यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) ने क्षेत्र में औद्योगिक विकास की धीमी गति पर कड़ा रुख अपनाया है। प्राधिकरण ने नियमों का उल्लंघन करने और किस्तों की राशि जमा न करने पर सात औद्योगिक भूखंडों का आवंटन निरस्त कर दिया है। वहीं, दूसरी ओर प्राधिकरण की ढिलाई के कारण मेडिकल डिवाइस पार्क के एक आवंटी ने अपना भूखंड सरेंडर कर दिया है।
यमुना सिटी में औद्योगिक विकास का सपना देख रहे स्थानीय निवासियों के लिए यह कार्रवाई एक ओर जहां उम्मीद जगाती है, वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में उद्योगों के चालू न होने की जमीनी हकीकत को भी उजागर करती है।
क्यों रद हुए भूखंड?
प्राधिकरण द्वारा की गई समीक्षा में सामने आया कि कई आवंटी जमीन का कब्जा मिलने के बाद भी न तो लीज डीड करा रहे हैं और न ही निर्माण कार्य शुरू कर रहे हैं।
आवंटन राशि न देने पर निरस्त: सेक्टर 29 में 5,000 वर्गमीटर का एक, सेक्टर 33 में 795 वर्गमीटर का एक और सेक्टर 32 में 300 वर्गमीटर के दो व 1,000 वर्गमीटर का एक भूखंड (कुल 5 भूखंड) आवंटन राशि जमा न करने पर रद किए गए हैं।
लीज डीड न कराने पर निरस्त: सेक्टर 32 में ही 600 वर्गमीटर और 1,000 वर्गमीटर के दो भूखंड लीज डीड न कराने के कारण रद किए गए।
प्राधिकरण की लापरवाही से सरेंडर: मेडिकल डिवाइस पार्क में 1,000 वर्गमीटर के एक आवंटी ने अपना भूखंड इसलिए सरेंडर कर दिया क्योंकि प्राधिकरण उसे समय पर चेकलिस्ट ही जारी नहीं कर सका था।

कागजों में उद्योग, जमीन पर सन्नाटा, प्राधिकरण को भी अपनी कार्यप्रणाली में करना होगा सुधार
स्थानीय निवासियों और रोजगार की तलाश कर रहे युवाओं के नजरिए से देखें तो यमुना प्राधिकरण की यह कड़ाई बेहद जरूरी थी। आंकड़े खुद गवाही देते हैं कि प्राधिकरण अब तक रिकॉर्ड 3,189 औद्योगिक भूखंडों का आवंटन कर चुका है, लेकिन धरातल पर महज 54 इकाइयां ही क्रियाशील हो पाई हैं। हालांकि 82 इकाइयों का निर्माण पूरा हो चुका है, फिर भी यह संख्या कुल आवंटन के मुकाबले बेहद निराशाजनक है।
अधिकतर आवंटी जमीन का आवंटन लेकर बैठ गए हैं और निर्माण में आनाकानी कर रहे हैं। एक तरफ जहां वास्तविक उद्यमी जमीन के लिए कतार में खड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन घेरकर बैठे लोगों के कारण स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो पा रहे हैं।
हालांकि, इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि खुद प्राधिकरण को भी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करना होगा। मेडिकल डिवाइस पार्क का उदाहरण दिखाता है कि ‘रेड टेपिज्म’ (प्रशासनिक देरी) के कारण निवेशक हतोत्साहित हो रहे हैं। यदि चेकलिस्ट न मिलने पर निवेशक प्लॉट वापस कर रहे हैं, तो प्राधिकरण को अपनी जवाबदेही भी तय करनी होगी।
11 और आवंटियों पर लटकी तलवार
प्राधिकरण अब हर एक आवंटी की समीक्षा कर रहा है और उनसे निर्माण न करने की वजह पूछ रहा है। यीडा के एसीईओ शैलेंद्र भाटिया ने बताया कि अंतिम सुनवाई के बाद 27 आवंटियों को 31 अगस्त तक का अंतिम समय दिया गया है। इसके अलावा 11 अन्य आवंटियों की अंतिम सुनवाई अभी बाकी है, जिस पर जल्द ही कड़ा फैसला लिया जाएगा।
यमुना प्राधिकरण जिस तेजी से नए उद्योगों के लिए जमीन क्रय कर रहा है, उसी तेजी से पुराने आवंटियों से काम शुरू कराने की जरूरत है। उम्मीद है कि प्राधिकरण की इस सख्ती से क्षेत्र में वास्तविक उद्योग स्थापित होंगे, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और यमुना सिटी का समग्र आर्थिक विकास संभव हो सकेगा।




