बेलाग लपेट : उत्तरप्रदेश का ‘औद्योगिक इंजन’ नोएडा क्यों हुआ जाम? पार्ट 3 – ‘अर्बन नक्सल’ की एंट्री और व्यवस्था की नाकामी, भारतीय मजदूर संघ ने ‘इंस्पेक्टर राज’ के खात्मे को बताया असल जड़

आशु भटनागर
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आशु भटनागर। नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में हाल ही में हुए श्रमिक आंदोलन और उसके बाद भड़की हिंसा ने प्रशासन और राज्य सरकार के साथ साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भी नींद उड़ा दी है। जैसे-जैसे इस उपद्रव की जांच की परतें खुल रही हैं, इसमें ‘अल्ट्रा लेफ्ट’ यानी अर्बन नक्सल तत्वों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। जिसके बाद इस पूरे घटनाक्रम पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठन ‘भारतीय मजदूर संघ’ (BMS) ने बेहद तीखी और बेबाक प्रतिक्रिया दी है।

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भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पवन कुमार ने एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार (इंडियन एक्सप्रेस) को दिए साक्षात्कार में इस हिंसा के लिए सीधे तौर पर प्रशासनिक विफलता और पिछले दो दशकों की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा कि जब व्यवस्था मजदूरों की आवाज सुनना बंद कर देती है, तो असामाजिक तत्व उसका फायदा उठाते हैं।

‘इंस्पेक्टर राज’ खत्म करने की होड़ ने छीनी मजदूरों की आवाज

पवन कुमार ने एक बड़ा मुद्दा उठाते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्री काल से ‘इंस्पेक्टर राज’ हटाने का जो नारा शुरू हुआ था, वह मजदूरों के लिए अभिशाप बन गया। उन्होंने कहा, “उदारीकरण और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देने के चक्कर में सभी सरकारों ने श्रम निरीक्षण (Labor Inspection) को पूरी तरह खत्म कर दिया। पिछले 15-20 सालों से फैक्ट्रियों में कोई निरीक्षण नहीं हो रहा है।”

उनका तर्क है कि ‘इंस्पेक्टर राज हटाओ’ का नारा आयकर विभाग जैसे मामलों में तो सही हो सकता है जहां दो पक्ष (सरकार और व्यापारी) होते हैं, लेकिन लेबर के मामले में एक तीसरा पक्ष भी है—’बेजुबान मजदूर’। लेबर इंस्पेक्टर ही उस बेजुबान मजदूर की आवाज होता था, जिसे सरकारों ने हटा दिया।

14 साल तक नहीं बढ़ी न्यूनतम मजदूरी

बीएमएस नेता ने आंदोलन के दो मुख्य कारण गिनाए। पहला यह कि पिछले 14 वर्षों से न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage) में कोई बदलाव नहीं किया गया था। इसमें मौजूदा सरकार के 8 साल और पिछली सरकारों का समय भी शामिल है। दूसरा कारण यह कि जो न्यूनतम मजदूरी तय है, उसे भी मालिक लागू नहीं कर रहे हैं। देश भर में पाँच राष्ट्रीय हड़तालें हुईं, जिनमें 25 करोड़ लोगों ने हिस्सा लिया। इसी वर्ष 12 फरवरी को देश भर में लोगों ने विरोध के तौर पर काली पट्टियाँ बाँधीं पर किसी का ध्यान इस पर नहीं था।

हैरानी की बात यह है कि हिंसा होने के मात्र 8 घंटे के भीतर सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में 25% की बढ़ोतरी कर दी। पवन कुमार ने सवाल उठाया कि क्या सरकार को पहले नहीं पता था कि नोएडा में गुजारा करना लखनऊ या वाराणसी के मुकाबले महंगा है?

900 अवैध एजेंसियां और मजदूरों का शोषण

पवन कुमार ने जिला प्रशासन और श्रम विभाग की पोल खोलते हुए कहा कि नोएडा में केवल 600 एजेंसियां पंजीकृत हैं, जबकि असल में 1500 एजेंसियां काम कर रही हैं। यानी लगभग 900 एजेंसियाँ तो रजिस्टर्ड भी नहीं हैं। लेबर डिपार्टमेंट के लिए इससे बड़ी नाकामी और कोई नहीं हो सकती। भले ही मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी न मिलती हो, लेकिन मालिकों से उन्हीं सेवाओं के लिए पूरा पैसा वसूला जाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि मजदूरों से 12-12 घंटे काम लिया जाता है, कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं दी जाती और न ही ओवरटाइम का पैसा मिलता है। मालिकों से पूरी सेवा का पैसा वसूला जाता है, लेकिन मजदूरों के हिस्से में शोषण ही आता है।

इंटेलिजेंस की नाकामी और पुलिस का रवैया

हिंसा को लेकर उन्होंने स्थानीय इंटेलिजेंस यूनिट (LIU) को घेरा। उन्होंने कहा कि मजदूर तीन दिनों से प्रदर्शन कर रहे थे, ऐसे में खुफिया विभाग को यह अंदाजा क्यों नहीं लगा कि स्थिति बिगड़ सकती है? उन्होंने पुलिस पर भी आरोप लगाया कि जब हिंसा हुई तो प्रशासन ने केंद्रीय ट्रेड यूनियन नेताओं से बात करने के बजाय उन्हें नजरबंद कर दिया। यहाँ तक कि बीएमएस के जिला सचिव को जेल भेजने की धमकी दी गई।

उन्होंने आरोप लगते हुए कहा कि श्रमिको से हर दूसरा विभाग बातचीत कर रहा था लेकिन लेबर डिपार्टमेंट कहाँ था? IAS अधिकारियों में वह संवेदनशीलता नहीं होती, जो लेबर डिपार्टमेंट के अधिकारियों में होती है।

ऐसे में फिलहाल भारतीय मजदूर संघ के इस कड़े रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि नोएडा की हिंसा ‘बाहरी तत्वों’ की साजिश के साथ साथ बरसों से सुलग रहे मजदूरों के असंतोष का नतीजा है। जिसका लाभ ‘अर्बन नक्सल’ ने उठा लिया । इस इंटरव्यू से जहाँ बीएमएस ने सरकार को आईना दिखाया है कि ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर मजदूरों के अधिकारों की बलि देना कितना महंगा पड़ सकता है वहीं ये भी माना जा रहा है कि व्यापारी हो या मजदूर संघ से सम्बद्ध आरएसएस के अनुशंगी संगठनो ने अपनी खोयी ज़मीन वापस लेने की तयारी शुरू कर दी है जो निश्चित रूप ये संकेत देता है कि संगठनो के वर्चस्व के संघर्ष में मजदूरों के अच्छे दिन आने वाले है!

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे