आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश में भले ही विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं और चुनावी बिगुल बजने में अभी लंबा वक्त है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। इसे बीजेपी की 24×7 चुनावी मशीनरी की ताकत कहें या फिर 2024 के लोकसभा चुनावों के नतीजों से मिला सबक, पार्टी ने अपनी चुनावी तैयारियों का केंद्र ‘पश्चिमी उत्तर प्रदेश’ को बनाया है।
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन इस अभियान को धार देने के लिए पूरी तरह सक्रिय हो चुके हैं। वह 21 और 22 सितंबर को मेरठ और सहारनपुर के दौरे पर रहेंगे। संगठन का कार्यभार संभालने के बाद नितिन नवीन का यह पहला पश्चिम यूपी दौरा है, जिसे बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पश्चिमी यूपी ही क्यों है बीजेपी की पहली पसंद?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की सत्ता का रास्ता पश्चिमी यूपी से होकर गुजरता है। संगठनात्मक दृष्टि से बीजेपी के लिए वेस्ट यूपी में 14 जिले आते हैं, जिनमें 71 विधानसभा सीटें शामिल हैं। बीजेपी का इतिहास रहा है कि वह अपने हर बड़े अभियान की शुरुआत इसी क्षेत्र से करती है। 2014 लोकसभा चुनाव में अभियान की शुरुआत सहारनपुर से हुई। उसके बाद 2017,2019,2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने सहारनपुर को ही अपना प्रस्थान बिंदु बनाया। इस बार भी बीजेपी इसी परंपरा को दोहरा रही है। इसका सीधा संदेश है कि पार्टी वेस्ट यूपी के किले को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने देना चाहती।
नितिन नवीन का दो दिवसीय दौरा: माइक्रो-मैनेजमेंट पर जोर
नितिन नवीन का यह दौरा केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा। वह 21 सितंबर को मेरठ और 22 सितंबर को सहारनपुर में डेरा डालेंगे। इस दौरान वे क्षेत्रीय पदाधिकारियों, सांसदों, विधायकों, पूर्व सांसदों और पूर्व विधायकों के साथ बंद कमरे में समीक्षा बैठक करेंगे। बूथ स्तर, शक्ति केंद्र, जिला और मंडल स्तर पर पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को परखेंगे साथ ही चुनावी तैयारियों में जमीनी स्तर पर आ रही ढिलाई को दूर करने के लिए कड़े दिशा-निर्देश देंगे।
ऐसे में बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन का वेस्ट यूपी का दौरा ऐतिहासिक बनाने की तैयारी हैं। इसके लिए बीजेपी के वेस्ट यूपी के संगठन ने एक बैठक भी की। मेरठ दिल्ली एक्सप्रेस वे पर टोल प्लाजा से ही भव्य जूलूस के साथ नितिन नवीन का स्वागत जूलूस निकाला जाएगा। जगह-जगह तोरण द्वार बनेंगे। जुलूस मार्ग पर लगातार फूलों की बारिश की जाएगी। पुराने वर्करों को सम्मान किया जाएगा। क्रांतिधरा मेरठ को 21 सिंतबर को भगवा रंग मे रंग दिया जाएगा।
2022 के जख्म: क्यों डरी हुई है बीजेपी?
भले ही 2022 में बीजेपी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली थी, लेकिन पश्चिमी यूपी में समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के गठबंधन ने बीजेपी को भारी नुकसान पहुंचाया था। सहारनपुर जिले का सियासी समीकरण देखे तो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी स्पस्ट सुनाई देती है। सहारनपुर मंडल की 7 सीटों का परिणाम देखे तो बीजेपी की चिंता साफ समझ आती है वहां बीजेपी विधायको से नाराजगी एक बड़ा कारण था।
- बेहट: उमर अली खान (SP) जीते। बीजेपी के नरेश सैनी 37,880 वोटों से हारे।
- नकुड़: मुकेश चौधरी (BJP) जीते, लेकिन जीत का अंतर मात्र 315 वोट था (बनाम धरम सिंह सैनी, SP)।
- सहारनपुर नगर: राजीव गुंबर (BJP) जीते, अंतर केवल 7,434 वोट (बनाम संजय गर्ग, SP)।
- सहारनपुर देहात: आशु मलिक (SP) जीते। बीजेपी के जगपाल सिंह 30,745 वोटों से हारे।
- देवबंद: बृजेश सिंह (BJP) जीते, लेकिन अंतर सिर्फ 7,104 वोट का था।
- रामपुर मनिहारान: देवेंद्र कुमार निम (BJP) 20,593 वोटों से जीते।
- गंगोह: कीरत सिंह (BJP) 23,449 वोटों से जीते।
सहारनपुर की 7 सीटों में से बीजेपी ने 5 सीटें जरूर जीतीं, लेकिन नकुड़, सहारनपुर नगर और देवबंद जैसी सीटों पर जीत का अंतर बेहद मामूली था। इन सीटो पर आज भी स्थानीय स्तर पर प्रत्याशियों के खिलाफ जनता और कार्यकर्ताओं का भारी आक्रोश है। मेरठ में भी सपा ने 3 सीटें झटक ली थीं, जबकि मुरादाबाद मंडल में सपा का लगभग एकतरफा कब्जा हो गया था।
बदला गठबंधन : आरएलडी का साथ और बीजेपी की उम्मीदें
2022 में आरएलडी ने सपा के साथ मिलकर 8 सीटें जीती थीं (जो बाद में उपचुनाव जीतकर 9 हो गईं)। इस बार समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। आरएलडी अब बीजेपी के साथ एनडीए गठबंधन का हिस्सा है। देखा जाए तो बीजेपी के लिए आरएलडी का साथ आना बड़े राहत की बात है। पार्टी को उम्मीद है कि इससे जाट-मुस्लिम-दलित समीकरण के बिखरने से विपक्ष कमजोर होगा और बीजेपी आसानी से वेस्ट यूपी की 71 सीटों पर बढ़त बना लेगी।
किन्तु बीजेपी के लिए चुनौती केवल गठबंधन की नहीं है, बल्कि अपने ही नेताओं के खिलाफ स्थानीय स्तर पर पनप रहे असंतोष को दूर करने की है। नकुड़ और देवबंद जैसी सीटों पर मामूली अंतर से मिली जीत यह दर्शाती है कि जनता उम्मीदवारों से नाराज थी। नितिन नवीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसी ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) को कम करना और कार्यकर्ताओं के बीच आपसी गुटबाजी को खत्म करना होगा। इसके लिए कमज़ोर सीटो पर जीत गये मंत्री विधायको के टिकट बदलना एक रणनीति हो सकती है I गुजरात में भी मोदी एक तिहाई टिकट काटकर ऐसे ही ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ से पार पाती रही है। नितिन नवीन इसे कैसे रंग देंगे ये आने वाले दिनों में पता चलेगा





