उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीते 25 जून को बड़े ताम-झाम के साथ नोएडा प्राधिकरण के नए प्रशासनिक भवन (सेक्टर-96) का उद्घाटन किया था। उद्घाटन के दौरान इस इमारत की तुलना विदेशो में बने आधुनिक ढांचों से की गई और मुख्यमंत्री ने स्वयं प्राधिकरण की सराहना करते हुए कहा था कि जिसके पास अपना घर नहीं था, वह दूसरों की समस्याएं क्या सुलझाता। लेकिन अफसोस, उद्घाटन के महज 13 दिन बाद ही करोड़ों की लागत से बनी इस इमारत के दावों की ‘तेरहवीं’ हो गई है।
मंगलवार को हुई मानसून की पहली तेज बारिश ने प्राधिकरण के भ्रष्टाचार और अधिकारियों की लापरवाही की ऐसी तस्वीर पेश की, जिसने पूरे नोएडा प्राधिकरण को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
छत से टपकता पानी और फर्श पर रखी बाल्टियां
करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए गए इस ‘हाई-टेक’ कार्यालय की छत पहली ही बारिश का दबाव नहीं झेल पाई। मंगलवार को हुई तेज बारिश में जहां एक और प्राधिकरण के नए भवन की छत टपकने लगी और नीचे पानी फर्श पर गिरने से रोकने के लिए बाल्टिया रखनी पड़ी वहीं कार्यालय के बाहर बने फर्श पर भी पानी के निकासी सही न होने के कारण एक से डेढ़ इंच तक पानी खड़ा हो गया । नजारा किसी सरकारी जर्जर स्कूल जैसा लग रहा था, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशासनिक भवन का। यही नहीं, कार्यालय के बाहर निकासी की सही व्यवस्था न होने के कारण एक से डेढ़ इंच तक पानी जमा हो गया, जिससे आने-जाने वाले लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ा।
जब ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का कार्यालय सेक्टर 6 से सेक्टर 96 में शिफ्ट किया जा रहा था तब लगातार यह बातें हो रही थी की बरसात के आने पर अबकी बार हमें कम से कम कार्यालय के चारों ओर पानी भरने की खबरें नहीं लिखनी पड़ेगी। किन्तु प्राधिकरण के निर्माण से लेकर मेंटेनेंस तक देख रहे अधिकारियों ने पत्रकारों और लोगों को निराश नहीं किया ।





स्वच्छता पुरस्कार के दावे और हकीकत का अंतर
एक तरफ नोएडा प्राधिकरण शहर को ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में नंबर वन बनाने के लिए दिन-रात एक करने के दावे कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसके अपने ही घर (कार्यालय) में गंदगी और अव्यवस्था का अंबार लगा है। उद्घाटन के 13 दिन बीत जाने के बाद भी यहां साफ-सफाई के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। कार्यालय का रिसेप्शन तक धुल फांक रहा है, सीडियो और लाबी की बात तो आगे आती है । बिल्डिंग के बाहर लगे शीशे तो जैसे बारिश का इंतज़ार कर रहे थे बारिश हुई तो कुछ साफ़ हुए

सूत्रों के अनुसार, प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी दबी जुबान में स्वीकार कर रहे हैं कि अभी तक न तो मेंटेनेंस एजेंसी का चयन हुआ है और न ही सफाई एजेंसी का। सवाल यह उठता है कि जब अप्रैल में ही इस कार्यालय का उद्घाटन तय हो गया था, तो पिछले तीन महीनों में टेंडर प्रक्रिया क्यों पूरी नहीं की गई? क्या अधिकारी इस बात का इंतजार कर रहे थे कि उद्घाटन के बाद ही फाइलें दौड़ाई जाएंगी?
भ्रष्टाचार या लापरवाही? जवाबदेही पर सवाल!
इस स्थिति को देखकर स्थानीय निवासियों में भारी रोष है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह निर्माण कार्य में लगे अधिकारियों के भ्रष्टाचार का नमूना है या फिर नोएडा प्राधिकरण की वही पुरानी कार्यशैली, जहां काम से ज्यादा कागजों पर चमक दिखाई जाती है। जब प्राधिकरण अपने खुद के कार्यालय की छत को वॉटरप्रूफ नहीं रख सका और सफाई के लिए टेंडर नहीं निकाल पाया, तो वह पूरे शहर की समस्याओं का समाधान कैसे करेगा?
नोएडा के जागरूक नागरिकों का सवाल है कि क्या इस गंभीर लापरवाही के लिए किसी बड़े अधिकारी पर गाज गिरेगी? या फिर ‘वेस्ट टू एनर्जी’ मामले के कथित वीडियो प्रकरण की तरह, इसे भी रफा-दफा कर दिया जाएगा?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, आप अपनी जीरो टॉलरेंस नीति के लिए जाने जाते हैं, आपको इस ओर ध्यान देने की जरूरत है। अगर उद्घाटन के 13 दिन बाद ही सरकारी खजाने का पैसा पानी की तरह टपकने लगे, तो दोषियों पर कार्रवाई अनिवार्य है।



