अखिलेश यादव की ‘घुसपैठिया’ टिप्पणी पर गरमाई सियासत: हरीश रावत ने दी नसीहत, कहा—‘बंटवारे के बाद जो जहां है, वह वहीं का सम्मानित नागरिक’

NCR Khabar Internet Desk
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा दिए गए विवादित बयान पर राजनीतिक गलियारों में घमासान मच गया है। भाजपा के कड़े विरोध के बीच अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने भी इस टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल न केवल अनुचित है, बल्कि यह देश के संघीय ढांचे और नागरिकों की गरिमा के खिलाफ भी है। वहीं उनके अतिरिक्त उत्तराखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि देश में कहीं कोई घुसपैठिया नहीं है। भारत का प्रत्येक नागरिक देश के किसी भी राज्य में रहने को स्वतंत्र है। गोदियाल ने कहा कि उन्हें ऐसा लगता है कि अखिलेश ने मजाकिया अंदाज में अपनी पत्नी के लिए यह टिप्पणी की होगी, जो कि उत्तराखंड से ही हैं।

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क्या है पूरा मामला?

बीते शनिवार को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक बयान देते हुए कहा था कि उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े घुसपैठिए उत्तराखंड के हैं। हालांकि, उन्होंने यह बयान किसी व्यक्ति विशेष का नाम लिए बिना दिया था, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनका इशारा सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर था, जो मूल रूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के रहने वाले हैं। अखिलेश यादव इससे पहले 13 अक्टूबर को भी सीएम योगी को ‘घुसपैठिया’ कह चुके हैं।

इस बयान के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पूरी तरह हमलावर हो गई है। भाजपा ने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि—विशेषकर उनकी पत्नी डिंपल यादव और उनके छोटे भाई की पत्नी के उत्तराखंड से होने—को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं।

हरीश रावत की दो टूक: ‘घुसपैठिया’ शब्द का प्रयोग अनुचित

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने सोशल मीडिया के माध्यम से अखिलेश यादव के बयान पर गहरी असहमति व्यक्त की है। उन्होंने लिखा, “श्री अखिलेश यादव ने एक दुर्भाग्यजनक टिप्पणी की है। टिप्पणी करते वक्त उनके मानस पटल पर श्री योगी आदित्यनाथ जी का चित्र रहा होगा। वह यह भूल गए कि हम कभी एक राज्य थे।”

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श्री रावत ने आगे कहा कि राज्य के विभाजन के समय एक सौहार्दपूर्ण वातावरण था। जब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड एक थे, तब नागरिकों ने अपनी सुविधा और कर्मक्षेत्र के अनुसार अलग-अलग स्थानों को चुना।

उन्होंने स्पष्ट किया, “यह एक अकाट्य सिद्धांत है कि बंटवारे के वक्त जो जहाँ रह गया, वह वहीं का वासी है। वह वहाँ का सम्मानित बाशिंदा और पूर्ण रूप से समान हकदार है। जो लोग उत्तराखंड में रह गए, वे वहां सम्मानित हैं और जो उत्तर प्रदेश में रह गए, वे उत्तर प्रदेश में सम्मानित होने चाहिए। इसलिए ‘घुसपैठिया’ शब्द का प्रयोग किसी भी रूप में इन नागरिकों पर लागू नहीं होता।” उन्होंने कहा कि देश के निर्माण में प्रवासियों और दूसरे प्रांतों से आए लोगों का बहुत बड़ा योगदान है, जिसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव की यह टिप्पणी उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के पुराने इतिहास को एक बार फिर से कुरेद रही है। अविभाजित उत्तर प्रदेश में उत्तराखंड मूल के नेताओं का प्रभाव काफी बड़ा रहा है। उत्तर प्रदेश के तीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे दिग्गज नेता उत्तराखंड क्षेत्र से ही ताल्लुक रखते थे।

दूसरी ओर, यह भी एक ऐतिहासिक सत्य है कि 9 नवंबर 2000 को बने अलग उत्तराखंड राज्य के गठन का सबसे कड़ा विरोध समाजवादी पार्टी ने किया था। 2 अक्टूबर 1994 को अलग राज्य की मांग कर रहे आंदोलनकारियों पर मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपी सरकार के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई (मुजफ्फरनगर कांड) को उत्तराखंड के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में गिना जाता है। विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर की गई ताजा टिप्पणी के जरिए अखिलेश यादव अनजाने में ही सही, अपनी पार्टी के पुराने राजनीतिक रुख को ही हवा दे रहे हैं, जिस पर अब सभी दलों की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।

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