राजनीति का ‘मालदा’ कनेक्शन: 2019 का वो ‘आम’ इंटरव्यू और अब बंगाल की बदलती जमीन

NCRKhabar Mobile Desk
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कोलकाता/नई दिल्ली: राजनीति में कई बार कुछ बातें उस समय केवल एक सामान्य बातचीत या मजाक लगती हैं, लेकिन समय का चक्र जब घूमता है, तो वही पुरानी बातें गहरे अर्थ और संकेतों के साथ सामने आती हैं। साल 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले, जब अभिनेता अक्षय कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ‘गैर-राजनीतिक’ इंटरव्यू लिया था, तब एक सवाल काफी चर्चा में रहा था— “प्रधानमंत्री जी, आपको कौन सा आम पसंद है?”

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उस समय पीएम मोदी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था, “मालदा… बंगाल का मालदा।” जब अक्षय ने आगे पूछा कि वे इसे काटकर खाते हैं या चूसकर, तो जवाब मिला— “दोनों तरह से।” उस वक्त विरोधियों ने इस इंटरव्यू को हल्का बताकर इसका मजाक उड़ाया था, लेकिन आज बंगाल की राजनीति के गलियारों में ‘मालदा आम’ की यह चर्चा एक अलग ही राजनीतिक संदेश दे रही है।

शपथ ग्रहण समारोह और 98 वर्षीय माखनलाल सरकार

हाल ही में बंगाल में आयोजित एक महत्वपूर्ण समारोह के दौरान भावुक कर देने वाले दृश्य सामने आए। इस समारोह में 98 वर्षीय माखनलाल सरकार मौजूद थे। उन्हें बंगाल में जनसंघ (भाजपा का पूर्ववर्ती रूप) का सबसे पुराना जीवित कार्यकर्ता माना जाता है।

जब प्रधानमंत्री उनसे मिले, तो उन्होंने न केवल उनके पैर छुए बल्कि उन्हें गले लगाकर सम्मान भी दिया। जनसंघ के इस पुराने सिपाही की आँखों में संतोष था। वे अपने साथ प्रधानमंत्री के लिए ‘मालदा’ के आम लेकर आए थे। उन्होंने पीएम के कान में मात्र तीन शब्द कहे— “लक्ष्य पूरा हुआ”। यह तीन शब्द बंगाल में दशकों के संघर्ष और चुनावी तपस्या का निचोड़ थे।

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सिर्फ फल नहीं, एक राजनीतिक प्रतीक?

इस आयोजन के दौरान विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी प्रधानमंत्री को मालदा के आम भेंट किए। इसके साथ ही, प्रधानमंत्री ने उन भाजपा कार्यकर्ताओं के परिजनों से भी मुलाकात की, जिन्होंने राजनीतिक हिंसा में अपनी जान गंवाई थी।

अब लोग 2019 के उस इंटरव्यू को फिर से याद कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ‘मालदा आम’ का जिक्र शायद सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं था। मालदा, जो कभी वामपंथ और फिर तृणमूल का अभेद्य किला माना जाता था, वहां अब भाजपा ने अपनी जमीन मजबूत कर ली है।

काटकर या चूसकर: अब समझ आ रहे हैं मायने

सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में अब लोग कह रहे हैं कि पीएम मोदी का “काटकर और चूसकर” वाला जवाब शायद बंगाल की राजनीति को साधने की उनकी रणनीति का ही एक हिस्सा था। किसी क्षेत्र को ‘काटकर’ (सीधे मुकाबले में जीतना) या ‘चूसकर’ (धीरे-धीरे संगठन का विस्तार कर जड़ें जमाना)— राजनीति में ये दोनों ही तरीके अहम होते हैं।

आज जब बंगाल में जनसंघ के पुराने कार्यकर्ता “लक्ष्य पूरा हुआ” कहते हैं, तो वह ‘मालदा’ आम का स्वाद प्रधानमंत्री के लिए और भी मीठा हो जाता है।

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