आशु भटनागर। “अगर जेब में पैसा हो, तो चुनाव लड़ने से कौन रोक सकता है? और चुनाव न भी लड़ सको, तो टिकट मांगने में नुकसान ही क्या है?”—गौतम बुद्ध नगर की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही माहौल बना हुआ है। जिले में जब भी चुनाव आते हैं, वैश्य समाज के सामाजिक संगठनों में विधायक, सांसद, नगर पालिका से लेकर जिला पंचायत तक—हर जगह अपना नेता देखने का जज्बा उफान मारने लगता है।
लेकिन इस ‘उफान’ का परिणाम क्या होता है? हमने इसके दुष्परिणाम कई बार देखे हैं जहाँ सामाजिक आंदोलनों के नाम पर अच्छे-भले कार्यकर्ताओं का राजनीतिक जीवन दांव पर लग जाता है। दादरी नगर पालिका चुनाव के दौरान ऐसे ही एक सामाजिक आंदोलन के जज्बात में बहकर दादरी से टिकट मांगने वाले जगभूषण गर्ग का हश्र हम सबने देखा है। टिकट की लालसा में वह अपनी उस पार्टी के विरुद्ध निर्दलीय खड़े होने तक चले गए, जिसके वह फाउंडर मेंबर कहे जाते थे। बाद में ऐसे गायब हुए कि सीधे गाजियाबाद में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में शरणागत होते नजर आये। उनका यह दर्द कुछ सप्ताह पहले मुख्यमंत्री को लिखे गए उस पत्र में खुलकर सामने आया था, जिसमें उन्होंने लिखा था— “महाराज, भाजपा का टिकट तो मिला नहीं, अब उम्र के इस पड़ाव में किसी संस्था में कोई सम्मानजनक पद ही दिला दीजिए।”
यही नहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान नोएडा में भाजपा के प्रवक्ता पद का आनंद ले रहे गोपाल अग्रवाल भी टिकट की रेस में कूद पड़े थे। और इस लालसा में विपक्ष से अधिक अपनी पार्टी के सांसद डा महेश शर्मा के विरोध में खबरे चलवाने के आरोपों की भी अफवाहे खूब सुनाई दी। यह दीगर बात है कि तमाम प्रयासों के बावजूद वह पार्टी को यह समझाने में असफल रहे कि वह गौतम बुद्ध नगर लोकसभा से सबसे उपयुक्त प्रत्याशी हैं।
2027 के नजदीक आते ही फिर उठा टिकट का उबाल
अब 2024 के चुनाव बीत चुके हैं और 2027 के विधानसभा चुनाव में बमुश्किल 6 महीने से भी कम का समय बचा है। ऐसे में नोएडा के वैश्य समाजसेविओ में एक बार फिर से ‘अपने समाज का राजनेता’ होने का जज्बा हिलोरे मारने लगा है।

इस कड़ी में सबसे पहले नोएडा के पूर्व महानगर अध्यक्ष और पश्चिम में क्षेत्रीय अध्यक्ष की दावेदारी में भी लगे मनोज गुप्ता की दावेदारी वैश्य समाज की एक प्रमुख सामाजिक संस्था द्वारा सामने लाई गई। इसके बाद, वैश्य समाज के नेताओं की अधिकता वाली एक अन्य संस्था “कोनरवा” ने भी उक्त नेता को अपना समर्थन देते हुए भाजपा से टिकट की मांग कर दी, वो बात अलग है उसी संस्था की मीटिंग में वैश्य समाज के नाम पर समाजवादी पार्टी से दावेदारी कर रहा एक नेता भी उपस्थित था। इसको छोड़ भी दें तो चिंता की बात यह है कि इन दोनों संस्थाओं ने भाजपा स्थानीय विधायक पंकज सिंह के समक्ष उक्त नेता के राजनीतिक महत्व या योग्यता को साबित करने की कोई जहमत नहीं उठाई। उनका सिर्फ एक ही तर्क है—”चूंकि नोएडा में हमारे समाज के लोग भी बहुत हैं, इसलिए विधायक भी हमारे समाज से ही होना चाहिए।”
अभी समाज के इस नेता की योग्यता और दावेदारी पर चर्चा शुरू ही हुई थी कि शुक्रवार को वैश्य समाज के एक अन्य उधोगपति, कथित सामाजिक नेता और सेक्टर 55 के आरडब्ल्यूए अध्यक्ष सत्यनारायण गोयल भी मैदान में कूद पड़े। रोचक तथ्य ये भी है कि ये गोयल साहब वही हैं जो अब तक भाजपा विधायक पंकज सिंह के समर्थन में हर त्योहार पर बड़े-बड़े होर्डिंग और विज्ञापन लगाने से नहीं चूकते थे। सोशल मीडिया पर दिए एक इंटरव्यू में वह अब यह कहते नजर आ रहे हैं कि “अगर सामाजिक लोगों को भाजपा टिकट देने की सोच रही है, तो उन्होंने भी बहुत सामाजिक कार्य किए हैं।” यह अलग बात है कि इतने वर्षों से नोएडा में रहने के बावजूद आम जनता उनके उनके ‘महान सामाजिक कार्यों’ को ढूंढने में असफल रही है और मीडिया को फोन करके पूछ रही हैI
मैंने चैट GPT से इस बाबत पूछा तो उसने कहा कि भारत में किसी भी विधानसभा में चुनाव लड़ने का अधिकार केवल समाजसेवा या जाति को ही एकमात्र आधार बनाकर नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता और राजनीतिक भागीदारी का मौलिक अधिकार देता है।
संविधान निर्माताओं ने चुनाव लड़ने की योग्यताओं को समावेशी (inclusive) रखा है ताकि किसी जाति विशेष की जगह समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल सके। इसके पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं:
प्रतिनिधित्व का दायरा व्यापक करना: विधानसभा का मुख्य काम कानून बनाना और नीतियों का निर्माण करना है। इसके लिए समाज के हर क्षेत्र (जैसे वकील, डॉक्टर, किसान, मजदूर, और युवा) के लोगों की जरूरत होती है, न कि सिर्फ पारंपरिक समाजसेवकों या जाति के नेताओ की।
समानता का अधिकार (Article 14): लोकतंत्र में अमीर, गरीब, समाजसेवक या आम नागरिक, सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं। अगर सिर्फ “समाजसेवा” को पैमाना बनाया जाए, तो यह तय करना मुश्किल होगा कि असली समाजसेवक कौन है और जातीय बहुमत या पैसे के में के खेल में कई योग्य नागरिक चुनाव लड़ने से वंचित हो सकते हैं।
समाजसेवा की परिभाषा व्यक्तिपरक है: समाजसेवा की कोई एक कानूनी या निश्चित परिभाषा नहीं हो सकती। किसी के लिए दान देना समाजसेवा है, तो किसी के लिए कानून की समझ होना या लोगों की आवाज उठाना। इसे कानूनी योग्यता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता।
वैश्य समाज में अंतर्द्वंद या सोची-समझी रणनीति?
अब सवाल यह उठता है कि क्या इन दो नेताओं के सामने आने से वैश्य समाज के भीतर कोई अंतर्द्वंद शुरू हो गया है? या फिर मनोज गुप्ता के विरोध में, पंकज सिंह के पक्के समर्थक माने जाने वाले सत्यनारायण गोयल ने यह जानते हुए भी क्या अपनी चाल चल दी है कि बात अगर समुदाय विशेष को टिकट देने की होगी, तो उनकी दावेदारी भी मजबूत मानी जाएगी—और जरूरत पड़ने पर वह अपने नेता पंकज सिंह के इशारे पर बैठ भी सकते हैं?
लेकिन घूम-फिर कर सवाल वहीं अटक जाता है कि नोएडा जैसे मिली-जुली आबादी वाले प्रगतिशील शहर में, भारतीय जनता पार्टी किसी भी व्यक्ति को टिकट सिर्फ इसलिए क्यों दे दे कि उसके पास अकूत पैसा है, या उसके समाज के लोगों की संख्या थोड़ी ज्यादा है?
यह बात मनोज गुप्ता के संदर्भ में इसलिए भी समझ सकती है क्योंकि मनोज गुप्ता नोएडा के ही बरौला गांव से रहने वाले हैं, संकीर्ण जातिवादी ग्रामीण राजनैतिक सोच उनमे हो सकती है किंतु सत्यनारायण गोयल जो बीते 40 वर्षों से हरियाणा से आकर नोएडा के सेक्टर 56 में आकर बसे है, जिन्होंने यहाँ उधोग स्थापित किये है वह भी अगर सिर्फ जाति के नाम पर ही टिकट मांगते दिखाई दे रहे हैं तो राजनीतिक विमर्श और कुछ प्रश्न अवश्य खड़े होते हैं
इन गंभीर प्रश्नों का उत्तर समाज के साथ साथ अब गौतम बुद्ध नगर के वैश्य समुदाय के इन नेताओं को ही देना होगा। क्या जाति के नाम पर बने हमारे सामाजिक संगठनों ने समाज सेवा के रास्ते को छोड़कर राजनीति में अपने ‘मोहरे’ खड़े करने को नयी व्यापारिक रणनीति मान ली है? क्या राजनीती में पैसे के बलबूते समाजसेवी बन रहे वयापरियो को टिकट मिलना चाहिए सिर्फ इसलिए कि उनकी जातिवादी मानसिकता और महत्वकांक्षा अभी अतिसक्रिय हो गयी है, अगर हाँ स्थानीय नागरिकों और समझदार मतदाताओं को अब यह तय करना होगा कि राजनीति योग्यता और जनसेवा के आधार पर होनी चाहिए, या सिर्फ जाति और पैसे के दम पर!





