आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित सेक्टर 150 से एक गंभीर कानूनी उल्लंघन का मामला सामने आया है। आरोप है कि एल्डिको (Eldico) बिल्डर ने सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान जान गंवाने वाले कर्मचारियों के परिजनों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मुआवजे की राशि देने के बजाय, कम रकम में समझौता कर मामले को रफा-दफा करने का प्रयास किया है।
क्या है मामला ?
लगभग दो माह पूर्व, सेक्टर 150 स्थित एल्डिको सोसाइटी में रविवार की सुबह सीवर टैंक की सफाई के दौरान एक बड़ा हादसा हुआ था। इस सफाई कार्य में लगे सफाई कर्मचारी शशिकांत शर्मा और गार्ड आकाश टैंक के भीतर जहरीली गैस की चपेट में आ गए थे। पुलिस द्वारा उन्हें बाहर निकालकर अस्पताल पहुंचाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया था।

वर्ष 2023 में ‘डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए सीवर सफाई के दौरान मृत्यु होने पर मुआवजे की राशि को ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹30 लाख कर दिया था। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि मृतक के आश्रितों या कानूनी वारिसों को बढ़ी हुई राशि का भुगतान करना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, सफाई के दौरान दिव्यांगता होने पर ₹10 लाख से ₹20 लाख तक के मुआवजे का प्रावधान भी किया गया है। यह जिम्मेदारी संबंधित सरकारी निकायों, एजेंसियों या ठेकेदारों की तय की गई है।
ताजा जानकारी के अनुसार, एल्डिको कंपनी ने दोनों मृतकों के परिजनों को नियमानुसार ₹30 लाख का मुआवजा देने के बजाय कथित तौर पर केवल ₹6 लाख का भुगतान किया है। एनसीआर खबर के पास उस अग्रीमेंट की एक कापी है जिसमे कंपनी ने ₹50 के स्टाम्प पेपर पर परिजनों के साथ एक ‘सेटलमेंट एग्रीमेंट’ (समझौता अनुबंध) तैयार किया है। कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के अनिवार्य आदेश के सामने इस तरह के निजी अनुबंधों की कोई विधिक वैधता नहीं है, और यह सीधे तौर पर न्यायालय की अवहेलना का मामला है।
एनसीआर खबर ने एल्डिको का पक्ष जान्ने के लिए उनके प्रतिनिधि से संपर्क करने की कोशिश की किन्तु उनका फ़ोन हमेशा वायस मेल पर चल गया I
प्राधिकरण का पक्ष और प्रशासनिक चुनौतियां
इस प्रकरण पर जब नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों से संपर्क किया गया, तो उन्होंने पुष्टि की कि वे इस मामले को लेकर एल्डिको प्रबंधन के संपर्क में हैं। नोएडा प्राधिकरण का कहना है कि वे बिल्डर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार ₹30 लाख का भुगतान करने के लिए दबाव बना रहे हैं। हालांकि, धरातल पर अब तक केवल ₹6 लाख के मुआवजे का ही डेटा सामने आया है।
कानूनी और सुरक्षा प्रश्न यह मामला ‘हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013’ (MS Act, 2013) के क्रियान्वयन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। बिना सुरक्षा उपकरणों के सफाई कार्य करवाना कानूनन अपराध है।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या नोएडा प्राधिकरण और जिला प्रशासन इन ठेकेदारों और बिल्डरों पर सख्त कार्रवाई करेंगे? लोगो का कहना है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का इस तरह से उल्लंघन होता रहा, तो सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा और उनके परिवारों के भविष्य को सुनिश्चित करना अत्यंत कठिन हो जाएगा। फिलहाल, यह देखना शेष है कि क्या प्रशासन एल्डिको बिल्डर को पूर्ण मुआवजे के भुगतान के लिए विवश कर पाता है या नहीं।




