प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक (FCRA), 2026 को लेकर इन दिनों राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में बहस तेज है। जहां अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के नेताओं ने इस विधेयक की मंशा पर सवाल उठाए हैं, वहीं भारत ने अब इस मामले में मोर्चा संभालते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने ‘भ्रांतियों’ और ‘वास्तविकताओं’ का पूरा ब्यौरा पेश कर दिया है।
विशेष बात यह है कि केंद्र सरकार ने अपनी बात वैश्विक मंच पर रखने के लिए अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा को चुना है। यह कदम दर्शाता है कि भारत इस मुद्दे पर वैश्विक स्तर पर फैलाई जा रही गलतफहमियों को दूर करने को कितनी प्राथमिकता दे रहा है।
क्वात्रा का स्पष्ट संदेश: “यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं, पारदर्शिता के हक में है”
राजदूत विनय क्वात्रा ने स्पष्ट किया कि FCRA 2026 का उद्देश्य किसी विशेष समुदाय या धर्म को निशाना बनाना नहीं है। उन्होंने उन तमाम दावों को खारिज किया जिनमें कहा जा रहा था कि भारत नागरिक समाज (Civil Society) की आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है। सरकार की ओर से जारी स्पष्टीकरण में पांच प्रमुख भ्रांतियों पर प्रहार किया गया है:
- क्या विदेशी सहायता बंद की जा रही है? अक्सर यह कहा जा रहा है कि नया कानून एनजीओ को मिलने वाली विदेशी मदद को रोकने के लिए है। हकीकत यह है कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक संप्रभु कदम है। भारत में 1976 से ही FCRA अस्तित्व में है। 2026 का विधेयक उसी कड़ी का हिस्सा है जो बेहतर शासन और स्पष्ट नियमों की वकालत करता है। यह कानून का पालन करने वाले संगठनों को काम करने से नहीं रोकता।
- चंदे में गिरावट या बढ़ोतरी? एक बड़ा भ्रम यह फैलाया गया कि FCRA ने धर्मार्थ कार्यों को प्रभावित किया है। आंकड़ों की मानें तो सच्चाई इसके उलट है। 2010-11 में विदेशी योगदान 1.2 अरब डॉलर था, जो 2024-25 में बढ़कर 2.67 अरब डॉलर हो गया है। भारत में 30 लाख से ज्यादा एनजीओ हैं, जिनमें से केवल 14,450 ही FCRA के तहत पंजीकृत हैं। यानी एक बड़ा हिस्सा इस कानून के दायरे से बाहर रहकर भी स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है।
- क्या संपत्ति जब्त कर ली जाएगी? विधेयक में संपत्ति जब्ती के डर को भी बेबुनियाद बताया गया है। नियमों के अनुसार, यदि किसी संगठन का पंजीकरण रद्द होता है, तो उसकी संपत्ति राज्य प्राधिकरण के पास सुरक्षित रहती है। यदि संगठन अपना पंजीकरण बहाल कर लेता है, तो वह संपत्ति उसे वापस मिल जाती है। पूजा स्थलों के लिए तो विशेष सुरक्षा है, ताकि धार्मिक निरंतरता बनी रहे।
- क्या भारत अकेला ऐसा कदम उठा रहा है? विदेशी आलोचकों को जवाब देते हुए भारत ने याद दिलाया कि अमेरिका में 1938 से ‘FARA’ और 2010 से ‘FATCA’ जैसे कड़े कानून लागू हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन भी इसी तरह के कानून बना चुके हैं या बना रहे हैं। ऐसे में भारत पर सवाल उठाना दोहरे मापदंड को दर्शाता है।
हमारा नजरिया: राष्ट्रीय संप्रभुता और जवाबदेही आवश्यक

इस पूरे घटनाक्रम पर यदि गौर करें, तो भारत का रुख रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक और तर्कपूर्ण है। किसी भी आधुनिक लोकतंत्र के लिए यह जरूरी है कि विदेशी धन के स्रोत और उसके इस्तेमाल में पारदर्शिता हो। अगर पैसा स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय कार्यों के लिए आ रहा है, तो पंजीकरण और लेखा-जोखा देने में किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए?
विदेशी ताकतों द्वारा भारत के आंतरिक विधायी कार्यों पर उंगली उठाना अक्सर ‘अति-सक्रियता’ का हिस्सा होता है। राजदूत क्वात्रा के माध्यम से भारत ने यह साफ कर दिया है कि विदेशी चंदा ‘अधिकार’ नहीं बल्कि एक ‘विनियमित सुविधा’ है, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं दिया जा सकता।



