आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश की राजनीति में उच्च सदन यानी विधान परिषद का अपना एक विशिष्ट महत्व है। विशेष रूप से स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव बौद्धिक वर्ग और शिक्षा जगत की सक्रिय भागीदारी का प्रतीक माने जाते हैं। इसी कड़ी में, मेरठ खंड स्नातक और मेरठ खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए चुनावी बिगुल बज चुका है। गुरुवार से नामांकन प्रक्रिया के औपचारिक शुभारंभ के साथ ही पश्चिम उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
प्रशासनिक स्तर पर तैयारियों को अंतिम रूप दिए जाने के बाद, पहले दिन स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के लिए पहला नामांकन दाखिल किया गया, जिसने चुनावी दौड़ की औपचारिक शुरुआत कर दी है।
नामांकन प्रक्रिया का शानदार आरम्भ : पहला पर्चा दाखिल
मेरठ के कमिश्नरी कार्यालय में कड़ी सुरक्षा और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के बीच नामांकन प्रक्रिया शुरू हुई। गुरुवार को स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के लिए पहला नामांकन पत्र जमा किया गया। मेरठ के कसेरखेड़ा (आजाद नगर) निवासी प्रदीप कुमार, जो ‘आचार्य’ के नाम से भी जाने जाते हैं, ने राष्ट्रीय समाज दल के प्रत्याशी के रूप में अपना पर्चा दाखिल किया। प्रदीप कुमार ने अपने नामांकन पत्र के साथ दस प्रस्तावकों के हस्ताक्षर और अन्य आवश्यक दस्तावेज जमा किए। चुनाव अधिकारी ने उनके दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच की। पहले नामांकन के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि इस बार का मुकाबला बहुकोणीय और दिलचस्प होने वाला है।
चुनावी कार्यक्रम: महत्वपूर्ण तिथियां और समय
निर्वाचन आयोग ने इस चुनाव के लिए एक विस्तृत और पारदर्शी समय-सारणी निर्धारित की है। सभी उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों को इन समय-सीमाओं का पालन करना अनिवार्य है:
- नामांकन की अंतिम तिथि (6 अक्टूबर): प्रत्याशियों के पास पर्चा दाखिल करने के लिए 6 अक्टूबर तक का समय है। इस तिथि के बाद कोई भी नया नामांकन स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसके बाद प्राप्त दस्तावेजों की स्क्रूटनी (जांच) की जाएगी।
- नाम वापसी (9 अक्टूबर): जो प्रत्याशी किन्हीं कारणों से चुनाव मैदान से हटना चाहते हैं या यदि कोई रणनीतिक गठबंधन होता है, तो वे 9 अक्टूबर तक अपना नाम वापस ले सकेंगे। शाम तक चुनाव लड़ने वाले अंतिम प्रत्याशियों की सूची और उन्हें आवंटित चुनाव चिन्हों की स्थिति साफ हो जाएगी।
- मतदान (23 अक्टूबर): मतदान की प्रक्रिया 23 अक्टूबर को सुबह 8 बजे से शुरू होगी और शाम 4 बजे तक चलेगी। स्नातक और शिक्षक मतदाता अपने-अपने निर्धारित मतदान केंद्रों पर मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
- मतगणना और परिणाम (27 अक्टूबर): वोटों की गिनती 27 अक्टूबर को की जाएगी। इसी दिन देर शाम तक परिणाम घोषित होने की उम्मीद है।
- प्रक्रिया की पूर्णता (31 अक्टूबर): चुनाव आयोग ने 31 अक्टूबर तक संपूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया को औपचारिक रूप से संपन्न करने का लक्ष्य रखा है।
मैदान में उतरने के लिए तैयार उम्मीदवार: स्नातक सीट का समीकरण
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से इस बार कई अनुभवी और नए चेहरे मैदान में हैं। अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विभिन्न दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने अपनी दावेदारी पेश की है। मुख्य रूप से निम्नलिखित नाम चर्चा के केंद्र में हैं:
- प्रदीप कुमार उर्फ आचार्य: राष्ट्रीय समाज दल की ओर से मेरठ के निवासी प्रदीप कुमार ने अपनी दावेदारी पेश कर चुनावी अभियान की शुरुआत कर दी है।
- दिनेश गोयल: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने गाजियाबाद के कवि नगर निवासी दिनेश गोयल पर भरोसा जताया है। सत्ताधारी दल के उम्मीदवार होने के नाते उन पर बड़ी जिम्मेदारी होगी।
- प्रमेंद्र सिंह भाटी : समाजवादी पार्टी ने गौतमबुद्ध नगर पूर्व बार एसोसिएशन अध्यक्ष पर भरोसा जताया है।
- विक्रांत त्यागी: कांग्रेस पार्टी ने गाजियाबाद के डूडाहेड़ा और वर्तमान में शास्त्री नगर (मेरठ) निवासी विक्रांत त्यागी को मैदान में उतारा है। कांग्रेस इस चुनाव के जरिए अपनी खोई हुई जमीन तलाशने की कोशिश करेगी।
- मीनू जैन: मुजफ्फरनगर की निवासी मीनू जैन निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रही हैं, जो स्थानीय स्नातक मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाने का प्रयास करेंगी।
- राहुल कुशवाह: मुजफ्फरनगर के ही राहुल कुशवाह ने भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर अपनी दावेदारी पेश की है।
गुरुवार को अनुज कुमार ने भी निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन पत्र खरीदा है, जिससे स्नातक सीट पर मुकाबला और भी सघन होने की उम्मीद है।
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र: शिक्षा जगत के दिग्गजों में मुकाबला, क्या भाजपा के श्रीचंद शर्मा को हरा पायेंगे शिक्षक संघ ?
शिक्षक सीट हमेशा से ही वैचारिक और सांगठनिक मजबूती का परीक्षण रही है। इस बार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भी प्रमुख दलों और शिक्षक संघों ने अपने दिग्गज उतारे हैं:
- श्री चंद शर्मा: भारतीय जनता पार्टी ने गौतमबुद्ध नगर के निवासी श्री चंद शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है।
- डॉ. सुशील कुमार पुंडीर: माध्यमिक शिक्षक संघ की ओर से सहारनपुर के डॉ. सुशील कुमार पुंडीर मैदान में हैं।
- नितिन कुमार तोमर: समाजवादी पार्टी ने हापुड़ के नितिन कुमार तोमर पर दांव खेला है। सपा इस चुनाव के माध्यम से शिक्षकों के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहती है।
- बाकर हुसैन: कांग्रेस ने मुजफ्फरनगर के बाकर हुसैन को शिक्षक सीट के लिए अपना चेहरा बनाया है।
- अंशुल शर्मा और सुशील चौधरी: नोएडा और बागपत से क्रमशः ये दोनों उम्मीदवार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, गुरुवार को तनुज गंभीर और हरकेश सिंह ने भी निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पर्चा लिया है, जो यह दर्शाता है कि शिक्षक राजनीति में निर्दलीय प्रत्याशियों का भी खासा प्रभाव रहने वाला है।
इतिहास का गौरव और 2020 का वह ‘राजनैतिक भूकंप’
मेरठ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का इतिहास स्वर्गीय ओम प्रकाश शर्मा के जिक्र के बिना अधूरा है। जिन्हें शिक्षक राजनीति का ‘भीष्म पितामह’ कहा जाता था, उन्होंने करीब 48 वर्षों (लगातार 8 बार) तक इस सीट पर एकछत्र राज किया। उनके कालखंड में शिक्षक एमएलसी का पद किसी राजनीतिक दल की शक्ति का नहीं, बल्कि शिक्षकों के ‘स्वाभिमान’ और ‘यूनियन पावर’ का प्रतीक था।
लेकिन 2020 के चुनाव ने इस तिलस्म को तोड़ दिया। भारतीय जनता पार्टी के श्रीचंद शर्मा ने 48 साल से जीतते आ रहे ओम प्रकाश शर्मा को भारी मतों से पराजित किया। जहाँ श्रीचंद शर्मा को 7187 वोट मिले, वहीं ओम प्रकाश शर्मा मात्र 3003 वोटों पर सिमट गए। यह हार केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस गैर-राजनीतिक शिक्षक आंदोलन की हार थी, जो दशकों तक मुख्यधारा की राजनीति से ऊपर रहा था। इस बार, यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा अपना वर्चस्व बनाए रखती है या शिक्षक संगठन अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने में सफल होते हैं।
एक नए युग की शुरुआत: दिग्गजों का अभाव
इस बार का चुनाव ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि लगभग 54 साल बाद यह पहला मौका होगा जब शिक्षक राजनीति के दो सबसे बड़े चेहरे—ओम प्रकाश शर्मा और हेम सिंह पुंडीर—मैदान में नहीं होंगे। इन दोनों नेताओं ने न केवल शिक्षकों की लड़ाई लड़ी, बल्कि सदन में एक ऐसी आवाज बने जिसे कोई सरकार अनसुना नहीं कर सकती थी।
इन दिग्गजों की अनुपस्थिति में एक वैचारिक शून्य पैदा हुआ है। क्या नवागत प्रत्याशी उस बौद्धिक गहराई और जुझारूपन की कमी को पूरा कर पाएंगे? आज के पेशेवर मतदाताओं को यह सोचना होगा कि क्या वे ऐसे प्रतिनिधि को चुनना चाहते हैं जो उनकी समस्याओं को सदन में उठाए, या ऐसे व्यक्ति को जो केवल अपनी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के आदेशों का पालन करे।
शिक्षक संगठन बनाम राजनीतिक दल: एक वैचारिक द्वंद्व
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का मूल उद्देश्य यह था कि शिक्षा जगत से जुड़े लोगों की समस्याओं को सीधे सरकार तक पहुँचाया जा सके। लेकिन हाल के वर्षों में यह सीट ‘पार्टी पॉलिटिक्स’ का अखाड़ा बन गई है।
29 जून की रिपोर्टों से संकेत मिले थे कि शिक्षक संगठनों के भीतर भाजपा की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए रणनीति बनाई जा रही है। ‘शर्मा गुट’ और ‘ठकुराई गुट’ के बीच तालमेल की चर्चाएँ आम थीं। जुलाई में शर्मा गुट ने डॉ. सुशील पुंडीर (शिक्षक सीट) और अमित जैन (स्नातक सीट) को उतारकर अपनी मंशा साफ की।
30 सितंबर को बागपत में हुआ थकुराई गुट का सम्मेलन इस संदेश के साथ समाप्त हुआ कि “शिक्षक एमएलसी की सीट पर राजनीतिक दलों के बजाय शिक्षक संगठनों के प्रत्याशियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।” यह मांग तर्कसंगत भी है। जब एक सीट राजनीतिक दल के खाते में जाती है, तो वह ‘जनहित’ से अधिक ‘पार्टी हित’ के दायरे में आ जाती है। क्या एक शिक्षक या स्नातक मतदाता अपनी विशिष्ट समस्याओं के लिए किसी ऐसे नेता पर भरोसा कर सकता है जिसकी वफादारी पहले अपनी पार्टी और उसके एजेंडे के प्रति है?
स्नातक सीट: क्या केवल ‘डिग्री’ ही पात्रता है?
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की स्थिति भी शिक्षक सीट से अलग नहीं है। स्नातक मतदाता समाज का सबसे जागरूक हिस्सा माना जाता है। इंजीनियर, डॉक्टर, वकील और अन्य पेशेवर इस क्षेत्र के मतदाता होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि यहाँ भी चर्चा बेरोजगारी, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता या पेशेवर सुरक्षा पर होने के बजाय ‘पार्टी सिंबल’ पर सिमट जाती है।
भाजपा ने फिर से दिनेश गोयल को उतारकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की है, तो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी पेशेवर वर्ग के बीच अपनी पैठ बनाने की जुगत में हैं। परंतु, यहाँ सवाल यह है कि क्या कोई भी प्रत्याशी स्नातकों के करियर और भविष्य की सुरक्षा के लिए कोई ठोस रोडमैप पेश कर रहा है?
मतदाताओं के लिए सिर्फ एक चुनाव या फिर पीछे छिपा है बड़ा खेल
23 अक्टूबर का चुनाव केवल दो एमएलसी चुनने का चुनाव नहीं है। यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बौद्धिक राजनीति के भविष्य का प्रश्न है। यदि इस बार भी मतदाता केवल पार्टी के नाम पर वोट देते हैं, तो वे शिक्षक संगठनों की उस आधी सदी पुरानी स्वायत्तता को हमेशा के लिए समाप्त कर देंगे, जो कभी शिक्षकों और स्नातकों की ढाल हुआ करती थी।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की शिक्षक राजनीति आज एक दोराहे पर खड़ी है। एक तरफ भाजपा की संगठनात्मक शक्ति है, तो दूसरी तरफ शिक्षक संगठनों का अपने अस्तित्व को बचाने का संघर्ष। निर्दलीय और विपक्षी दलों के प्रत्याशी इस लड़ाई को और भी पेचीदा बना रहे हैं, पर परिणाम ही शिक्षको का भविष्य तय करेगा।
2020 में शिक्षक संगठनों के वर्चस्व का जो किला ढहा था, क्या 2024 (अक्टूबर चुनाव) में उसकी मरम्मत होगी? या फिर राजनीतिक दलों का बढ़ता प्रभाव इसे पूरी तरह से ‘पार्टी केंद्रित’ बना देगा?



