शहर के सबसे व्यस्त और प्रतिष्ठित माने जाने वाले ‘जगत फार्म’ मार्केट में एक बार फिर स्ट्रीट फूड की गुणवत्ता और प्रशासन की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। ‘रेस्टोरेंट पर एगरोल खाना एक महिला सब इंस्पेक्टर के परिवार और पड़ोसियों को बेहद भारी पड़ गया। एगरोल खाने के कुछ ही देर बाद एक-एक कर 7 लोगों की तबीयत बिगड़ गई, जिन्हें आनन-फानन में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। हालांकि राहत की बात यह है कि सभी अब खतरे से बाहर हैं, लेकिन इस घटना ने ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के स्वास्थ्य विभाग और खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है।
बीमार होता शहर, बेपरवाह तंत्र
यह कोई पहली घटना नहीं है जब ग्रेटर नोएडा में स्ट्रीट फूड की वजह से लोग अस्पताल पहुँचे हों। फूड विभाग ने औपचारिकता निभाते हुए सैंपल भरकर जाँच के लिए भेज दिए हैं, लेकिन क्या यह समस्या का समाधान है? हकीकत यह है कि ग्रेटर नोएडा ईस्ट और वेस्ट, दोनों ही क्षेत्रों में ऐसे रेस्टोरेंट के साथ साथ सड़कों पर अवैध अतिक्रमण कर ठेले लगाने वालों पर जिला खाद्य विभाग और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण का कोई नियंत्रण नहीं है।
सडको पर अक्सर अतिक्रमण के लिए एक तर्क दिया जाता है कि प्राधिकरण के पास ‘वेंडिंग जोन’ को लेकर कोई ठोस पॉलिसी नहीं है। लेकिन क्या पॉलिसी का न होना आम जनता की जान को जोखिम में डालने का लाइसेंस है? पेशेवर जगत और जागरूक नागरिकों के बीच यह चर्चा आम है कि यह पॉलिसी की कमी नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से इच्छाशक्ति का अभाव है।
भ्रष्टाचार की थाली में परोसी जा रही है बीमारी
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अवैध स्ट्रीट वेंडर्स और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों के बीच एक गहरा गठजोड़ है। दावा किया जाता है कि ‘सुविधा शुल्क’ या अवैध वसूली के बदले इन वेंडर्स को शहर की प्रमुख सड़कों पर कब्जा करने और घटिया गुणवत्ता का खाना बेचने की खुली छूट दे दी जाती है। जब वेंडर की कमाई का एक हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है, तो वह लागत निकालने के लिए खाने की गुणवत्ता से समझौता करता है। इसी का नतीजा है कि आज शहर की व्यस्ततम मार्केट ‘जगत फार्म’ में लोगों को शुद्ध खाने के नाम पर ‘धीमा ज़हर’ परोसा जा रहा है।
सिस्टम का मज़ाक: शिकायतों पर ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में सिर्फ ‘चेहरे’ बदलते हैं
घटना के बाद जब शोर मचता है, तो खानापूर्ति के लिए कुछ अधिकारियों का तबादला कर दिया जाता है ताकि जनता को संदेश जाए कि कार्रवाई हुई है। लेकिन कड़वा सच यह है कि कुछ समय बाद वही चेहरे फिर से महत्वपूर्ण पदों पर लौट आते हैं। यह एक ‘म्यूजिकल चेयर’ जैसा खेल बन चुका है, जिसमें नुकसान सिर्फ आम नागरिक का होता है।
प्रश्न ये है कि गर्मियों की आहट के साथ ही फूड पॉइजनिंग की घटनाएं बढ़ने का अंदेशा है। क्या प्राधिकरण तब जागेगा जब कोई बड़ी अनहोनी हो जाएगी?
एनसीआर खबर का प्रश्न : क्या अब जवाबदेही तय करने का समय नहीं
सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह केवल एक ‘फूड पॉइजनिंग’ का मामला नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन (Public Health Management) की पूरी तरह से विफलता है। ग्रेटर नोएडा जैसे आधुनिक शहर में अगर आज भी वेंडिंग ज़ोन पॉलिसी का अभाव है, तो यह यहाँ की कार्यसंस्कृति पर एक बड़ा धब्बा है।
स्ट्रीट वेंडर न केवल यातायात को बाधित कर रहे हैं, बल्कि बिना किसी सरकारी निगरानी (Checks and Balances) के स्वास्थ्य के लिए खतरा भी बन रहे हैं। प्राधिकरण को अब भ्रष्टाचार के आरोपों से ऊपर उठकर एक पारदर्शी वेंडिंग पॉलिसी लानी होगी और खाद्य सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू करना होगा। सक्षम अधिकारियो का तंत्र विकसित करना होगा।
फिलहाल, ये की घटना एक चेतावनी है। अगली बार यह एगरोल किसी की जान भी ले सकता है। क्या सिस्टम इस बार कोई सबक लेगा या फिर अगली बार किसी और परिवार के अस्पताल पहुँचने का इंतज़ार किया जाएगा?


