आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘हारी हुई बाजी’ को पलटने के लिए क्या समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने एक ऐसा जुआ खेल दिया है, जो भविष्य में उनके लिए भारी पड़ सकता है? दादरी की रैली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदलती सियासी हवा ने एक नए सवाल को जन्म दे दिया है: क्या PDA के नाम पर सिर्फ गुर्जरों को साधने के चक्कर में अखिलेश ने सूबे के तीन सबसे प्रभावशाली समुदायों—जाट, ठाकुर और ब्राह्मणों के साथ अन्य सवर्ण समाज (वैश्य , कायस्थ ओर पंजाबी) को दांव पर लगा दिया है? कम से रैली में स्थानीय सवर्ण सपा नेताओं की मंच से अनुपस्थिति तो यही बता रही है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदलते सामाजिक और राजनैतिक समीकरण : ‘अजगर’ से सिर्फ गुर्जर पॉलिटिक्स तक
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति दशकों तक ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) दलित और मुस्लिम समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है, सवर्ण ( ठाकुर, ब्राह्मण, वैश्य, कायस्थ ओर पंजाबी) भाजपा के कोर वोटर माने जाते रहे है।
2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हुए जाटों के ध्रुवीकरण में ने 2017 के चुनावों में सपा को सत्ता से बाहर कर दिया। मौसम बदला तो सपा के बड़े गुर्जर नेता नरेंद्र भाटी, सुरेंद्र सिंह नागर भी भाजपा में चले गए। ऐसे में अखिलेश यादव लंबे समय तक जयंत चौधरी के सहारे जाट वोटों की उम्मीद लगाए रहे, लेकिन अब आरएलडी भी भाजपा के साथ है। हाल ही में पार्टी में आए केसी त्यागी ने भी कहा है कि जयंत चौधरी को जितनी ज्यादा छूट मिलेगी, एनडीए के लिए उतना ही बेहतर होगा वो पश्चिम में सपा को उतना ही नुकसान पहुंचाएगी। बिजनौर और बागपत जैसी सीटों पर भाजपा-आरएलडी गठबंधन की मजबूती ने अखिलेश को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया है।
अब अखिलेश यादव की नज़र उस गुर्जर समुदाय पर है, जिसे भाजपा ने सत्ता में भागीदारी तो दी है, लेकिन कई ज़िलों में आज भी वे राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए महत्वाकांक्षी हो रहे हैं। बुलंदशहर, मुरादाबाद, रामपुर और बरेली जैसे मंडलों में गुर्जर विधायकों की अनुपस्थिति को अखिलेश एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। और इसीलिए उन्होंने यहां संभावनाएं तलाशने का मौका देने के लिए नरेंद्र भाटी और सुरेंद्र नागर जैसे कद्दावर नेताओं के सामने यही के एक संघर्षशील गुर्जर नेता राजकुमार भाटी का कद बढ़ाया है। वो गुर्जर बाहुल्य कही जाने वाली दादरी विधानसभा से ही तीन बार चुनाव हार चुके है फिर भी उनको पश्चिम में फ्री हैंड दिया गया ताकि वह पश्चिम यूपी में जनाधार ढूंढते सपा का एक बड़ा चेहरा बन सके। रैली में आए पश्चिम के कई बड़े पदाधिकारी की भीड़ देखकर ऐसा लगा भी है कि राजकुमार भाटी कुछ हद तक पश्चिम में गुर्जर नेताओं की महत्वाकांक्षा को सपा के लिए दोहन करने में सफल हुए है।
यद्यपि सपा नेताओं के दावे से उलट देखते तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में गुर्जर नेताओं ने पहले ही अपनी मजबूत पकड़ बना रखी है।
सहारनपुर जिला वर्तमान में गुर्जर राजनीति का सबसे बड़ा गढ़ है। यहां की गंगोह सीट से किरात सिंह और नकुड़ सीट से मुकेश चौधरी भाजपा के विधायक हैं। भाजपा ने इन दोनों चेहरों के जरिए जिले के सामाजिक समीकरण को साधने की सफल कोशिश करती है।
क्रांतिधरा मेरठ में भी गुर्जर राजनीति का पलड़ा भारी है, लेकिन यहां विचारधाराओं का टकराव भी दिखता है। सरधना से अतुल प्रधान (सपा) एक प्रमुख युवा चेहरे के रूप में उभरे हैं। वहीं, मेरठ दक्षिण से डॉ. सोमेंद्र तोमर (भाजपा) न केवल विधायक हैं, बल्कि वर्तमान में उत्तर प्रदेश सरकार में ऊर्जा राज्य मंत्री भी हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि डॉ. सोमेंद्र तोमर ही इस समय योगी मंत्रिमंडल में गुर्जर समाज का एकमात्र चेहरा हैं।
गौतमबुद्ध नगर में नोएडा (दादरी) से तेजपाल नागर भाजपा के विधायक हैं, जबकि जिले के चुनावी समीकरणों में नरेंद्र भाटी (MLC) और सुरेंद्र नागर (राज्यसभा सांसद) का बड़ा प्रभाव है। वहीं गाजियाबाद की लोनी सीट से नंदकिशोर गुर्जर अपनी आक्रामक राजनीति के लिए चर्चा में रहते हैं। इनके अलावा मुजफ्फरनगर की खतौली सीट से मदन भैया (रालोद) से, शामली से वीरेंद्र सिंह (MLC), बिजनौर से अशोक कटारिया (MLC) और लोकसभा में रालोद के चंदन चौहान (बिजनौर) व भाजपा के कंवर सिंह तंवर (अमरोहा) इस समाज से नेतृत्व कर रहे हैं।
क्षत्रिय और ब्राह्मणों समेत सवर्णों की नाराजगी: सपा के लिए खतरे की घंटी?
2027 के चुनावों के लिए हुई इस रैली अखिलेश यादव जिस तरह से अतुल प्रधान, राजकुमार भाटी, नैना गुर्जर, इकरा हसन जैसे चेहरों को आगे किया हैं, उससे गुर्जर समुदाय में तो उत्साह है, लेकिन इसकी प्रतिक्रिया ठाकुर और ब्राह्मण समुदायों में नकारात्मक दिख रही है। दादरी की रैली के बाद सोशल मीडिया पर ठाकुर समुदाय का जो आक्रोश देखने को मिला है, वह केवल पश्चिम तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा असर पूर्वांचल की उन सीटों पर पड़ सकता है जहाँ ठाकुर,ब्राह्मण, कायस्थ पंजाबी मतदाता हार-जीत तय करते हैं।
पूर्वांचल में ब्राह्मण पहले से ही भाजपा से कुछ मुद्दों पर खफा बताए जा रहे हैं, लेकिन क्या वे सपा की ओर झुकेंगे? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ब्राह्मण मतदाता सपा के ‘मुस्लिम-यादव-दलित’ (PDA) प्रयोग के बजाय आज भी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को एक विकल्प के रूप में देख रहे हैं। ऐसे में अखिलेश का गुर्जर कार्ड वापस ठाकुरों को भड़काकर भाजपा को फायदा पहुँचा सकता है। माहौल बना तो ब्राह्मण वापस भाजपा से भी जुड़ सकता है।
भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग और अखिलेश की चुनौती
भाजपा ने गौतम बुद्ध नगर और सहारनपुर जैसे गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों में ब्राह्मण और राजपूत चेहरों को शीर्ष पर रखा है, लेकिन साथ ही सुरेंद्र नागर, नरेंद्र भाटी और तेजपाल नागर जैसे गुर्जर नेताओं को सदन में भेजकर संतुलन बनाए रखा है। अखिलेश यादव अब उन विधानसभा क्षेत्रों में गुर्जर दावेदारों को उतारने का दबाव महसूस करेंगे जहाँ भाजपा के गुर्जर विधायक हैं।
लेकिन यहाँ एक बड़ा पेच है। उत्तर प्रदेश जैसे जातीय विविधता वाले प्रदेश में यदि अखिलेश केवल एक वर्ग को खुश करने के लिए दूसरे को नजरअंदाज करते हैं, तो उनका ‘PDA’ नारा ‘बैकफायर’ कर सकता है। ठाकुर समुदाय की नाराजगी सपा को उन इलाकों में भारी पड़ेगी जहाँ भाजपा की पकड़ पहले से ही मजबूत है।
दरअसल भाजपा की राजनीति हमेशा दबंग और प्रभावशाली दिखने वाली जाति के खिलाफ बाकी जातियों को खड़ा करके वोट साधने की रही है । हरियाणा में जाटों के खिलाफ नॉन जाटों को इकट्ठा करके भाजपा सरकार बनती रही है । अखिलेश यादव भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर को आगे करके इसे ठाकुरों के विरुद्ध आजमाना चाहते तो हैं किंतु PDA की आड़ में गुर्जर समुदाय पर दांव लगाना उनको इसलिए भारी पड़ सकता है कि अगर सोशल इंजीनीयरिंग के खेल में भाजपा ने गुर्जर समुदाय के अलावा बाकी जाट दलित ब्राह्मण और ठाकुर समुदाय को साथ लिया तो PDA की ये राजनीति अखिलेश की रणनीति उनको बैकफायर कर जाएगी।
रविवार को ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना नाम लिए अखिलेश यादव पर निशाना चाहते हुए उन्हें विवाद जानकारी राजनीति के लिए नोएडा पहुंचने वाला नेता बताया है । उन्होंने अखिलेश यादव के समय नोएडा को क्राइम कैपिटल बताते हुए आज निवेशकों के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन होने की बात कही है। वही प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने रैली में सपा अध्यक्ष के दिए बयानों को झूठ और भ्रम का दस्तावेज बता दिया है, तो उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने अखिलेश की रैली को ‘सद्भावना नहीं, दुर्भावना रैली’ करार देकर साफ कर दिया है कि भाजपा इस जातीय असंतुलन का फायदा उठाने के लिए तैयार है। अखिलेश यादव ने जो शंखनाद किया है, वह देखने में तो साहसी कदम लगता है, लेकिन गुर्जर वोटो को धुरी बनाकर जाट और ठाकुरों की दोहरी नाराजगी अखिलेश के लिए 2027 की राह कठिन कर सकती है।
क्या अखिलेश यादव गुर्जरों को नया राजनीतिक आधार बनाकर सत्ता तक पहुँच पाएंगे, या फिर ठाकुर-ब्राह्मणों की बेरुखी उन्हें एक बार फिर विपक्ष की बेंचों पर बैठने को मजबूर कर देगी? यह तो वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल उत्तर प्रदेश की बिसात पर चली गई यह ‘चाल’ बेहद जोखिम भरी नजर आ रही है।


