आशु भटनागर : भारत विविधताओं और ‘जुगाड़’ का देश है। यहाँ जब कोई आधुनिक तकनीक आती है, तो हम उसमें अपना देसी दिमाग लगाकर उसका स्वरूप ही बदल देते हैं। इसका सबसे सटीक उदाहरण है ब्रिटेन की मूल कंपनी रॉयल एनफील्ड की भारी-भरकम मोटरसाइकिल। जब यह पेट्रोल बाइक भारत आई, तो इसका खर्च मध्यमवर्ग की जेब पर भारी पड़ने लगा। भारतीय मैकेनिकों ने इसका नायाब तोड़ निकाला; पेट्रोल इंजन हटाकर खेतों में चलने वाला ‘ग्रीव्स डीजल इंजन’ फिट कर दिया। परिणाम स्वरूप ‘डीजल बुलेट’ का जन्म हुआ, जो 1 लीटर में 80 किलोमीटर तो चलती थी, लेकिन उसका मूल स्वरूप और उद्देश्य खत्म हो गया। बाद में प्रदुषण नियमो के चलते सरकार को उसे बैन भी करना पड़ा। आज यही ‘डीजल बुलेट’ वाली मानसिकता नोएडा प्राधिकरण के नए और भव्य कार्यालय में देखने को मिल रही है।
नोएडा प्राधिकरण का नया कार्यालय, जिसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा 28 जून 2024 को जनता को समर्पित किया गया था, अपनी आधुनिक वास्तुकला और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं के लिए चर्चा में था। सेक्टर-150 के युवराज काण्ड के बाद हटाए गए पूर्व सीईओ लोकेश एम. ने इस कार्यालय को विदेशी तर्ज पर विकसित करने में व्यक्तिगत रुचि ली थी, इसके लिए एयरपोर्ट की तर्ज पर रिसेप्शन बनाया गया था। उनका विजन था कि यहाँ आने वाला कोई भी नागरिक विदेशो की तर्ज पर बने रिसेप्शन पर अपनी समस्या बताए और वहीं से उसका समाधान या संबंधित विभाग तक पहुँच सुनिश्चित हो।
लेकिन जैसे ही नेतृत्व बदला, यहाँ तैनात महाप्रबंधकों (GM) और वरिष्ठ प्रबंधकों (SM) ने अपना ‘देसी जुगाड़’ भिड़ाना शुरू कर दिया। जिस कार्यालय को बिना किसी पारंपरिक सरकारी बाधा के चलना था, वहाँ अब वहीं पुराना बाबुओ वाला ‘पास सिस्टम’ का पुराना ढर्रा फिर से थोप दिया गया है। प्राधिकरण के भवन के बहार ग्रीन बेल्ट में बने इस कथित रिसेप्शन को सुंदर चेहरे पर मोटा काला बदनुमा मस्सा कहा जा रहा है।
एक तरफ जहाँ ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के सीईओ एन.जी. रवि कुमार और यमुना प्राधिकरण (YEIDA) पूर्व सीईओ के डॉ. अरुणवीर सिंह और नए सीईओ राकेश कुमार सिह इस बात पर जोर देते रहे कि आम जनता के लिए कार्यालयों के दरवाजे खुले रहें और कोई जटिल नियम आड़े न आए, वहीं इस कार्यालय का प्रबंधन देख रहे नोएडा प्राधिकरण के महाप्रबंधक एसपी सिंह ‘लालफीताशाही’ को ऑक्सीजन देने में जुटे हैं।
प्राधिकरण में चर्चा है कि, इस बेढंगे पास सिस्टम को लागू करने के पीछे उन ठेकेदारों का भी भारी दबाव है, जो वर्षों से ‘सिटीजन चार्टर’ के नाम पर यहाँ मैनपावर की सप्लाई कर रहे हैं। इस आधुनिक बिल्डिंग के डिजाइन को दरकिनार करते हुए अब आम जनता को नीचे पार्किंग से ही रोकने की तैयारी है। जिसके चलते पहले ही दिन प्राधिकरण के भवन के बाहर सडको पर गाडियों की लाइन लग गयी।
हैरानी की बात यह है कि जहाँ आम नागरिक को अपनी जायज शिकायतों के लिए पास के चक्कर काटने पड़ेंगे, वहीं प्रॉपर्टी डीलर, ठेकेदार और बिचौलिए आज भी बेरोकटोक गलियारों में घूमते नजर आ रहे हैं। प्राधिकरण के हालात ये है कि 5 माह बाद भी पुराने ऑफिस से फ़ाइल नहीं आ पाई हैं I बेसमेंट पार्किंग में गाडियों की मार्किंग नहीं की गयी है I यहाँ तक कि पार्किंग में मिटटी को हटाकर पूरा फर्श तक नहीं हुआ हैI प्राधिकरण की सफाई वयवस्था भी सरकारी ही दिखाई दे रही है। पूर्व सीईओ लोकेश एम. ने योजना बनाई थी कि व्यक्ति सीधे पार्किंग से ग्राउंड फ्लोर रिसेप्शन पर आएगा और वहीं से उसकी फाइल आगे बढ़ेगी। लेकिन वर्तमान महाप्रबंधक सिविल की ‘बाबू मानसिकता’ ने इसे फिर से एक बंद किले में तब्दील कर दिया है। किसी ने कहा कि अगर आम आदमी सीधी अपने काम के लिए चला जाएगा तो प्राधिकरण के बाबुओ का भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो जाएगा।
नोएडा प्राधिकरण का यह नया दफ्तर अब उस ‘डीजल बुलेट’ की तरह होने जा रहा है, जिसकी बॉडी तो शानदार और विदेशी है, लेकिन अंदर का इंजन वही पुराना, शोर करने वाला और धुआं छोड़ने वाला ‘लालफीताशाही’ का है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मंशा उत्तर प्रदेश के प्रशासन को पारदर्शी और सुलभ बनाने की है, लेकिन ग्राउंड जीरो पर बैठे अधिकारी अपनी कुर्सी की धमक और नियंत्रण खोने के डर से आधुनिक तकनीक को भी ‘जुगाड़’ की भेंट चढ़ा रहे हैं।
नोएडा प्राधिकरण से सवाल अब भी वही है—क्या नोएडा के निवासियों को करोड़ों की इस भव्य इमारत में सम्मान और समाधान मिलेगा, या पास बनवाने की लंबी लाइनों में खड़ा होकर पुराने सिस्टम का हिस्सा बनना पड़ेगा?



