आशु भटनागर। नोएडा विधानसभा की सियासत में एक बार फिर नए समीकरण बनते नजर आ रहे हैं। पिछले एक दशक से अपनी बिरादरी के प्रत्याशी की बाट जोह रहे नोएडा के वैश्य समाज को आखिरकार अपना चेहरा मिलता दिख रहा है। उत्तर प्रदेश शासन के पूर्व वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और अपनी ईमानदार छवि के लिए जाने जाने वाले विजय शंकर पांडेय की नवनिर्मित ‘लोग पार्टी’ ने आगामी विधानसभा चुनाव 2027 के लिए इंजीनियर सौरभ गोयल को नोएडा से अपना दावेदार घोषित कर दिया है।
रविवार को विजय शंकर पांडेय स्वयं नोएडा पहुंचे और ‘लोग पार्टी’ के उद्देश्यों की जानकारी देते हुए जनता से संवाद किया। इस दौरान उन्होंने पार्टी के योग्य उम्मीदवारों की सूची का जिक्र किया, जिसमें नोएडा विधानसभा से इंजिनियर सौरभ गोयल का नाम सबसे ऊपर उभरकर सामने आया।
कौन हैं सौरभ गोयल? स्वच्छ छवि और मजबूत पृष्ठभूमि
सौरभ गोयल केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक उच्च शिक्षित और बेहद सफल व्यवसायी हैं। वर्ष 2000 में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन में इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट जगत में विभिन्न पदों पर काम किया। इसके बाद उन्होंने खुद का व्यवसाय शुरू किया, जिसमें उन्हें अपार सफलता मिली। उनकी ईमानदारी का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि वित्त वर्ष 2018-19 में भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा उन्हें सर्वाधिक इनकम टैक्स देने के लिए ‘सिल्वर कैटेगरी’ का ‘सर्टिफिकेट ऑफ एप्रिसिएशन’ प्रदान किया गया था।
राजनीति की बात करें, तो सौरभ गोयल का सफर 2022 के विधानसभा चुनाव में नोएडा से एक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शुरू हुआ था। उस चुनाव में तमाम बड़े और स्थापित राजनीतिक दलों के दिग्गजों के बीच भी सौरभ ने अपने सौम्य व्यवहार और व्यक्तित्व के बल पर छठा स्थान प्राप्त कर सबको चौंका दिया था। यहीं से उन्होंने नोएडा के राजनीतिक गलियारों में अपनी पहचान दर्ज करा दी थी।
1 लाख वैश्य वोटर्स का गणित: मायूसी के बीच उम्मीद की किरण?
नोएडा के राजनीतिक हलकों में हमेशा से यह दावा किया जाता रहा है कि यहां लगभग 1 लाख वैश्य मतदाता हैं। हालांकि, मुख्यधारा की पार्टियों—भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी—का पारंपरिक दांव ज्यादातर ब्राह्मण या ठाकुर प्रत्याशियों पर ही रहा है।
वर्ष 2014 के उपचुनाव में भाजपा की विमला बाथम के रूप में जरूर वैश्य समुदाय को प्रतिनिधित्व मिला था, लेकिन उसके बाद से यह समाज लगातार राजनीतिक उपेक्षा का शिकार महसूस करता रहा है। मनोज गुप्ता, कैप्टन विकास गुप्ता और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गोपाल कृष्ण अग्रवाल जैसे प्रमुख चेहरों के नाम समय-समय पर सामने आए, लेकिन टिकट के बंटवारे में वैश्य समाज को हर बार मायूसी ही हाथ लगी।
नोएडा में वैश्य समाज के एक बड़े वर्ग का मानना है कि सौरभ गोयल के रूप में उन्हें एक शिक्षित, साफ-सुथरी छवि वाला और आर्थिक रूप से सक्षम प्रत्याशी मिला है, जो नोएडा के शहरी और जागरूक मतदाताओं की कसौटी पर खरा उतरता है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या जातीय दावों को वोटों में बदला जा सकेगा?
नोएडा की राजनीति पारंपरिक रूप से भाजपा का गढ़ मानी जाती रही है। ऐसे में केवल जातीय समीकरण के भरोसे राष्ट्रीय दलों के विशाल कैडर और संसाधनों का मुकाबला करना ‘लोग पार्टी’ और सौरभ गोयल के लिए एक कठिन चुनौती होगी।
प्रश्न ये है कि क्या वैश्य समाज के प्रभावशाली नेता और मतदाता एकजुट होकर अपनी बिरादरी के उम्मीदवार के पीछे खड़े होंगे, या फिर यह दावा भी हर बार की तरह महज चुनावी हवा साबित होगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि सौरभ गोयल की दावेदारी ने नोएडा के राजनीतिक गलियारों में नए समीकरणों की सुगबुगाहट जरूर तेज कर दी है और हो सकता है वो आने वाले कई अन्य वैश्य समुदाय के दावेदारों को अपने कदम पीछे खीचने पर मजबूर कर दें।




