आशु भटनागर : उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है। हालांकि चुनाव में अभी समय है, लेकिन सियासी गलियारों में हलचल तेज है। क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ कोई लहर है? क्या बीजेपी के अंदर गुटबाजी हावी हो रही है? क्या अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति बदलकर बाजी पलट दी है? इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए एनसीआर खबर की टीम ने उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में ऑनलाइन सर्वे किया और स्थानीय लोगों से बात कर एक विस्तृत आकलन तैयार किया है।
जाति की वापसी और अखिलेश का ‘नो ईगो’ फॉर्मूला
एनसीआर खबर के सर्वे में एक बात साफ तौर पर उभर कर आई है कि बरसों बाद यूपी की राजनीति में ‘जाति’ अपनी पूरी ताकत के साथ वापस लौट आई है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने इस बार अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। कहा जा रहा है कि पूर्वांचल में अखिलेश ने अपना ‘ईगो’ (अहंकार) पूरी तरह किनारे रख दिया है। अब वे खुद अलग-अलग जातियों के पुराने और कद्दावर नेताओं से सीधा संपर्क साध रहे हैं। यधपि इसमें इसमें बाहुबलियों और अपराधियों के साथ वापसी की कहानी भी जुड़ रही है।
हमारी टीम ने पाया कि सपा अब हर विधानसभा सीट के हिसाब से जातिगत कैलकुलेशन कर रही है। हर हफ्ते एक-दो बड़े नेताओं से मुलाकात और रूठे हुए पुराने साथियों को वापस पार्टी में शामिल करने की योजना पर काम चल रहा है। अखिलेश की कोशिश है कि चुनाव तक माहौल को लगातार अपने पक्ष में बनाए रखा जाए।
बीजेपी के लिए जातिगत समीकरण बन रहे चुनौती
बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय कुछ खास पिछड़ी और दलित जातियों का छिटकना है। सर्वे के अनुसार, शाक्य, कश्यप और प्रजापति जैसी जातियों का झुकाव अब सपा की तरफ बढ़ता दिख रहा है। दलित समाज में ‘पासी’ जाति पूरी तरह से सपा के पाले में जाती दिख रही है।
हैरान करने वाली बात यह है कि कुशवाहा समाज में अब केशव प्रसाद मौर्य से ज्यादा असर बाबू सिंह कुशवाहा का दिख रहा है। वहीं, कुर्मी समाज में भी अनुप्रिया पटेल का जादू पहले जैसा नहीं रहा, वहां भी नाराजगी साफ झलक रही है।
मजबूत कानून वयवस्था का दावा अब कमज़ोर पड़ने लगा है यधपि अखिलेश राज का जंगल राज अभी भी लोगो को डराता है I इसके साथ ही भाजपा के राज में भ्रष्टाचार की चर्चाये अब अधिक सुनाई देने लगी है I मंत्रियो के खुले आम अधिकारियो से पैसे उगाही के चर्चे आम हो चले हैं I
योगी की लोकप्रियता बरकरार, पर विधायकों पर भारी गुस्सा
अगर बीजेपी के लिए कोई सबसे मजबूत ‘रामबाण’ है, तो वह हैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। सर्वे में लोगों ने स्पष्ट कहा कि मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई माहौल नहीं है। प्रदेश में एक लोकप्रिय नारा गूंज रहा है— “योगी से बैर नहीं, विधायक की खैर नहीं।”
बीजेपी के लगभग आधे विधायकों के खिलाफ जनता में प्रचंड गुस्सा है। लोगों का मानना है कि योगी तो ठीक काम कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर विधायक और प्रशासन उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे। अगर बीजेपी को 2027 जीतना है, तो उसे एक बार फिर ‘हिंदुत्व’ के मूल एजेंडे और योगी के चेहरे पर ही भरोसा करना होगा। इसके साथ ही 2 बार चुनाव जीते हुए विधायको के टिकट बदलने ही होंगे I
कांग्रेस और ओवैसी का ‘फैक्टर’
कांग्रेस की रणनीति इस बार बीजेपी से ज्यादा समाजवादी पार्टी के साथ सौदेबाजी पर टिकी है। कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक—दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम—को वापस पाने की कोशिश में है। अगर कांग्रेस इसमें सफल रहती है, तो वह सपा की मदद से बेहतर वापसी कर सकती है, लेकिन इसका नुकसान भी सपा को ही उठाना पड़ सकता है।
वहीं, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) इस बार चौंका सकती है। मुसलमानों के बीच ओवैसी की चर्चा बढ़ी है और माना जा रहा है कि इस बार यूपी में उनका खाता ही नहीं खुलेगा, बल्कि अगर वे मजबूती से लड़े तो उनकी सीटें दहाई के आंकड़े तक भी पहुंच सकती हैं।
मायावती और चंद्रशेखर की भूमिका
दलित राजनीति की बात करें तो जाटव वोटर एक बार फिर मायावती के साथ एकजुट होता दिख रहा है। हालांकि, युवा जाटव वोटरों में चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ को लेकर आकर्षण बढ़ा है, जो कुछ इलाकों में वोट काट सकते हैं।
संघ की रणनीति और 2029 का लक्ष्य
बीजेपी के नए युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने संगठन स्तर पर भी सुधार शुरू कर दिए हैं। संगठन में उन कार्यकर्ताओं को वापस मुख्यधारा में लाया जा रहा है जिन्होंने पार्टी के लिए अपना जीवन लगा दिया। संघ (RSS) भी पूरी तरह से योगी आदित्यनाथ के साथ खड़ा नजर आ रहा है। नागपुर और दिल्ली दोनों को यह बखूबी पता है कि अगर 2027 में यूपी फतह नहीं किया, तो 2029 की राह बेहद मुश्किल हो जाएगी।
ऐसे में देखा जाए तो 2027 का चुनाव विकास से ज्यादा नैरेटिव और जातिगत गोलबंदी का होने वाला है। जहां अखिलेश यादव ‘जातिगत समीकरण’ साधने में जुटे हैं, वहीं बीजेपी की उम्मीदें ‘योगी के चेहरे’ और ‘संगठनात्मक मजबूती’ पर टिकी हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता ‘जाति’ को चुनती है या ‘हिंदुत्व और चेहरे’ को।



