आशु भटनागर। बीते सोमवार, 13 अप्रैल को नोएडा की सड़कों और औद्योगिक इकाइयों में जो मंजर देखा गया, उसने न केवल दिल्ली-एनसीआर बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति की चूलें हिला दी हैं। 42,000 से अधिक मजदूरों के उग्र प्रदर्शन और ‘तांडव’ ने सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप मजदूरों को 21% की त्वरित वेतन वृद्धि तो मिल गई, लेकिन इसके दूरगामी परिणामों ने निवेशकों और राजनीतिक विश्लेषकों की नींद उड़ा दी है। इससे पहले कि हम यह समझे कि इसके परिणाम का असर किस-किस पर पड़ेगा, पहले समझते हैं कि बीते 3 दिन में सरकार की तरफ से क्या कार्यवाही हुई।
गाजर और छड़ी: एक तरफ राहत, दूसरी तरफ कानूनी शिकंजा!
आंदोलन के हिंसक मोड़ लेने के बाद योगी सरकार ने त्वरित कार्यवाही करते हुए मजदूरों की सैलरी में 21% की वृद्धि के निर्देश तो दे दिए, लेकिन इसके साथ ही कानून का डंडा भी पूरी सख्ती से चला है। लक्सर जेल इस वक्त चर्चा का केंद्र बनी हुई है, जहाँ 1,000 से अधिक मजदूरों को बंद किया गया है।
स्थानीय संगठनों के दावों की माने तो अनुसार, इन कैदियों में लगभग 55 महिलाएं भी शामिल हैं। किसान संगठन के दावे में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसमें कुछ नाबालिग बच्चों को भी हिरासत में लेने की खबरें सामने आ रही हैं। इस पूरी कार्यवाही में फैक्ट्री मालिकों की भूमिका ने ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (विश्वास की कमी) को जन्म दिया है।
फैक्ट्री मालिकों द्वारा पुलिस को सौंपे गए सीसीटीवी फुटेज के आधार पर हो रही गिरफ्तारियों ने भविष्य में मजदूर-मालिक संबंधों के और अधिक कड़वे होने के संकेत दिए हैं। तो वहीं भाजपा और संघ के लघु उधोग भारती जैसे संगठनों से जुड़े उद्योगपति प्रेस कांफ्रेंस कर इस कड़वाहट को बढाने में योगदान दे रहे हैं । “मजदूरों की वेतन वृद्धि से वयापार को नुक्सान होगा” जैसी बातें उनकी स्वार्थी सोच और वयवहार को बता रही हैं। चर्चा तो ये भी है कि बीते दिनों एक केन्द्रीय मंत्री से मिलने गए ऐसे उधोगपतियो को न सिर्फ डांट पड़ी बल्कि ये भी कहा गया कि अगर मजदूरों को वेतन देने से ही वयापार बंद हो रहा है तो फिर आपको बंद ही कर देना चाहिए। सरकार मजदूरों को गुलामी के काल में नहीं ले जा सकती है।
‘मोदी-योगी’ ब्रांड और निवेशकों का डगमगाता भरोसा
पिछले 9 वर्षों से उत्तर प्रदेश में “मोदी है तो मुमकिन है” और “योगी है तो यकीन है” के नारों के बीच औद्योगिक शांति का दावा किया जाता रहा है। इसी भरोसे पर न केवल घरेलू बल्कि विदेशी निवेशकों ने भी उत्तर प्रदेश का रुख किया था। लेकिन नोएडा की इस घटना ने इस छवि को गहरा धक्का पहुँचाया है।
राजनैतिक गलियारों में चर्चा है कि शीर्ष उद्योगपति और बड़े निवेशक अब राज्य में ‘औद्योगिक सुरक्षा’ को लेकर संशय में हैं। खबरें आ रही हैं कि निवेशकों ने अब 9 वर्ष बाद पहली बार विपक्ष के नेताओं से संपर्क साधना शुरू कर दिया है। 2027 से पहले यह भाजपा के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी है। यदि बड़े निवेशकों का भरोसा सरकार से उठता है, तो आने वाले चुनावों में भाजपा को आर्थिक के साथ बड़े राजनीतिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। वहीं 9 वर्ष बाद विपक्षी राजनातिक दलों को मिल रही अटेंशन (Attention) के फलस्वरूप वो पूरी ताकत से फिलहाल मजदूरों के हित की बातें करते दिख रहे है।
स्थानीय किसान मजदूर संगठनों का पतन और ‘अर्बन नक्सल’ विचारधारा का उदय
इस आंदोलन का सबसे चौंकाने वाला पहलू नेतृत्व का परिवर्तन रहा है। नोएडा के पारंपरिक मजदूर संगठन, स्थानीय किसान नेता और सामाजिक संगठन के साथ साथ वामपंथी संगठन सीटू भी इस पूरे आंदोलन की दिशा और तीव्रता को भांपने में पूरी तरह विफल रहे। इस ‘वैक्यूम’ का फायदा उठाकर अल्ट्रा-लेफ्ट (चरम वामपंथी) विचारधारा से प्रेरित नए चेहरों ने मैदान संभाल लिया।माना यह जा रहा है कि मजदूरों के बीच इन स्थानीय नेताओं की क्रेडिबिलिटी लगभग समाप्त हो चुकी है। हालत ये रहे कि सीटू स्वयं और उसके सहयोगी संस्ग्थान किसान सभा अपने ही नेता की नजरबंदी (house Arrest) को हफ्ते भर तक नहीं हटवा सके।
नोएडा पुलिस के अनुसार, बाहर से आए आदित्य आनंद, रूपेश राय और मनीष चौहान जैसे नेताओं ने जिस तीव्रता से इस भीड़ को न केवल संगठित किया बल्कि इसे उग्र हिंसक आन्दोलन रूप भी दिया वो औधोगिक नगरी में कई बदलाव के संकेत दे रहा है। हालांकि ये नेता अभी जेल में हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इन्होंने मजदूरों के बीच ‘अर्बन नक्सल’ विचारधारा के बीज बो दिए हैं और ये आक्रोश मजदूरों के साथ साथ हाउस मेड या सोसाइटी में सिक्योरिटी या सफाई कर्मियों तक भी पहुँच बना रहे है।
भविष्य की आहट: क्या नोएडा बनेगा नया मुंबई?
वर्तमान में अपनी साख बचाने के लिए नोएडा के स्थानीय किसान, मजदूर और वकील संगठन फिर से एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे उन मजदूरों का विश्वास वापस जीत पाएंगे जो अब बाहरी और उग्र नेतृत्व की ओर आकर्षित हो रहे हैं?
इतिहास के पन्नो से देखे तो वर्षो या फिर दशको पूर्व मुंबई में भी एक समय स्थानीय संगठनों को दरकिनार कर संजय निरुपम, अबू आज़मी जैसे नेताओ ने न सिर्फ अपनी जगह बनाई थी बल्कि उसके परिणाम स्वरूप मुंबई की राजनीती में स्थापित भी हो गए थे। नोएडा की यह घटना क्या उत्तर प्रदेश के औद्योगिक परिदृश्य में एक नए और हिंसक राजनैतिक अध्याय की शुरुआत है? क्या यहाँ की राजनीती में नए बदलाव दिखेंगे यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन फिलहाल सरकार और उद्योग जगत, दोनों के लिए यह आत्ममंथन का समय है।
सरकार को ये समझना आवश्यक है कि यह आंदोलन केवल वेतन वृद्धि की मांग नहीं था, बल्कि यह व्यवस्था के प्रति गहरे असंतोष और बदलती राजनीतिक विचारधारा का प्रतिबिंब है। सरकार को अब केवल ‘लॉ एंड ऑर्डर’ ही नहीं, बल्कि ‘इंडस्ट्रियल फेथ’ (औद्योगिक विश्वास) को भी बहाल करना होगा और ये समझना होगा कि मजदूरों को दण्डित करने की जगह भावनात्मक भरोसे से ही पुन: सकारात्मक स्वरूप में लाना संभव होगा।


