आशु भटनागर। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों की प्राथमिक जिम्मेदारी जनता के प्रति सहज सुलभता और जवाबदेही की होती है। लेकिन जब किसी जिले का प्रभारी मंत्री आम नागरिक द्वारा फोन करने पर पुलिस तफ्तीश का भय दिखाए, तो यह न केवल राजनीतिक अहंकार को उजागर करता है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था के दुरुपयोग पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
ताजा मामला गौतम बुद्ध नगर का है, जहां प्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) राज्य मंत्री और जिले के प्रभारी मंत्री कुंवर ब्रजेश सिंह पर एक स्थानीय समाजसेवी ने बेहद गंभीर और असहज करने वाले आरोप लगाए हैं। अपने अहंकारी व्यक्तित्व के चलते अपनी ही विधानसभा क्षेत्र देवबंद में स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं से लेकर जनता तक का कड़ा विरोध झेल रहे मंत्री ब्रजेश सिंह अब गौतम बुद्ध नगर में अपनी कार्यशैली को लेकर घिर गए हैं।
क्या है पूरा मामला?
गौतम बुद्ध नगर के प्रभारी मंत्री होने के नाते ब्रजेश सिंह का अक्सर जिले में आना-जाना और समीक्षा बैठकें करना लगा रहता है। इसी क्रम में ग्रेटर नोएडा के कवि,पर्यावरणविद् और प्रमुख समाजसेवी ओम रायजादा ने मंत्री जी के आधिकारिक फेसबुक पेज पर सार्वजनिक रूप से दिए गए नंबर को ले लिया। जनप्रतिनिधि से संवाद की मंशा से जब उन्होंने इस नंबर पर कॉल की, तो जो हुआ वह चौंकाने वाला था।
सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को टैग का लिखी पोस्ट में ओम रायजादा के अनुसार, दो-तीन बार कॉल करने के बाद भी जब सीधे बात नहीं हो सकी, तो कुछ ही मिनटों में एक आधिकारिक प्रोफाइल से उनके पास व्हाट्सएप्प कॉल आई। फोन करने वाले शख्स (जो पुलिस महकमे से जुड़ा प्रतीत हो रहा था) ने समाजसेवी से मंत्री जी को फोन करने के “दुस्साहस” का कारण पूछा। इतना ही नहीं, यह भी सामने आया कि समाजसेवी का नंबर देवबंद पुलिस को तफ्तीश के लिए भेज दिया गया था।

“मुख्यमंत्री जी, मंत्री जी को समझाइए…”
इस पूरे घटनाक्रम से क्षुब्ध होकर समाजसेवी ओम रायजादा ने सोशल मीडिया पर एक तीखी और विचारणीय पोस्ट लिखी, जिसे सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित किया गया है। उन्होंने लिखा:
“MYogiAdityanath जी, आप मंत्री जी को बताइए कि प्रभारी का मतलब केवल जिले के एम पी और एम एल ए से बात करना ही नहीं है… पब्लिक का कोई भी बंदा आपको फोन कर सकता है… या उन्हें अपना फोन नंबर सार्वजनिक न करने की सलाह दीजिए।”
रायजादा ने आगे लिखा कि वह तो हिम्मत दिखाकर पुलिस के सवालों का बेबाकी से जवाब दे गए, लेकिन किसी आम नागरिक के लिए इस तरह का पुलिसिया डर बेहद चिंताजनक है।
सत्ता का सुरूर या जनसंवाद से दूरी?
इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और प्रबुद्ध हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। पेशेवर वर्ग और राजनीतिक विश्लेषक इसे जनप्रतिनिधियों में बढ़ते ‘वीआईपी कल्चर’ और ‘अहंकार’ के रूप में देख रहे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को करीब से देखने वाले लोगों का मानना है कि इस क्षेत्र के नेताओं की पहचान हमेशा जनता के बीच सहज उपलब्धता की रही है। हालांकि, मौजूदा दौर के कुछ नए जनप्रतिनिधियों में जनता से दूरी बनाने और खुद को ‘अजेय’ समझने की प्रवृत्ति बढ़ी है।
चर्चा यह भी है कि ब्रजेश सिंह अपने करीबियों में अक्सर यह दावा करते हैं कि सरकार में मंत्री होने के नाते उनका चुनाव में टिकट काटना संगठन के लिए असंभव है, क्योंकि इससे चुनाव पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यही कारण है कि अपने गृह क्षेत्र देवबंद से लेकर गौतम बुद्ध नगर तक, उनके प्रति असंतोष की लहर साफ देखी जा सकती है।
उठते गंभीर सवाल
यह घटना केवल एक फोन कॉल और पुलिस तफ्तीश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ के शासन और जनता के बीच बनते जा रहे उस फासले की ओर इशारा करती है जिसे दूर करने का दावा अक्सर मंचों से किया जाता है।
सार्वजनिक नंबर का औचित्य क्या? यदि कोई मंत्री या जनप्रतिनिधि अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर जनता के लिए नंबर साझा करता है, तो उस पर कॉल करने को “दुस्साहस” कैसे माना जा सकता है?
पुलिस का अनुचित उपयोग: क्या एक आम नागरिक द्वारा प्रभारी मंत्री से बात करने का प्रयास करना कोई ऐसा अपराध है कि उसके नंबर की पुलिस तफ्तीश कराई जाए?
प्रभारी मंत्री का वास्तविक दायित्व: क्या किसी जिले का प्रभारी मंत्री केवल नौकरशाहों और स्थानीय विधायकों/सांसदों के लिए होता है, या जिले की आम जनता की समस्याओं को सुनना भी उसकी प्राथमिकता है?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार हमेशा “जीरो टॉलरेंस” और “सुशासन” का दावा करती रही है। ऐसे में किसी राज्य मंत्री का यह रवैया सरकार की अपनी छवि पर भी बट्टा लगाता है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा संगठन और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कथित तोर पर अपने इस प्रिय मंत्री की कार्यशैली का संज्ञान लेते हैं, या फिर राजनीतिक अपरिहार्यता के नाम पर जनता के इस असंतोष को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। प्रबुद्ध जनता और मतदाता इस तरह के व्यवहार को बहुत करीब से देख रहे हैं, जिसका जवाब अक्सर चुनावों में खामोशी से दिया जाता है।





