ग्रेटर नोएडा की एक स्थानीय अदालत ने कलाधाम सोसाइटी में छह वर्षीय बच्चे की मौत के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। अपर सत्र न्यायाधीश (चतुर्थ) मयूर जैन ने आरोपित ठेकेदार मनोज जैन की जमानत याचिका को सिरे से खारिज करते हुए टिप्पणी की कि आवासीय परिसर में सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज कर जानलेवा गड्ढा छोड़ना केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जानबूझकर किया गया एक गंभीर अपराध है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला कलाधाम सोसाइटी का है, जहाँ रहने वाले शिवान यादव के छह वर्षीय बेटे अव्यान की मौत एक गहरे गड्ढे में गिरने से हो गई थी। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने ठेकेदार मनोज जैन की फर्म को बोरिंग का ठेका दिया था। आरोप है कि ठेकेदारों ने आवासीय क्षेत्र के भीतर 10-15 फीट गहरा गड्ढा खोदकर उसे पानी से भरा छोड़ दिया था। जिस स्थान पर यह गड्ढा खोदा गया था, वह बच्चों के खेलने की जगह थी। बिना किसी चेतावनी बोर्ड, घेराबंदी या सुरक्षा घेरे के खुले छोड़े गए इस गड्ढे में गिरने से मासूम अव्यान की जान चली गई थी। इस घटना के बाद नालेज पार्क कोतवाली पुलिस ने ठेकेदार मनोज जैन समेत तीन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया था।
न्यायालय की तीखी टिप्पणी
शुक्रवार को आरोपित ठेकेदार की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता नितिन त्यागी और अधिवक्ता रजनीश यादव ने दलीलें पेश कीं। उन्होंने अदालत को बताया कि निर्माण स्थल पर सुरक्षा के बुनियादी मानकों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया, जिससे एक मासूम की जान गई।
सुनवाई के बाद केस डायरी और एफआईआर का अवलोकन करते हुए न्यायाधीश मयूर जैन ने कहा, “आवासीय परिसर में, जहाँ बच्चे खेलते हैं, बिना सुरक्षा उपायों के इतना गहरा गड्ढा छोड़ना निवासियों और बच्चों की जान के लिए सीधा खतरा है।”

अदालत ने माना कि ठेकेदार की फर्म ने निर्माण नियमों के तहत निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह केवल एक चूक नहीं थी, बल्कि प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि आरोपित ने संभावित खतरे को जानते हुए भी जानबूझकर उसे नजरअंदाज किया।
जमानत याचिका खारिज बचाव
पक्ष के वकील ने दलील दी थी कि आरोपित निर्दोष है और पुलिस ने उसे दुर्भावना के तहत झूठा फंसाया है। हालांकि, न्यायालय ने अपराध की प्रकृति को अत्यंत गंभीर और ‘जानकारी आधारित अपराध’ (Knowledge-based crime) मानते हुए ठेकेदार को राहत देने से इनकार कर दिया और उसकी जमानत याचिका निरस्त कर दी।
इस फैसले से उन निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों को कड़ा संदेश गया है जो सार्वजनिक और आवासीय क्षेत्रों में काम करते समय सुरक्षा मानकों की अनदेखी करते हैं।



