गौतम बुद्ध नगर में किसान आंदोलन या वर्चस्व की जंग? क्या है रुपेश वर्मा के सामने फिर राकेश टिकैत की सक्रियता और दो फाड़ होते किसान आन्दोलन का पूरा सच!

आशु भटनागर
10 Min Read

आशु भटनागर। सोमवार का दिन गौतम बुद्ध नगर के किसानों और स्थानीय प्रशासन के लिए बेहद सरगर्मियों भरा रहा। भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के आह्वान पर जिले की तीनों विकास प्राधिकरणों (नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे) पर किसानों ने अपनी मांगों को लेकर हल्ला बोला। खुद भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत तीनों प्राधिकरणों पर आंदोलनरत किसानों का हौसला बढ़ाने और उनमें जोश भरने पहुंचे। टिकैत ने हमेशा की तरह तीखे तेवर दिखाते हुए प्राधिकरणों पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया और साफ किया कि जब तक किसानों की मांगें पूरी नहीं होंगी, यह आंदोलन खत्म नहीं होगा।

- Support Us for Independent Journalism-
Ad image

यदि आप केवल मुख्यधारा की खबरों पर नजर रखेंगे, तो आपको लगेगा कि किसानों के हक के लिए यह एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी आंदोलन है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक ऐसा बड़ा ‘ट्विस्ट’ और अंतर्विरोध है, जिसे समझे बिना गौतम बुद्ध नगर के किसान आंदोलनों की असलियत को नहीं समझा जा सकता।

- Advertisement -
Ad image

एक ही मांग, एक ही जगह, लेकिन दो अलग-अलग पांडाल

दरअसल, इस हाई-प्रोफाइल आंदोलन से ठीक पहले, पिछले 7 दिनों से उन्हीं मांगों को लेकर ‘भारतीय किसान सभा’ के बैनर तले हजारों किसान पहले से ही आंदोलन कर रहे थे। इस आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय किसान नेता डॉ. रूपेश वर्मा, सुखवीर खलीफा और सोरेन प्रधान कर रहे थे।

शुक्रवार को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के सामने का नजारा बेहद दिलचस्प और हैरान करने वाला था। प्राधिकरण कार्यालय के बाईं तरफ स्थानीय किसान संगठन का पांडाल था, तो दाहिनी तरफ राकेश टिकैत की अगुवाई वाली भाकियू का। दोनों ही तरफ भीड़ लगभग बराबर थी। दोनों ही तरफ से किसानों के लिए एक जैसे बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि एक तरफ माइक पर राष्ट्रीय कद के राकेश टिकैत गरज रहे थे, तो दूसरी तरफ स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ रखने वाले डॉ. रूपेश वर्मा बरस रहे थे।

विपक्षी दलों की अजीबोगरीब कशमकश, सत्ताधारी भाजपा मोदी के जन्मदिन की तयारी में दिखी व्यस्त!

इस आंदोलन ने स्थानीय विपक्षी राजनीति के विरोधाभासों को भी पूरी तरह उजागर कर दिया। मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) इस आंदोलन में दो नावों पर सवार दिखी। जहां एक तरफ किसान सभा के मंच पर समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष वीर भाटी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, वहीं राकेश टिकैत के मंच पर सपा के ही जिला उपाध्यक्ष सुरेंद्र नागर किसानों के साथ खड़े दिखे। एक ही पार्टी के दो बड़े पदाधिकारियों का दो अलग-अलग मंचों पर होना यह साफ करता है कि राजनीतिक दल भी इस असमंजस में हैं कि वे किस धड़े का समर्थन करें। हालांकि, एक बात बिल्कुल साफ थी कि दोनों ही मंचों पर राजनीतिक दलों के नेता मुख्य भूमिका में नहीं थे, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।

वहीं दूसरी और किसानो के आन्दोलन पर सत्तारूढ़ भाजपा के जनप्रतिनिधियों की पूछताछ भी आन्दोलन स्थल पर हुई। देर शाम पता चला कि जब आन्दोलन में आये किसान यहाँ सांसद, विधायको, एमएलसी को पूछ रहे थे तब वो अपनी विधानसभा देवबंद में भारी विरोध झेल रहे जिला प्रभारी ब्रजेश सिंह के नेतृत्व में 17 सितम्बर से 17 अक्तूबर तक होने वाले स्वच्छता अभियान के विभिन कार्यक्रमों की रणनीति बना रहे थे। भाजपा का एजेंडा स्पस्ट था कि उन्हें फिलहाल तीनो प्रधिकारणों पर हो रहे इन आंदोलनों से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ रहा था। प्रशासन को केंद्र सरकार की 12 वर्षों की उपलब्धियों, जनकल्याणकारी योजनाओं एवं विकास कार्यों के व्यापक प्रचार-प्रसार के साथ ‘सेवा की कहानी’ कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न योजनाओं से लाभान्वित नागरिकों के जीवन में आए सकारात्मक बदलाव एवं सफलता की कहानियों को वीडियो, फोटो एवं डिजिटल माध्यमों से जन-जन तक पहुंचाने के निर्देश दिए जा रहे थे और इसको प्रभावी ढंग से आयोजित करने के लिए संबंधित विभागों एवं तीनों प्राधिकरणों की सहभागिता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा रहे थे। प्राधिकरण का सहयोग किस रूप में होना होगा इसको स्पस्ट कहना उचित नहीं होगा।

bjp leaders
जब आन्दोलन में आये किसान यहाँ सांसद, विधायको, एमएलसी को पूछ रहे थे तब वो बना रहे थे 17 सितम्बर से 17 अक्तूबर तक होने वाले स्वच्छता अभियान के विभिन कार्यक्रमों की रणनीति

टिकैत की बार-बार गौतम बुद्ध नगर में ‘एंट्री’ का सच क्या है?

राकेश टिकैत देश के एक सम्मानित और स्थापित किसान नेता स्वर्गीय महेंद्र सिंह टिकैत के पुत्र हैं। वह फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), बिजली-पानी पर सब्सिडी और खाद की किल्लत जैसे बुनियादी कृषि मुद्दों पर देशव्यापी आंदोलन के लिए जाने जाते हैं।

पर सवाल यह उठता है कि जिस गौतम बुद्ध नगर में पिछले 30 वर्षों से खेती ही नहीं की जा रही है, जहां कृषि भूमि का अधिग्रहण हो चुका है और जहां का किसान केवल जमीन के मुआवजे और प्लॉट (6% या 10% आबादी लैंड) के इर्द-गिर्द की राजनीति करता है, वहां राष्ट्रीय स्तर की किसान राजनीति करने वाले राकेश टिकैत बार-बार क्यों आते हैं?

सच ये है कि स्थानीय किसान नेताओं और राकेश टिकैत के बीच के संबंध भी आज बहुत सहज नहीं रहे हैं। पिछले वर्ष जब टिकैत ने इन्हीं स्थानीय नेताओं—रूपेश वर्मा, सोरेन प्रधान और सुखवीर खलीफा—के साथ मिलकर एक बड़ा आंदोलन किया था, तो आरोप है कि टिकैत ने आंदोलन के बीच में ही इन नेताओं का साथ छोड़ दिया था। जब इन स्थानीय नेताओं पर पुलिस के मुकदमे दर्ज हुए, तब टिकैत इन्हें मझधार में छोड़कर चले गए थे।

अब जब एक बार फिर 64 प्रतिशत अतिरिक्त मुआवजे और आबादी के मुद्दों को लेकर तवा गर्म हुआ है, तो राकेश टिकैत एक बार फिर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए गौतम बुद्ध नगर के मैदान में उतर आए हैं।

आन्दोलन में ही उपस्थित लोगो में चर्चा थी कि गौतम बुद्ध नगर में किसान आंदोलन अब किसानों की समस्याओं से ज्यादा ‘दूसरे कारणों’ के लिए मशहूर हो चुके हैं। जिले में इस समय 60 से अधिक किसान संगठन सक्रिय हैं। शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और जानकारों का दावा है कि इनमें से कई संगठन प्राधिकरणों में मध्यस्थता के कामों में व्यस्त रहते हैं। यही वजह है कि हर दूसरे महीने एक नया किसान संगठन कुकुरमुत्ते की तरह उग आता है।

इतने सारे संगठनों की मौजूदगी और प्राधिकरणों पर दबाव बनाकर करोड़ों-अरबों रुपये के मामलों (जैसे अतिरिक्त मुआवजा, बैकलीज और निविदाएं) को सुलझाने की गुंजाइश ने शायद राकेश टिकैत को भी आकर्षित किया है। टिकैत भी इस ‘बहती गंगा’ में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सांगठनिक जड़ें मजबूत करना चाहते हैं।

बड़ा सवाल: किसान नेताओं की तेग कब तक चलेगी ?

भारत में क्रांतिकारियों के बीच अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का एक शेर अक्सर इस देश में बहुत पढ़ा जाता है

“गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।”

अब सवाल यह है कि जिस जिले में 60 से अधिक किसान संगठन अपनी ढपली-अपना राग बजा रहे हों, वहां कब तक रुपेश वर्मा अपने सहयोगियों के साथ प्राधिकरणों के सामने आंदोलन की ‘तेग‘ यानी तलवार’ चलाते रहेंगे?

स्थानीय निवासियों और प्रशासनिक हलकों में अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि कई किसान आंदोलनों की आड़ में अक्सर नेताओं के चहेतों के प्लॉट (आबादी भूखंड) प्राधिकरण से पास करा लिए जाते हैं। आरोप यह भी लगते हैं कि आंदोलनों के नाम पर भारी-भरकम चंदा जुटाया जाता है और जैसे ही नेताओं का ‘फंड’ खत्म होता है, वे दोबारा आंदोलन का बिगुल फूंक देते हैं। अंत में ठगा हुआ वही आम किसान महसूस करता है, जो बड़े-बड़े वादों और ख्वाबों के भरोसे इन पंडालों में आकर बैठता है।

ऐसे में गौतम बुद्ध नगर के आम निवासियों और मूल किसानों को अब यह समझना होगा कि क्या इन आंदोलनों से उनका वास्तव में कोई भला होने वाला है, या फिर वे केवल बड़े किसान नेताओं के राजनीतिक कद को बढ़ाने और स्थानीय संगठनों की ‘दुकान’ चमकाने का जरिया बन रहे हैं। जब तक किसान खुद इन दोहरे मापदंडों और विभाजित नेतृत्व को नहीं पहचानेंगे, तब तक उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान प्राधिकरण की फाइलों में ही दबा रहेगा।

Share This Article
आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे