एनसीआर खबर विशेष : जंतर-मंतर आंदोलन की सफलता से बदलेगी देश की राजनीति, 27 के चुनावो में भाजपा के विधायको के समक्ष होगी बड़ी चुनोती, नोएडा, दादरी, जेवर विधान सभा पर क्या होंगे समीकरण ?

NCR Khabar Internet Desk
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आशु भटनागर। अंततः जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के बदलाव को लेकर छात्रों और युवाओं का आंदोलन रंग लाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाए जाने के साथ ही यह ऐतिहासिक आंदोलन समाप्त हो गया। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम को महज एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित करके देखना भारी भूल होगी।

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इस आंदोलन ने न केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के ‘अजेय विजय रथ’ के घोड़ों को रोक दिया है, बल्कि आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (2027) के लिए सुस्त पड़े विपक्ष में एक नई ऊर्जा फूंक दी है। सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि इसने भाजपा के मौजूदा विधायकों के साथ साथ अन्य दावेदारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ‘अबकी बार’ चुनाव में केवल नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के चेहरे के भरोसे पार पाना मुमकिन नहीं होगा।

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चर्चा है कि जंतर मंतर पर नोएडा, दादरी और जेवर तीनों ही विधान सभा के कई जेनजी जहाँ अपने माता पिता से अनुमति लिए बिना जंतर मंतर पहुंचे तो कई माता पिता ने ये भी स्वीकार किया है उनके बच्चो ने उनसे 5 से १० हजार रूपए लेकर जंतर मंतर में जाकर या ऑनलाइन खाना तक पहुँचाया I इनमे भाजपा समर्थक मिलेनियम माता पिताओं के बच्चे शामिल है जिन्हें अब तक भाजपा ही समर्थक माना जाता रहा है और भाजपा की जीत का प्रमुख कारक भी। यही मिलेनियम माता पिता भाजपा की चिंता का विषय होने चाहिए क्योंकि जो माता पिता बच्चो की जिद पर जंतर मंतर पर मौन समर्थन और फंड दे सकते है वो आने वाले चुनावों में उनकी जिद पर पार्टी भी बदल सकते है


जंतर-मंतर की भीड़ ने ध्वस्त किया ‘कोर वोटर’ का तिलस्म

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि नोएडा छोड़कर दादरी और जेवर, दोनों ही विधानसभा सीटों पर भाजपा के ‘एकमुश्त/एकछत्र वोटर’ होने का जो मिथक था, वह जंतर-मंतर की भीड़ और युवाओं के आक्रोश में ध्वस्त हो चुका है। 2027 के चुनाव में जनता केवल पार्टी का निशान देखकर वोट नहीं देगी, बल्कि विधायकों के कामकाज, उनके व्यवहार और बदलाव की जरूरत पर अपनी मुहर लगाएगी।

जिले में पंकज सिंह के अलावा तेजपाल नागर और धीरेंद्र सिंह के लिए सबसे बड़ा संकट यह है कि वे पार्टी के मूल कैडर से नहीं आते। ऐसे में बदला हुआ अंदरूनी माहौल टिकट आवंटन के समय तो रुकावट बनेगा ही, यदि उन्हें दोबारा टिकट मिल भी गया, तो पार्टी के भीतर का असंतोष ‘बदलाव’ की ओर शिफ्ट हो सकता है। दूसरी तरफ, बीते 10 वर्षों में पहली बार विपक्ष के हौसले इतने बुलंद नजर आ रहे हैं कि वह जनता के बीच जाकर समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ने का सफल प्रयास कर सकता है।

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‘बाहरी’ विधायकों के लिए खड़ी हुई बड़ी मुश्किलें, जनता का मूड: “मोदी के नाम का प्रसाद भरपूर मिला, अब बदलाव जरूरी”

इस बदले दौर में सबसे ज्यादा गाज उन सीटों पर गिरती दिख रही है, जहां भाजपा ने अपने निष्ठावान और समर्पित कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर कांग्रेस या अन्य दलों से आए ‘बाहरी’ नेताओं को टिकट दिया था।

यदि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले की तीन विधानसभा सीटों का विश्लेषण करें, तो नोएडा को छोड़कर दादरी और जेवर विधानसभा सीटों पर यही समीकरण देखने को मिलता है। भाजपा ने यहाँ अपने कोर कैडर के नेताओं को दरकिनार कर कांग्रेस से आए Tejpal Nagar (दादरी) और Dhirendra Singh (जेवर) को प्रत्याशी बनाया और वे जीते भी।

ऐसे में नोएडा के अतिरिक्त दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों के गांवों, चौपालों और सोसायटियों में यह चर्चा आम है कि “दोनों विधायकों को भाजपा और मोदी जी के नाम का भरपूर ‘प्रसाद’ (सत्ता का लाभ) मिल चुका है।” आम जनता के बीच से यह आवाज उठ रही है कि यदि भाजपा खुद समय रहते अपने प्रत्याशियों में बदलाव नहीं करती है, तो जनता स्वयं चुनाव में विपक्ष के किसी नए चेहरे को चुनकर यह बदलाव कर देगी।

2014 के बाद से देश में बने ‘मोदी-योगी लहर’ के वातावरण के चलते भले ही समर्पित भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपना आक्रोश दबाए रखा, लेकिन जंतर-मंतर के बाद बदले राजनीतिक माहौल में अब समर्पित कार्यकर्ताओं की एक बड़ी फौज मैदान में उतर गई है। भाजपा कैडर अब किसी ‘मूल भाजपाई’ के लिए वोट मांगने की तैयारी में जुट गया है। यही वजह है कि जेवर और दादरी विधानसभा सीटों पर पार्टी का टिकट मांगने वालों की लंबी कतार लग चुकी है।

दादरी में टिकट के दावेदारों की लंबी रेस: सतेंदर अवाना, इंदर नागर अभिषेक कुमार सबसे आगे

दादरी विधानसभा क्षेत्र में तो भाजपा का टिकट मांगने वालों की सूची इतनी लंबी है कि सभी नाम गिनना मुश्किल है। हालांकि, पार्टी के अंदरूनी समीकरणों पर नजर डालें तो दावेदारों को दो प्रमुख वर्गों में देखा जा रहा है:

एबीवीपी (ABVP) से निकले युवा चेहरे: छात्र राजनीति से आए सतेंदर अवाना (Satendra Awana) और इंदर नागर (Inder Nagar), महामेधा नागर जैसे नेता अपनी मजबूत दावेदारी ठोक रहे हैं। इंदर नागर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक प्रमुख नेता हैं, जो वर्तमान में भाजपा किसान मोर्चा उत्तर प्रदेश के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य और पश्चिम उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय महामंत्री (किसान मोर्चा) के रूप में सक्रिय हैं। वहीं  गौतमबुद्ध नगर की युवा नेता महामेधा नागर को भाजपा ने हाल ही में प्रदेश मंत्री घोषित किया है उनको भी प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है
शहरी और प्रवासी वोट बैंक के प्रतिनिधि: शहरी क्षेत्र, प्रवासी समाज और फ्लैट बायर्स (Flat Buyers) के सबसे बड़े और प्रमुख नेता अभिषेक कुमार (Abhishek Kumar) इस रेस में सबसे आगे चल रहे हैं। भाजपा पृष्ठभूमि से आने वाले अभिषेक कुमार की शहरी मतदाताओं और सोसायटी निवासियों के बीच गहरी पैठ मानी जाती है। अभिषेक लगातार शहरी क्षेत्र को दादरी विधान सभा से अलग विधान सभा की मांग भी कर रहे हैं ।
आंदोलन से उपजे आक्रोश से उत्साहित विपक्षी चेहरे: आंदोलन के बाद पैदा हुए जन-आक्रोश के बाद विपक्ष से दीपक भाटी चोटीवाला (Deepak Bhati Chotiwala) , इंद्र प्रधान, सुधीर भाटी (Sudhir Bhati) तक अब मोदी-योगी के चेहरे का तिलस्म टूटने का दावा करते हुए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं और जीत के प्रति आश्वस्त नजर आ रहे हैं। विपक्ष से इन चेहरों को भी लगने लगा है कि इस बार जेनजी के सहारे भाजपा को हराने में सफलता पाई जा सकती हैI

जेवर विधानसभा क्षेत्र में भी इस बार विधायक धीरेन्द्र सिंह के समक्ष बरसो के साम्राज्य को चुनोती

जेवर विधानसभा क्षेत्र में भी इस बार विधायक धीरेन्द्र सिंह के समक्ष उन्ही के साथ रहे कई चेहरे टिकट की दावेदारी में लगे हुए है I उनके बरसो के पारिवारिक साम्राज्य को भी इस आन्दोलन के बाद चुनोती मिल सकती हैI इनमे भाजपा के ही अमित चौधरी का नाम सबसे आगे है I अमित जाट समुदाय से आते हैं, वर्तमान में जिला पंचायत अध्यक्ष भी है, उनके अलावा पूर्व जिला अध्यक्ष हरीश ठाकुर भी रेस में बने हुए हैं I दशक भर से भाजपा में रहे योगेंदर छोकर भी टिकट की रेस में हैं और दावा करते हैं कि अगर भाजपा से टिकट नहीं मिला तो वो बीएसपी से लेकर चंद्रशेखर की पार्टी तक से टिकट लेकर लड़ेंगे I वहीं दबदबा वाले राजनेता ब्रजभूषण सिंह की लाडली शालिनी सिंह के भी जेवर में दावेदारी की चर्चाये है यधापि वो भाजपा और सपा दोनों ही तरफ बराबर बैलेंस बनायी हुई हैI उनके साथ समाजवादी पार्टी से सागर शर्मा , विकास प्रधान भी दावेदारी कर रहे है और बदले माहोल में बदलाव की पूरी तयारी बता रहे है I

नोएडा में पंकज सिंह अभी भी एक मात्र विकल्प पर जेनजी यहाँ भी कर सकते है धमाका!

दादरी और जेवर विधान सभा के बनिस्पत नोएडा में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र विधायक पंकज सिंह फिलहाल सुरक्षित दिखाई दे रहे है I जिले में भाजपा से उनके विरुद्ध कोई नाम नहीं सामने आया है I चर्चाओं में रहे विपिन मल्हन पहले ही चुनावी राजनीती से तौबा कर चुके है I एनपी सिंह 3 बार फोनरवा का चुनाव हार कर तो कैप्टन विकास गुप्ता मंत्री पद लेकर अप्रासंगिक हो चुके है, वहीं फोनरवा का चुनाव जीतने वाले योगेन्द्र शर्मा को ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने के कारण शहरी जनमानस और युवाओं का समर्थन नहीं हैI युवाओं से एक मात्र नाम वयापार मंडल के विकास जैन का है जो किसी भी परिस्थिति में इस बार चुनाव लड़ने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे है I शालिनी सिंह का नाम हवा में उछला ज़रूर पर उनके पिता ब्रजभूषण सिंह प्रकरण में विनेश फोगाट के पुन: सक्रीय होते ही उन्होंने जेवर की राजनीती की राह पकड़ ली, अब वो नोएडा के राजनैतिक परिद्रश्य से गायब होकर किसी सामान्य सामाजिक कार्यकर्ता की तरह प्रशसनको ज्ञापन देती नजर आती हैंI विपक्ष से आम आदमी पार्टी नेता पंकज अवाना पिछले चुनाव में ही टिकट होने के बाद मना कर राजनैतिक परिद्रश्य से अन्तर्ध्यान हो चुके हैंI कांग्रेस से पंखुड़ी पाठक और उनके पति अनिल यादव 5 वर्षो से नोएडा की जगह टीवी परिचर्चा वाली राष्ट्रीय राजनीती में जा चुके हैंI हाँ समाजवादी पार्टी के नोएडा महानगर अध्यक्ष डा आश्रय गुप्ता पूरी तरह से पंकज सिंह के विरोध में सडको पर संघेर्ष कर रहे है, अपनी ही पार्टी में पुराने यादव नेताओ के विरोध के बाबजूद वो टिकट मिलने और जीत का दावा भी कर रहे है पर क्या उनको जीतने लायक जेन जी का समर्थन मिल पायेगा यही नोएडा में चर्चा हैI

भाजपा के सामने यक्ष प्रश्न और विपक्ष के लिए सबक

अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा नेतृत्व जनता के बीच उठ रही इस बदलाव की लहर को भांप पाएगा? क्या जंतर-मंतर के आक्रोशित युवाओं के आंदोलन से सबक लेते हुए भाजपा इन सीटों पर अपने नए और युवा समर्पित शेरों को मौका देगी, या फिर ‘बाहरी’ नेताओं को तवज्जो देने की पुरानी परंपरा ही जारी रहेगी? इसका जवाब आने वाले दिनों में मिलेगा।

हालांकि, जंतर-मंतर के इस सफल आंदोलन ने विपक्ष को भी एक बड़ा सबक दिया है—”यदि भाजपा के तिलस्म को तोड़ना है, तो हवा-हवाई बयानों की जगह युवाओं को सही दिशा और वास्तविक मुद्दों (शिक्षा, रोजगार, स्थानीय समस्याओं) के साथ जोड़ना और उनके लिए सडको पर ही एकमात्र रास्ता है।” विपक्ष के नेताओ के लिए भी इस रास्ते पर उतरना और चल कर दिखाना ही दोनों सीटो पर उनके लिए विजय दिला सकता है।

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