आशु भटनागर। किसी भी विकसित शहर या देश की लाइफलाइन उसका सार्वजनिक परिवहन (Public Transport) होता है। उत्तर प्रदेश के ‘शो-विंडो’ कहे जाने वाले नोएडा को स्थापित हुए 50 साल, ग्रेटर नोएडा औरआउटर नोएडा (यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण क्षेत्र) को 35 साल बीत चुके हैं। इसके बावजूद, इतने वर्षों तक यहाँ सार्वजनिक परिवहन के नाम पर केवल कुछ चुनिंदा हिस्सों में ही मेट्रो दिखाई देती थी। लंबे इंतजार के बाद जब आउटर नोएडा में नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से शुरू हुआ, तो कनेक्टिविटी के नाम पर आनन-फानन में 100 ई-बसों का संचालन शुरू कर दिया गया।
लेकिन बिना किसी ठोस तैयारी के शुरू की गई इन ई-बसों का दो महीने बाद आज क्या हाल है? क्या इनसे आम जनता को कोई फायदा हो रहा है? क्या यह सेवा वाकई सरकार की जनता को सहूलियत देने की नीयत को दर्शाती है? इन तमाम सवालों को लेकर जब ग्राउंड जीरो पर स्थानीय लोगों से बातचीत की गई, तो जो हकीकत सामने आई वह हैरान करने वाली है। इन बसों के संचालन से नोएडा और ग्रेटर नोएडा के लोगों को सुविधा कम और अपनी जेब कटने का एहसास ज्यादा हो रहा है।
किराए का ‘करंट’ और समय की बर्बादी
नोएडा में संचालित ई-सिटी बसों का वर्तमान किराया 20, 30 और 50 रुपये निर्धारित किया गया है। न्यूनतम किराया 20 रुपये होने के कारण छोटी दूरी तय करने वाले यात्रियों को यह बहुत महंगा लग रहा है। इसकी तुलना में सड़क पर दौड़ने वाले ऑटो का किराया महज 10 रुपये से शुरू होता है।
ऐसे में पहला झटका आम आदमी को किराए के रूप में लगता है। दूसरा झटका समय का है; इन बसों के लिए यात्रियों को औसतन 15 मिनट से लेकर आधे घंटे तक का इंतजार करना पड़ता है। जबकि ओला-उबर से लेकर सड़क पर चल रहे ऑटो आसानी से और तुरंत मिल जाते हैं। नोएडा जैसे भागते-दौड़ते शहर की व्यस्त जिंदगी में समय और पैसे दोनों बचाने के लिए लोग अब भी बसों के बजाय ऑटो का इस्तेमाल करना ही बेहतर समझ रहे हैं।

स्कूली बच्चों के अभिभावकों के लिए अनुपयोगी
लगभग 1 से 2 किलोमीटर के दायरे में बच्चों को स्कूल लाने-ले जाने वाले लोग इन बसों का कोई लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि यदि कोई अभिभावक ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 10 के पास किसी सोसाइटी में रहता है और उसे सेक्टर 2 में बने स्कूल से अपने बच्चे को लेने जाना है, तो उसे बस का न्यूनतम किराया 20 रुपये देना होगा (आने-जाने का 40 रुपये)। जबकि इतनी ही दूरी को वे ऑटो से प्रतिदिन मात्र 10 रुपये (आने-जाने का 20 रुपये) में तय कर सकते हैं। अगर इसी की तुलना नॉएडा से लगे देश की राजधानी दिल्ली से करें तो यहाँ सुबह स्कूल और दोपहर स्कुल के समय स्कूल बसों के तोर पर भी डीटीसी की बसे दौड़ रही होती है जिससे डीटीसी को घाटा भी नहीं होता है
न बस शेल्टर, न स्टॉप: खाली दौड़ रहीं बसें
हैरानी की बात यह है कि बसों का संचालन तो शुरू कर दिया गया, लेकिन नोएडा और ग्रेटर नोएडा दोनों ही शहरों में बस शेल्टरों को लेकर कोई खास प्रगति नहीं दिख रही है। हालत यह है कि यात्रियों को पता ही नहीं होता कि बस कहाँ से मिलेगी और बस चालकों को यह नहीं पता होता कि बस कहाँ रोकनी है। उचित सूचना और इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव में ये करोड़ों की ई-बसें सड़कों पर खाली दौड़ रही हैं।
जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं
इस अव्यवस्था और महंगे किराए को लेकर ई-बस डिपो के एआरएम राजेश कुमार ने मीडिया को बताया कि ई-सिटी बसों का किराया तीनों प्राधिकरणों ने मिलकर निर्धारित किया है और बसों का संचालन निगम के माध्यम से किया जा रहा है। निगम का काम सिर्फ बसों का संचालन करना है, इसलिए किराए में किसी भी तरह का बदलाव करना उनके स्तर पर संभव नहीं है। तो प्रश्न ये है कि अगर निगम सिर्फ बस ओपरेटर है तो उसके मंत्री दयाशंकर सिंह किस बात का श्रेय इस सुविधा पर ले रहे थे I
वहीं, प्राधिकरणों के स्तर पर बसों के सुचारू संचालन के लिए SPV के गठन को लेकर अभी तक कोई स्पष्टता नहीं है। नोएडा से लेकर ग्रेटर नोएडा और आउटर नोएडा के लोगों को यह भी नहीं पता कि वे अपनी शिकायत कहाँ दर्ज कराएं। वर्तमान में जारी किए गए व्हाट्सएप या टोल-फ्री नंबर किसी एक संयुक्त व्यवस्था के तहत न होकर अलग-अलग प्राधिकरणों द्वारा व्यक्तिगत रूप से जारी किए गए हैं, जिससे भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इससे पहले एनएम्आरसी यानी (नोएडा मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन) की स्थापना शहर के सार्वजानिक परिवहन जिनमे मेट्रो से लेकर बस और फ़ीडर बस तक का सञ्चालन इसी से किया जाना था जिसे बाद में सिर्फ मेट्रो तक सीमित कर दिया गया I जबकि जिले के तीनो जनप्रतिनिधियों के फोटो खिचाओ अभियान एक अतिरिक्त अगर यही NMRC अगर जिलाधिकारी के संयोजन के तीनो प्राधिकरण के द्वारा संचालित हो और उसमे जनप्रतिनिधियो की राय भी ले जाए तो पुरे जिले में सामान सार्वजानिक परिवहन सुविधा मिल सकती थी।
राजनीतिक लाभ के लिए ‘सफेद हाथी’ बनी योजना
ऐसे में सरकारी दावे कुछ भी हो पर आम जनता का यही मानना है कि साल 2027 के आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बिना किसी जमीनी तैयारी और रूट प्लानिंग के इस ई-बस सेवा को शुरू कर दिया गया। बिना सुदृढ़ बुनियादी ढांचे और तर्कसंगत किराए के शुरू की गई यह सार्वजनिक परिवहन सेवा फिलहाल आम जनता के लिए महज एक ‘सफेद हाथी’ बन कर रह गई है, जिसका सीधा लाभ जनता को नहीं मिल पा रहा है। प्रशासन की यह ढुलमुल नीति “अंधेर नगरी चौपट राजा” की कहावत को चरितार्थ कर रही है।





