डा महेंद्र नागर बनाम डा महेश शर्मा :  गेम चेंजर “अपने को दो” के खिलाफ क्या माहौल बदल पाएंगे सुरेंद्र नागर ?

Community Reporter
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आकाश नागर । साल था 2002, तब कांग्रेस से दादरी विधानसभा पर टिकट के प्रबल दावेदार थे ‘मिल्क किंग’ के नाम से मशहूर वेदराम नागर। पूर्व में देश के दिग्गज और किसान नेता राजेश पायलट वेदराम नागर की पैरवी करतें थे, लेकिन उनकी मौत के बाद वे अकेले पड़ गए। अतः समय पर गांधी परिवार के करीबी अर्जुन सिंह की सिफारिश के बल पर नोएडा के बिशनपुरा निवासी रघुराज सिंह कांग्रेस का टिकट लाने में कामयाब हो गए। तब भाजपा ने नवाब सिंह नागर को टिकट दिया था।

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नवाब सिंह नागर का यह दूसरा चुनाव था। तब दादरी और नोएडा एक ही विधानसभा सीट हुआ करती थी। नागर के खिलाफ एंटी इनकमबैनसी थी। उस चुनाव में रघुराज सिंह का पलड़ा भारी था। लेकिन चुनाव की अंतिम रात (जिसे राजनीतिक रूप से कत्ल की रात भी कहा जाता है) को दादरी के नागर बाहुल्य गांवों में वेदराम नागर के एक‌ मैसेज ने पूरा चुनाव ही पलट दिया। नागर का यह मैसेज था “अपने को दो”। इस मैसेज ने नागर बाहुल्य गांवों में आग की तरह काम किया‌ और जीत की दहलीज पर पहुंच चुके रघुराज सिंह को रातों रात चुनाव हरा दिया। तब महज 11 हजार वोटों से नवाब सिंह नागर दूसरी बार दादरी के विधायक निर्वाचित हुए। उस समय राजनीति में सीधे, सरल, सज्जन‌ और सौम्य व्यवहार के वेदराम नागर को ” गैम चेंजर ” का नाम दिया गया।

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2002 के इस इतिहास को 20 साल बाद 2022 में उनके बेटे सुरेन्द्र सिंह नागर ने उस समय पुनर्जीवित कर दिखाया जब जेवर में उनकी पार्टी भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी। भाजपा ने इस चुनाव में यहां से दूसरी बार ठाकुर धीरेन्द्र सिंह को टिकट दिया था। लेकिन भाजपा के लिए यह चुनाव तब कठिन हो गया जब गुर्जर समाज के ताकतवर नेता कहे जाने वाले अवतार सिंह भड़ाना को राष्ट्रीय लोकदल ने यहां से मैदान में उतार दिया। एक बारगी भाजपा को यह सीट अपने हाथ से निकलती दिखाई दी। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुर्जर से गुर्जर की काट के लिए अपने अग्नेयास्त्र सुरेन्द्र सिंह नागर को जेवर की जीत की जिम्मेदारी सौंपी। जिसे सुरेन्द्र सिंह नागर ने पूरी तन्मयता से निभाया। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए जो रणनीति अपनाई उससे अवतार सिंह भड़ाना को रणछोड़ बना डाला था। सुरेन्द्र सिंह की मेहनत रंग लाई और ठाकुर धीरेन्द्र सिंह को फिर से जीत का ताज मिला ‌। हालाकि इस दौरान कैसे भाजपा के ही एक सीनियर लीडर के द्वारा इस चुनाव में जयचंद की भूमिका निभाई गई उसका भी एक काला इतिहास मेरे पास है। उसे फिर कभी।

बहरहाल जेवर से भड़ाना की करारी हार से सुरेन्द्र सिंह नागर का कद न केवल मजबूत हुआ बल्कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इसका इनाम बतौर उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव बनाया। तब सुरेन्द्र सिंह नागर को भी अपने पिता वेदराम नागर की तरह ही ” गेम चेंजर” कहा गया।

फिलहाल एक बार फिर सुरेन्द्र सिंह नागर गेम चेंज करने अपने चुनावी रथ पर सवार है। आज उनका यह रथ दादी सती की पावन धरती दुजाना में पहुंचा है। बिसरख ब्लॉक के प्रमुख ओमपाल प्रधान एवं भाजपा के जिला उपाध्यक्ष पवन नागर ‘बबली’ ने अपने समर्थकों के साथ उनका जोरदार स्वागत किया। सुरेंद्र सिंह नागर ने प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी के लोकसभा प्रत्याशी डॉ महेश शर्मा को वोट देने की अपील की। ऐसे समय में जब मोदी के 400 पार पर चुनावी चुनौती मुंह बाए खड़ी हैं। भाजपा को विश्वास है कि तीसरी बार सत्ता मोदी की ही आएगी।

जिस क्षेत्र में नागर चुनावी प्रचार में आए हैं यहां पहले से ही “अपने को दो” का संदेश गांव गांव में चल‌ रहा है। इस बार 20 साल पहले की तरह “अपने को दो” का यह चुनावी संदेश उनके पिता वेदराम नागर की तरह किसी नेता ने नहीं दिया है बल्कि एक जाति विशेष की जनता के बीच स्वत ही शुरू हुआ है। इसके केन्द्र में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के संयुक्त उम्मीदवार डॉ महेंद्र नागर है।

अभी तक के जो राजनीतिक हालात हैं उसके मद्देनजर दादरी विधानसभा के गुर्जर बाहुल्य गांवों में चुनाव दो दिशाओं में बट चुका है। एक दिशा में वे लोग हैं जो सफेद कुर्ता पहनकर सुबह ही राजनीति करने निकल जाते हैं। जो नेताओं के दर पर नतमस्तक होकर अपने हित साधते है। वह बखूबी जानते हैं कि अगर सत्ता पक्ष के खिलाफ चले तो तुम्हारे रास्ते में अड़चनें पैदा हो जाएगी। तुम्हारे वह काम नहीं होंगे जो तुम नेताओं की जी हुजूरी करके करा लेते हो। ऐसे में उनकी राजनीतिक मजबूरी कहें या सत्ता पक्ष का खौफ उनका भाजपा के साथ और भाजपा प्रत्याशी डॉ महेश शर्मा के साथ खड़ा होना लाजिमी है।

दूसरी दिशा वह निर्धारित कर रहे हैं जिन्हें नेताओं से और पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। जो ‘हैंड टू माउथ ‘ है। किसान है। मजदूर हैं। इस डायन महंगाई में जैसे तैसे अपने परिवार का पालन पोषण कर रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे जातिवाद के प्रबल समर्थक है। वह नहीं भूले हैं उस जातिवाद को जिसे पिछले लोकसभा चुनाव में खूब हवा दी गई थी। गुर्जरवाद और पंडितवाद का नारा दिया गया था।

गौतम बुद्ध नगर लोकसभा में इस बार इस राजनीतिक नारे की हवा निकालने का सारा दारोमदार भाजपा ने अपने राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय सचिव सुरेंद्र सिंह नागर के कंधे पर डाला है। क्या इस बार वो इस पर वह खरा उतरते प्रतीत हो पा रहे हैं। असल में अब उस किसान और मजदूर को जगाने का काम भी सुरेन्द्र सिंह नागर को ही करना है जिसमें यह वर्ग उदासीनता अपनाएं हुए हैं। इसी उदासीनता का नतीजा सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा पहले चरण के लोकसभा चुनाव में 19 अप्रेल को औसत से बहुत कम मतदान के रूप में देख चुकी है।

ऐसे में बड़ा प्रश्न यही है कि 26 अप्रैल को होने वाले मतदान में क्या वाकई सुरेंद्र सिंह नागर गेम चेंजर बनकर उभरेंगे या फिर पहले की तरह “अपने को दो” नारा ही गेम चेंजर साबित होगा

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