आशु भटनागर। बुधवार को नोएडा के सेक्टर-66 स्थित मामूरा गांव में लगी आग ने एक बार फिर नोएडा के गांवों की खस्ताहाल स्थिति और वहां पनप रहे सुनियोजित ‘अतिक्रमण’ के कड़वे सच को सामने लाकर खड़ा कर दिया है। आग बुझाने पहुंची दमकल विभाग की गाड़ियों को जब 10 फीट की संकरी गलियों, तीन-तीन फीट बाहर निकले छज्जों और सड़क पर बेतरतीब खड़ी गाड़ियों के कारण घंटों मशक्कत करनी पड़ी, तो सवाल यह उठा कि आखिर इस ‘विकास’ के पीछे किसका हाथ है?
संकरी गलियां और अतिक्रमण बनी चुनौती
मामूरा जैसे घनी आबादी वाले गांव में जहां हजारों परिवार रहते हैं, वहां दमकल की गाड़ी का पहुंचना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। गांव के मुख्य बाजार से गुजरने वाले मार्ग का आधा हिस्सा ढाबों की मेजों और अवैध पार्किंग ने घेर रखा है। यह समस्या सिर्फ मामूरा की नहीं, बल्कि बरौला, भंगेल, सोरखा, गढ़ी चौखंडी और छिजारसी जैसे दर्जनों गांवों की है। सर्रफाबाद जैसे गाँवों में तो प्राधिकरण की अधिग्रहित सेक्टर 72 पर अवैध निर्माण है तो सेक्टर 104 में कड़ी अवैध विशाल मार्किट ऐसे ही नेताओ और रसूखदारों का सत्ता को चुनोती है I सेक्टर 49 में हनुमान मूर्ति के साथ और सामने बने अवैध मार्किट आखिर सिर्फ प्राधिकरण के भ्रष्टाचार के नाम पर तो नही बन गये है
भ्रष्टाचार बनाम ‘विकास का चमत्कार’
अक्सर ऐसे मामलों में नोएडा प्राधिकरण के इंजीनियरों और अधिकारियों को भ्रष्टाचार के लिए कोसा जाता है। आम आरोप है कि प्राधिकरण में तैनात मेट, सुपरवाइजर, अवर अभियंता की भूमाफिया के साथ गहरी सांठगांठ है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मामूरा गांव में प्राधिकरण की अधिग्रहित व कब्जा प्राप्त जमीन पर अवैध प्लाटिंग हुई जिसको बाहरी लोगों को जमीन बेचा गया। यह सच भी है कि प्राधिकरण में कथित किसान(?) नेताओ, समाजसेवियों की आड़ में दलालों की भीड़ लगी रहती है, जो कथित तौर पर सत्ता के नाम पर लखनऊ और स्थानीय नेताओं की सिफारिश लेकर आते हैं और अवैध निर्माणों की फाइलों को ‘ठंडे बस्ते’ में डलवा देते हैं।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सारा दोष केवल अधिकारियों का है? पिछले कुछ दशकों में ‘खाने के लिए संघर्ष करने वाले’ स्थानीय लोगों का रातों-रात ‘अरबपति’ बन जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इन गांवों में 5-5 मंजिला घरों का निर्माण, अवैध पीजी (PG) और होटलों का संचालन बिना स्थानीय सत्ता संरक्षण के संभव नहीं है। आखिर गाँवों में इतनी बड़ी व्यवसायिक योजनाये चल कैसे रही है ? क्या सिर्फ अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर उन रसूखदार नेताओं और लालची व्यापारियों को बख्शा जा सकता है, जिनके इशारों पर ये अवैध बस्तियां खड़ी हुई हैं?

क्या कथित किसान आंदोलन केवल अवैध निर्माणों को बचाने के लिए हैं?
जानकारों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ होने वाले कई किसान आंदोलनों के पीछे एक बड़ा कारण इन अवैध निर्माणों को बचाए रखना रहा है। राजनीति का गलियारा यह बताता है कि पिछली सरकारों में अवैध निर्माण को संरक्षण देने वाले कई चेहरे आज वर्तमान सत्ता के पाले में भी सक्रिय हैं। यही कारण है कि कोई भी बड़ी घटना होने पर केवल एक-दो जूनियर अधिकारियों पर गाज गिरती है और मामला शांत हो जाता है।
यदि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नोएडा को वास्तव में एक व्यवस्थित और सुरक्षित शहर बनाना चाहते हैं, तो केवल अधिकारियों पर कार्रवाई नाकाफी होगी। जानकारों का मानना है कि यदि स्थानीय नेताओं और उनके गुर्गों द्वारा अधिकारियों पर डाले जाने वाले दबाव को नहीं रोका गया, तो यह ‘भ्रष्टाचार की आड़ में विनाश’ अपनी सीमा पार कर चुका है।
नोएडा के लोगो का सुझाव है कि मुख्यमंत्री को अपनी ही पार्टी में शामिल हुए उन स्थानीय नेताओं और भू-माफियाओं की गुप्त जांच करानी चाहिए, जिन्होंने पिछले 15-20 वर्षों में इन गांवों में अवैध कॉलोनियां काटकर शहर की सूरत बिगाड़ दी है।
अगर समय रहते इन अवैध निर्माणों पर नकेल नहीं कसी गई, तो मामूरा की यह आग भविष्य में होने वाले किसी बड़े मानवीय संकट की केवल एक छोटी सी चिंगारी बनकर रह जाएगी। क्या नोएडा प्रशासन और योगी सरकार पुरानी सरकारों के बनाये इस ‘सिस्टम’ को बदलने की हिम्मत जुटा पाएगी, या फिर अगली बार किसी और गांव में किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार किया जाएगा?



