आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश के सबसे चर्चित और विवादित ‘यादव सिंह प्रकरण’ से जुड़े अंडरग्राउंड केबलिंग घोटाले में एक बार फिर न्याय की गाड़ी पटरी से उतरती नजर आ रही है। ताज़ा घटनाक्रम में, नोएडा प्राधिकरण के कार्मिक ओएसडी अशोक कुमार ने इस मामले की जांच करने से साफ इनकार कर दिया है। रोचक तथ्य ये भी है कि समाचार लिखे जाने तक उनका तबादला भी हो गया है, शायद इनकार करने का पुरूस्कार है। उनका तर्क हैरान करने वाला है—उनका कहना है कि जिन अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होनी है, वे उनसे वरिष्ठ (सीनियर) हैं और एक कनिष्ठ अधिकारी अपने शीर्ष अधिकारियों की जांच नहीं कर सकता।
यह मामला न केवल प्रशासनिक शिथिलता को दिखा रहा है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करता है कि क्या रसूखदार अधिकारियों को बचाने के लिए जानबूझकर जांच में देरी की जा रही है?
5 महीने बाद जागी ‘मर्यादा’, प्रमोशन का मिला फायदा
हैरानी की बात यह है कि ओएसडी अशोक कुमार को यह बात समझ आने में पांच महीने लग गए। शासन के बार-बार निर्देश देने के बावजूद प्राधिकरण ने आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट नहीं भेजी थी। जब फरवरी में शासन ने कड़ी आपत्ति जताई, तब जाकर सीईओ के निर्देश पर जांच कमेटी बनी। अब पांच महीने बाद जांच अधिकारी का पीछे हटना सीधे तौर पर जांच प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में डालने जैसा है।
इस देरी का सबसे बड़ा ‘पुरस्कार’ उन आरोपी अधिकारियों को मिला, जिन्होंने विभागीय जांच लंबित होने के बावजूद पदोन्नति (प्रमोशन) का लाभ उठा लिया। जनता के टैक्स के पैसे के गबन के आरोपों के बीच अधिकारियों का इस तरह फलना-फूलना सिस्टम की साख पर बट्टा लगाता है।

कौन हैं वो चार अधिकारी?
सीबीआई की चार्जशीट में नाम होने के बावजूद जिन चार अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई अटकी हुई है, वे हैं:
आरपी सिंह: वर्तमान में जल-सीवर एवं ईएंडएम के महाप्रबंधक।
निजामुद्दीन: (तबादला हो चुका है)
प्रमोद: (तबादला हो चुका है)
रामेंद्र
जांच के नाम पर ‘म्युजिकल चेयर’ का खेल
अंडरग्राउंड केबलिंग घोटाले की जांच के नाम पर नोएडा प्राधिकरण में केवल जिम्मेदारी एक-दूसरे पर थोपी जा रही है। पहले तकनीकी जांच के लिए महाप्रबंधक (सिविल) एसपी सिंह को जिम्मेदारी दी गई, उन्होंने अपने वरिष्ठ की जांच करने से मना कर दिया। अब ओएसडी अशोक कुमार ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि जब प्राधिकरण को पता था कि आरोपी शीर्ष पदों पर बैठे हैं, तो जांच के लिए उनसे भी उच्च स्तर के अधिकारी या किसी स्वतंत्र एजेंसी को शुरू में ही जिम्मेदारी क्यों नहीं सौंपी गई?
स्थानीय निवासियों के मन में उठते सवाल
नोएडा के आम नागरिकों के लिए यह खबर निराशाजनक है। करोड़ों रुपये के इस घोटाले में जहां एक ओर सीबीआई अपनी कार्रवाई कर रही है, वहीं स्थानीय प्रशासन का अपने ही अधिकारियों को बचाने का रवैया सुशासन के दावों की पोल खोलता है। क्या नियम-कायदे सिर्फ आम आदमी के लिए हैं? क्या रसूखदार अधिकारी अपने पद के दम पर जांच की आंच से हमेशा बचते रहेंगे?
अब गेंद शासन के पाले में है। यदि वाकई जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम होना है, तो शासन को इस मामले में हस्तक्षेप कर किसी निष्पक्ष और वरिष्ठ अधिकारी से तत्काल जांच पूरी करानी चाहिए, ताकि भ्रष्टाचार के इस ‘अंडरग्राउंड’ खेल का पर्दाफाश हो सके।



