आशु भटनागर। त्योहारी सीज़न की शुरुआत से ठीक पहले उच्च मूल्य वाले यूपीआई (UPI) ट्रांजैक्शंस पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के सरकार और नियामक के फैसलों ने भारतीय खुदरा बाजार में हलचल पैदा कर दी है। भले ही सरकार का सख्त निर्देश हो कि रिटेलर्स MDR का यह अतिरिक्त बोझ सीधे तौर पर ग्राहकों पर नहीं डाल सकते, लेकिन बिजनेस जगत और उद्योग विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि अंततः इसका वित्तीय बोझ उपभोक्ताओं की जेब पर ही पड़ेगा।
‘इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उद्योग के जानकारों का कहना है कि भले ही इस बढ़ोतरी को बिलों में ‘यूपीआई सरचार्ज’ के रूप में नहीं दर्शाया जाएगा, लेकिन कंपनियां और रिटेलर्स अपने उत्पादों की बेस प्राइस (मूल कीमत) में बढ़ोतरी कर सकते हैं या फिर त्योहारी डिस्काउंट में कटौती कर सकते हैं।
त्योहारी सीजन और 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन
त्योहारों के दौरान भारतीय बाजारों में खरीदारी का आंकड़ा तेजी से बढ़ता है। एक प्रमुख डिपार्टमेंट स्टोर चेन के एक वरिष्ठ रिटेलर ने इस बात पर चिंता जताई है कि त्योहारी खरीदारी के दौरान अधिकांश बिल 2,000 रुपये की सीमा को पार कर जाते हैं।
रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (RAI) के चीफ एक्जीक्यूटिव कुमार राजगोपालन का कहना है, “त्योहारी सीजन के दौरान बड़ी संख्या में ट्रांजैक्शन 2,000 रुपये से ज्यादा के होते हैं। ऐसे में ब्रांड्स और रिटेलर्स के सामने मार्जिन का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। परिणामस्वरूप, सामान बनाने वाली कंपनियों (मैन्युफैक्चरर्स) ने कीमतें बढ़ाने या छूट कम करने के संकेत देने शुरू कर दिए हैं।”
चौतरफा दबाव से जूझ रहा परिधान उद्योग
क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (CMAI) के प्रेसिडेंट संतोष कटारिया ने इस फैसले के समय पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके मुताबिक, त्योहारी सीजन की मुहाने पर UPI पर MDR लागू करना एक ऐसा कदम है जो पहले से ही दबाव में चल रहे कपड़ा उद्योग की मुश्किलें और बढ़ा देगा।
व्यापारी और निर्माता पहले से ही उच्च मुद्रास्फीति (Inflation) और लॉजिस्टिक्स की बढ़ती लागत जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा, RAI के प्रमुख कुमार राजगोपालन का यह भी मानना है कि इस साल की शुरुआत में पश्चिम एशिया (West Asia) में उत्पन्न भू-राजनीतिक तनावों और सप्लाई चेन की बाधाओं ने खुदरा क्षेत्र की कमर पहले ही तोड़ रखी है। ऐसे में MDR का नया बोझ उद्योग के लिए ‘कोढ़ में खाज’ साबित हो रहा है।
छोटे कारोबारियों और मार्जिन पर असर
बिजनेस विश्लेषकों का मानना है कि 0.4% का यह MDR शुल्क सुनने में भले ही छोटा लगे, लेकिन यह उन खुदरा विक्रेताओं के लिए भारी साबित होगा जो पहले से ही बेहद कम प्रॉफिट मार्जिन पर काम कर रहे हैं। खासकर छोटे रिटेलर्स, जो डिजिटल के साथ-साथ बड़े पैमाने पर कैश ट्रांजैक्शन पर निर्भर हैं, उनके लिए अनुपालन और लागत प्रबंधन दोनों कठिन हो जाएंगे।
सरकार कुछ भी कहे, अंततः उपभोक्ता पर गिरेगी गाज
व्यावसायिक दृष्टिकोण से देखें तो, सरकार के प्रत्यक्ष प्रतिबंध के बावजूद, बाजार की आर्थिक वास्तविकताएं अपना रास्ता ढूंढ ही लेती हैं। जब तक कॉर्पोरेट मार्जिन पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते, तब तक व्यापारी किसी न किसी रूप में इस लागत को उपभोक्ताओं से ही वसूलेंगे। त्योहारी सीजन, जो कि खरीदारी का पीक टाइम होता है, वहां कीमतों में यह संभावित बढ़ोतरी आम आदमी के त्योहारी बजट को बिगाड़ सकती है। पेशेवर और व्यापारिक हलकों में इस बात पर आम सहमति बन रही है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने वाली नीतियों के बीच इस तरह के शुल्क से खुदरा क्षेत्र की रिकवरी पर अस्थायी ब्रेक लग सकता है।





