ग्रेटर नोएडा की सड़कों पर विकास की रफ्तार का दावा करने वाले आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई एक बार फिर उजागर हो गई है। शहर की लाइफलाइन मानी जाने वाली 130 मीटर रोड पर साकीपुर गांव के पास निर्माणाधीन फ्लाईओवर को शुरू करने की एक और डेडलाइन (15 जून) बीत चुकी है। ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन (DFCC) के अधिकारियों के बड़े-बड़े दावे एक बार फिर हवा-हवाई साबित हुए हैं।
यह केवल एक परियोजना में देरी का मामला नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में व्याप्त प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का ज्वलंत उदाहरण है।
छह साल, सात डेडलाइन और अंतहीन इंतजार
2020 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट को अब तक पूरा हो जाना चाहिए था। लेकिन पिछले चार वर्षों में यह फ्लाईओवर विकास से ज्यादा अपनी ‘मिस्ड डेडलाइन्स’ के लिए चर्चा में रहा है। अब तक 6 से ज्यादा बार तारीखें बदली जा चुकी हैं। अधिकारियों ने बड़े आत्मविश्वास के साथ 15 जून को यातायात शुरू करने का वादा किया था, लेकिन जब तारीख आई, तो हमेशा की तरह “फिनिशिंग वर्क” का पुराना बहाना सामने कर दिया गया।
प्रोफेशनल एप्रोच या सिर्फ खानापूर्ति?
देखा जाए, तो किसी भी बड़े प्रोजेक्ट की योजना में ‘बफर टाइम’ और ‘रिस्क मैनेजमेंट’ शामिल होता है। सड़क तैयार है, स्ट्रीट लाइटें लग चुकी हैं, फिर भी फिनिशिंग के नाम पर काम को लटकाए रखना यह दर्शाता है कि नियोजन (Planning) के स्तर पर भारी चूक हुई है। DFCC और प्राधिकरण के बीच समन्वय की कमी का खमियाजा रोजाना हजारों यात्रियों को भुगतना पड़ रहा है, जो धूल और ट्रैफिक जाम के बीच फंसे रहते हैं।

राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल
ग्रेटर नोएडा को एक ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘इंडस्ट्रियल हब’ के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन क्या एक फ्लाईओवर को बनाने में 4 साल से अधिक का समय लगना एक विश्व स्तरीय शहर की पहचान हो सकती है? पुरे क्षेत्र में विकास का दावा करने वाले दादरी विधायक तेजपाल नागर इसके लिए कब निरीक्षण करने आयेंगे ये लोगो का मुख्य प्रश्न है, लोगो का कहना है कि यह देरी न केवल जनता के पैसे की बर्बादी है, बल्कि यह उन निवेशकों और पेशेवरों के भरोसे को भी तोड़ती है जो इस शहर की कनेक्टिविटी पर निर्भर हैं।
अधिकारियों का कहना है कि काम जल्द पूरा हो जाएगा, लेकिन “जल्द” की परिभाषा अब संदिग्ध हो चुकी है। अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित उच्च अधिकारी इस देरी के लिए जवाबदेही तय करें। क्या किसी अफसर पर पेनल्टी लगेगी? क्या ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा? जब तक ‘परफॉरमेंस-बेस्ड’ जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक 130 मीटर रोड जैसे प्रोजेक्ट्स डेडलाइन्स के बोझ तले दबते रहेंगे।


