदल चुकी है, जहां भाजपा हर कदम बहुत सोच-समझकर रख रही है।



