शहरी विकास और रियल एस्टेट संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और नियमों की दुहाई देने वाला नोएडा प्राधिकरण (Noida Authority) एक बार फिर विवादों के घेरे में है। प्राधिकरण में ही हो रही चर्चाओ के अनुसार जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) पर दर्ज एक शिकायत के बाद प्राधिकरण के भीतर खलबली मच गई है। मामला लगभग 25 वर्ष पूर्व रद्द किए गए एक आवासीय प्लॉट को फिर से बहाल (Restore) करने के कथित प्रयास से जुड़ा है। इस पूरे प्रकरण में प्राधिकरण के विधि अधिकारी (Law Officer) और संपत्ति विभाग के एक सहायक महाप्रबंधक (AGM) की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है।
25 वर्षों का पूरा घटनाक्रम: नियमों को ताक पर रखने का खेल?
वायरल IGRS शिकायत में दर्ज आंकड़ों के अनुसार, यह मामला नोएडा के पॉश इलाके सेक्टर-41 स्थित 180 वर्ग मीटर के एक भूखंड से संबंधित है:
26 जून 1991: नोएडा प्राधिकरण ने यह प्लॉट एक व्यक्ति को आवंटित किया था।
18 मार्च 2000: नियमानुसार समय पर लीज डीड (Lease Deed) की औपचारिकताएं पूरी न करने और बार-बार नोटिस दिए जाने के बावजूद जवाब न मिलने पर प्राधिकरण ने इस आवंटन को आधिकारिक रूप से रद्द कर दिया।
11 अगस्त 2016: मूल आवंटी का निधन हो गया।
01 नवंबर 2023: मूल आवंटी की मृत्यु के सात वर्ष बाद और आवंटन रद्द होने के 23 वर्ष बाद, उनकी बेटी ने एक पत्र के माध्यम से इस प्लॉट को पुनः बहाल करने का आवेदन किया।
प्राधिकरण की चर्चाओ की माने तो दावा यह है कि रद्द होने के लगभग ढाई दशक बाद आए इस आवेदन को खारिज करने के बजाय, प्राधिकरण के विधि अधिकारी और संपत्ति विभाग के संबंधित एक एजीएम ने इस केस को ‘वैध’ ठहराते हुए प्लॉट की बहाली (Restoration) की संस्तुति दे दी है। चर्चा है कि अब इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए प्राधिकरण की आगामी बोर्ड बैठक में रखने की तैयारी की जा रही है।

व्यावसायिक और नैतिक सवाल: क्या यह नीतिगत भ्रष्टाचार है?
एक ओर जहां सामान्य नागरिकों को प्राधिकरण के चक्कर काटने पड़ते हैं, वहीं दूसरी ओर 25 साल पुराने रद्द आवंटन को बहाल करने की यह जल्दबाजी कई गंभीर सवाल खड़े करती है:
प्रशासनिक मानकता का उल्लंघन: नियमतः यदि कोई आवंटन रद्द हो जाता है और उस पर दशकों तक कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती, तो वह संपत्ति स्वतः प्राधिकरण के लैंड बैंक में वापस चली जाती है। ऐसे में 25 साल पुराने मामले को किस लीगल ग्राउंड पर पुनर्जीवित किया जा रहा है?
राजस्व को बड़ा नुकसान: सेक्टर-41 जैसे विकसित और प्रीमियम इलाके में 180 वर्ग मीटर के प्लॉट की वर्तमान बाजार कीमत करोड़ों रुपये में है। पुराने आवंटन को बहाल करने से प्राधिकरण को मिलने वाले राजस्व को भारी नुकसान पहुंचेगा, जो सीधे तौर पर सरकारी खजाने में सेंध लगाने जैसा है।
गलत नजीर पेश करने का जोखिम: यदि इस तरह के मामलों को बोर्ड से मंजूरी दी जाती है, तो यह भू-माफियाओं और भ्रष्ट अधिकारियों के लिए एक खतरनाक रास्ता खोल देगा, जिससे पुराने और रद्द पड़े सैकड़ों मामलों को दोबारा जिंदा करने का खेल शुरू हो जाएगा।
प्राधिकरण में चर्चाओं का बाजार गर्म, उच्चस्तरीय जांच की मांग
इस वायरल IGRS के सामने आने के बाद नोएडा प्राधिकरण के प्रशासनिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं और अफवाहें जोर पकड़ रही हैं। निष्पक्ष अधिकारियों और रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि मृत व्यक्ति के नाम पर फाइल को आगे बढ़ाकर इस तरह का फर्जीवाड़ा बिना सांठगांठ के संभव नहीं है।
पेशेवर दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला केवल एक प्लॉट के आवंटन का नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस और प्रशासनिक सत्यनिष्ठा (Administrative Integrity) का है। उत्तर प्रदेश सरकार और नोएडा प्राधिकरण के शीर्ष अधिकारियों को इस मामले का संज्ञान लेते हुए तत्काल प्रभाव से बोर्ड में जाने वाली इस फाइल पर रोक लगानी चाहिए और संबंधित अफसरों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि सरकारी तंत्र में जनता और निवेशकों का विश्वास बना रहे।




