आशु भटनागर। बरसों पहले जब प्रसिद्ध अभिनेता मनोज कुमार की फिल्म क्लर्क सिनेमाघरों में आई थी, तो उसका एक गीत हम सबके दिलों में उतर गया था— “क्योंकि मैं एक क्लर्क हूँ”। वह दौर अलग था। उस समय फिल्मों और कहानियों में क्लर्क को एक बेहद ईमानदार, सीधा-साधा और व्यवस्था का सताया हुआ एक लाचार पात्र दिखाया जाता था। लेकिन आज समय बदल चुका है। आज जब हम सरकारी विभागों और दफ्तरों की कार्यप्रणाली को करीब से देखते हैं, तो हमें समझ आता है कि आज का क्लर्क भले ही ईमानदार हो या न हो, लेकिन वह आज भी सरकारी कार्यालयों में भ्रष्टाचार और पूरी व्यवस्था की सबसे मजबूत धुरी बना हुआ है।

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हम अक्सर सोचते हैं कि सरकारी नीतियां और फैसले बड़े-बड़े वातानुकूलित कमरों में बैठे उच्च अधिकारी लेते हैं। लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। हम सबने अक्सर प्रशासन, प्राधिकरणों, नगर निगमों के गलियारों में एक व्यंग्य सुना है।

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अफसर करे न अफसरी, वर्कर करे न वर्क, दास मलूका कह गए, सब कुछ करे क्लर्क।

पहले हमें भी यह सिर्फ एक हंसने-हंसाने का जरिया लगता था। लेकिन जब हम सरकारी कार्यशैली की परतों को खोलते हैं, तो हमें समझ आता है कि इस साधारण सी पंक्ति में पूरे सिस्टम का एक बहुत बड़ा और कड़वा सच छिपा हुआ है।

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किसी भी विभाग में साहब की कुर्सी चाहे जितनी भी बड़ी हो, लेकिन फाइल का सफर हमेशा सबसे नीचे बैठे क्लर्क की मेज से ही शुरू होता है। वह क्लर्क ही होता है जो फाइल को पढ़ता है, पुराने नियमों को खंगालता है, संदर्भ निकालता है और फिर उस पर अपनी ‘नोटिंग’ लिखता है। साहब सिर्फ वही देखते हैं जो क्लर्क उन्हें दिखाना चाहता है। वो ऐसा जीरो है जो 10 को 10 लाख बना सकता है और 10 लाख को 10।

क्लर्क ही सिस्टम की असली ताकत या कमजोरी!

कहने को क्लर्क भले ही बहुत छोटा पद हो पर असल में वही सिस्टम की असली ताकत जानता है क्योंकि किसी भी विभाग में आईएएस या अन्य बड़े अधिकारी हर दो-तीन साल में बदल जाते हैं। उन्हें विभाग के पुराने मामलों की गहरी जानकारी नहीं होती। इसके विपरीत, क्लर्क सालों-साल उसी सीट पर बैठा रहता है और रहती है उसकी असीमित ताकत जिसको कोई अधिकारी नहीं मिटा सकता है। उसे नियमों की बारीकियाँ भी पता होती हैं और पुरानी फाइलों का इतिहास भी। किसी भी कार्यलय में क्लर्क को यह अच्छी तरह पता होता है कि कौन सी फाइल किस रास्ते से होकर अपनी मंजिल तक पहुंचेगी। वह चाहे तो किसी फाइल को नियमों के जाल में ऐसा उलझा सकता है कि वह सालों तक बाहर न निकले, और चाहे तो उसी फाइल को पलक झपकते ही पास करवा सकता है।

जब ‘Approved’ बन जाता है ‘Not Approved’

हम इस व्यवस्था की ताकत और कमजोरी को समझने के लिए सोशल मीडिया पर अक्सर दिखाई देने वाली एक बेहद दिलचस्प उदाहरण से देख सकते हैं, जो हमारे सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली को पूरी तरह बयान करता है।

मान लीजिए कि किसी ठेकेदार के काम की फाइल क्लर्क के पास आती है। ठेकेदार और विभाग के बीच सब कुछ तय हो जाता है। क्लर्क पूरी फाइल तैयार करके साहब के सामने रखता है। साहब बिना ज्यादा सोचे-समझे उस पर केवल एक शब्द लिख देते हैं— Approved।

लेकिन खेल यहीं खत्म नहीं होता। मान लीजिए कि दो दिन बाद वह ठेकेदार अपने किसी वादे या ‘कमीशन’ की बात से मुकर जाता है। अब समस्या खड़ी होती है। साहब फिर परेशान होकर क्लर्क से पूछते हैं कि अब क्या करें?

ऐसे में क्लर्क के पास उस व्यवस्था की चाबी होती है। वह साहब को एक छोटा सा रास्ता सुझाता है कि सर, इस Approved के आगे सिर्फ Not लिख दीजिए। साहब तुरंत लिख देते हैं— Not Approved।

ठेकेदार परेशान हो जाता है। वह भागता हुआ फिर क्लर्क की शरण में आता है। जब बात दोबारा बन जाती है, तो क्लर्क फिर साहब के पास जाता है। अब साहब झल्लाकर पूछते हैं कि अब क्या रास्ता है? तब क्लर्क मुस्कुराकर कहता है कि सर, इस Not में सिर्फ एक छोटा सा e अक्षर जोड़ दीजिए।

और देखते ही देखते वह शब्द बदल जाता है: Not Approved → Note Approved

यह सिर्फ एक शाब्दिक बाजीगरी नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे सिस्टम की वह कड़वी हकीकत है जिसे हम रोज महसूस करते हैं। आज राम राज्य की राजधानी अवध में राम कोई भी हो, सरकारी दफ्तरों में भले ही अंतिम हस्ताक्षर भले ही साहब के होते हैं, लेकिन उस फैसले की दिशा और भाषा ब्रह्माण्ड के संचालक यानी हरि की तरह हमेशा क्लर्क ही तय करता है। वही तय करता है कि न्याय के लिए आने वाले हर ( VIP या आम आदमी) में किसका काम कैसे करना है, बिना उसकी दहलीज पर माथा टेके बड़ेबड़े धुरंधरों का काम तमाम हो सकता है।

ऐसे में हमें यह स्वीकार करना होगा कि इस व्यवस्था में मनोज कुमार की फिल्म का वह ईमानदार क्लर्क शायद आज के डिजिटल और जटिल प्रशासनिक युग में कहीं खो गया है। आज क्लर्क ईमानदार हो या न हो, लेकिन वह इस बात को अच्छी तरह जानता है कि फाइलों के खेल में शब्दों को कैसे घुमाना है। और जब तक हमारे सरकारी दफ्तरों में फाइलों के पीछे बैठे क्लर्क का यह अदृश्य सिस्टम ऐसे ही चलता रहेगा और आम जनता नियमों के इसी चक्रव्यूह में उलझी रहेगी।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे